भक्तिकाल (पूर्वमध्यकाल)
परिचय
भक्तिकाल हिंदी साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण काल है, जिसे पूर्वमध्यकाल भी कहा जाता है। इसका समय संवत् 1375 से 1700 (1318 ई. से 1643 ई.) तक माना जाता है।
मध्यकाल को दो भागों में बाँटा गया है—
- पूर्वमध्यकाल (भक्तिकाल)
- उत्तरमध्यकाल (रीतिकाल)
भक्तिकाल हिंदी साहित्य का वह युग है जिसमें भक्ति, प्रेम, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का अत्यधिक विकास हुआ। इसी कारण इसे हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।
भक्ति आंदोलन की शुरुआत
भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण भारत में हुई। वहाँ के आलवार और नयनार संतों ने भक्ति भावना को विकसित किया।
बाद में यह आंदोलन उत्तर भारत में आया, जहाँ इसे रामानंद ने लोकप्रिय बनाया। रामानंद ने भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया और हिंदी साहित्य में भक्ति परंपरा को मजबूत आधार दिया।
भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताएँ
भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- साहित्य का मुख्य विषय भक्ति और ईश्वर प्रेम था
- ईश्वर के प्रति समर्पण और प्रेम की भावना
- सामाजिक समानता और जाति-पाँति का विरोध
- देशी भाषाओं (अवधी, ब्रज, राजस्थानी आदि) का विकास
- सरल और जनसामान्य की भाषा का प्रयोग
- धार्मिक और नैतिक मूल्यों का प्रचार
- मानवतावाद और प्रेम का प्रसार
- काव्य में भावनात्मक गहराई और भक्ति रस की प्रधानता
भक्ति के प्रकार
भक्ति को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है—
1. निर्गुण भक्ति
2. सगुण भक्ति
1. निर्गुण भक्ति
निर्गुण भक्ति में ईश्वर को निराकार, अव्यक्त और सर्वव्यापी माना गया है। इसमें मूर्ति-पूजा का विरोध किया गया है।
निर्गुण भक्ति की विशेषताएँ
- ईश्वर निराकार है
- अवतारवाद का विरोध
- मूर्ति-पूजा का खंडन
- ईश्वर को हर जीव के भीतर माना गया
- ज्ञान और प्रेम को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग माना गया
- गुरु को सर्वोच्च महत्व दिया गया
- सामाजिक समानता का समर्थन
निर्गुण भक्ति की शाखाएँ
निर्गुण भक्ति की दो प्रमुख शाखाएँ हैं—
(क) ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य)
इस शाखा में ज्ञान, योग और साधना के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति पर बल दिया गया।
प्रमुख विशेषताएँ
- अद्वैतवाद और एकेश्वरवाद का प्रभाव
- मूर्ति-पूजा और बाह्य आडंबरों का विरोध
- जाति-पाँति का विरोध
- सरल मिश्रित भाषा का प्रयोग
- समाज सुधार की भावना
प्रमुख कवि
- कबीर
- नानक
- रैदास
- दादू दयाल
(ख) प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य)
इस शाखा में प्रेम को ईश्वर प्राप्ति का मुख्य साधन माना गया है।
प्रमुख विशेषताएँ
- ईरानी सूफी दर्शन का प्रभाव
- प्रेम के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति
- प्रतीकात्मक काव्य शैली
- लोककथाओं पर आधारित प्रबंध काव्य
- मानव प्रेम का उच्च स्वरूप
प्रमुख कवि
- मलिक मुहम्मद जायसी
- कुतुबन
- मंझन
- उस्मान
मलिक मुहम्मद जायसी
जायसी सूफी परंपरा के प्रमुख कवि थे। उनका जन्म 1492 ई. में जायस (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना ‘पद्मावत’ है, जो अवधी भाषा में लिखी गई है।
पद्मावत की विशेषताएँ
- राजा रतनसेन और पद्मावती की प्रेम कथा
- अवधी भाषा में रचना
- मसनवी शैली का प्रयोग
- प्रतीकात्मक प्रेम कथा (आत्मा और परमात्मा का संबंध)
जायसी के विचार
-
प्रेम:
मानुस प्रेम भयउ बैकुंठी, नाहिं त काह छार भरि मूठी -
गुरु:
गुरु बिना ज्ञान संभव नहीं -
प्रतीकात्मकता:
पद्मावती = ईश्वर, रतनसेन = जीव - नागमती के वियोग वर्णन और बारहमासा के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध
2. सगुण भक्ति
सगुण भक्ति में ईश्वर को साकार रूप (राम और कृष्ण) में पूजा जाता है।
सगुण भक्ति की विशेषताएँ
- ईश्वर अवतार रूप में पूजित
- विष्णु के अवतारों की उपासना
- भक्ति के तीन भाव—दास्य, सखा और प्रेम
- प्रेम और समर्पण की प्रधानता
- ब्रज और अवधी भाषा का विकास
- साहित्य में उच्च काव्य सौंदर्य
सगुण भक्ति के प्रकार
(क) कृष्ण भक्ति काव्य
कृष्ण भक्ति काव्य का केंद्र मथुरा और वृंदावन था। इसका प्रचार वल्लभाचार्य ने किया।
प्रमुख विशेषताएँ
- कृष्ण को सखा और प्रिय रूप में पूजा
- कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन
- ब्रजभाषा का प्रयोग
- श्रृंगार और वात्सल्य रस की प्रधानता
प्रमुख कवि
- सूरदास
- नंददास
- कुंभनदास
प्रमुख रचना
- सूरसागर (सूरदास)
(ख) राम भक्ति काव्य
राम भक्ति का प्रचार रामानंद ने किया। इस परंपरा के कवियों ने राम को विष्णु का अवतार माना।
प्रमुख विशेषताएँ
- राम को मर्यादा पुरुषोत्तम रूप में चित्रण
- दास्य भाव की भक्ति
- अवधी और ब्रजभाषा का प्रयोग
- नैतिकता और आदर्श जीवन का चित्रण
प्रमुख कवि
- तुलसीदास
प्रमुख रचना
- रामचरितमानस (तुलसीदास)
निष्कर्ष
भक्तिकाल हिंदी साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण युग माना जाता है। इस काल में भक्ति, प्रेम, मानवता और सामाजिक समानता का अद्भुत विकास हुआ। इसने हिंदी साहित्य को न केवल धार्मिक दृष्टि से समृद्ध किया, बल्कि भाषा और साहित्य दोनों को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।
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