श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (श्रीमद्भा० 7 । 5। 23 )श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।इसी तरह एकादशधा भक्ति का भी वर्णन मिलता है। ये भक्ति के भेद नहीं भक्ति सोपान हैं। दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन क्रमशः भक्ति के उच्चतर सोपान माने जाते हैं। एकादशधा भक्ति में परम विरहसक्ति और तन्मयासत्ति चरम अवस्थाएं मानी जाती हैं। तुलसीदास की कविताएं दास्य भक्ति, सूरदास की साख्य भक्ति और कबीरदास की आत्मनिवेदन और तन्मयासत्ती का सुंदर उदाहरण हैं। कबीर आदि निराकार की चर्चा करने वाले साधक भक्ति को साधना मानते हैं, किंतु भक्ति का आधार भूत तत्व भाव है । इस दृष्टि से तुलसी दास का यह कथन ध्यातव्य है: 'भाव भगति हित बोहिया सदगुरू खेवनहार'। कबीर की कविता एम भी भाव तत्त्व और प्रेम तत्त्व की ही प्रधानता है, साधना उसका अनुषंगी है। आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने भक्ति आंदोलन की व्याख्यानकर्ते हुए भक्ति दो रूपों में विभाजित किया गया है निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति । फिर इन दोनों को भी दो-दो धाराओं में विभाजित किया। निर्गुण भक्ति परंपरा को ज्ञानमार्गी और प्रेम मार्ग की दो धाराओं में और सगुण भक्ति को कृष्ण भक्ति और राम भक्त के दो शाखों में विभाजित किया गया है। कबीर दास निर्गुण धरा की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं तो जायसी प्रेममार्गी या सूफी धारा के। सगुण घारा में सूरदास कृष्णभक्ति और तुलसी दास राम भक्ति के प्रतिमान हैं।इसलिए हिंदी साहित्य का भक्ति काल साहित्य में भक्ति के साहित्य सृजन का एक प्रतिदर्श है। यहां काव्य का केंद्रीय तत्व ही भक्ति है।हिंदी के साहित्य इतिहासकारों ने अध्ययन की सुविधा के लिए इसे पूर्व मध्यकाल भी कहा है । इसका समय संवत 1375 से लेकर संबंध 17 00 विक्रमी तक माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास नामक पुस्तक में इस काल का नामकरण भक्ति काल के रूप में किया है।कबीर तुलसी दादू नानक जायसी सूरदास मीराबाई रविदास रज्जब जैसे भक्तों की एक विस्तृत परंपरा इस युग में हमें दिखाई देती है।
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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026
भक्ति
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (श्रीमद्भा० 7 । 5। 23 )श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।इसी तरह एकादशधा भक्ति का भी वर्णन मिलता है। ये भक्ति के भेद नहीं भक्ति सोपान हैं। दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन क्रमशः भक्ति के उच्चतर सोपान माने जाते हैं। एकादशधा भक्ति में परम विरहसक्ति और तन्मयासत्ति चरम अवस्थाएं मानी जाती हैं। तुलसीदास की कविताएं दास्य भक्ति, सूरदास की साख्य भक्ति और कबीरदास की आत्मनिवेदन और तन्मयासत्ती का सुंदर उदाहरण हैं। कबीर आदि निराकार की चर्चा करने वाले साधक भक्ति को साधना मानते हैं, किंतु भक्ति का आधार भूत तत्व भाव है । इस दृष्टि से तुलसी दास का यह कथन ध्यातव्य है: 'भाव भगति हित बोहिया सदगुरू खेवनहार'। कबीर की कविता एम भी भाव तत्त्व और प्रेम तत्त्व की ही प्रधानता है, साधना उसका अनुषंगी है। आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने भक्ति आंदोलन की व्याख्यानकर्ते हुए भक्ति दो रूपों में विभाजित किया गया है निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति । फिर इन दोनों को भी दो-दो धाराओं में विभाजित किया। निर्गुण भक्ति परंपरा को ज्ञानमार्गी और प्रेम मार्ग की दो धाराओं में और सगुण भक्ति को कृष्ण भक्ति और राम भक्त के दो शाखों में विभाजित किया गया है। कबीर दास निर्गुण धरा की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं तो जायसी प्रेममार्गी या सूफी धारा के। सगुण घारा में सूरदास कृष्णभक्ति और तुलसी दास राम भक्ति के प्रतिमान हैं।इसलिए हिंदी साहित्य का भक्ति काल साहित्य में भक्ति के साहित्य सृजन का एक प्रतिदर्श है। यहां काव्य का केंद्रीय तत्व ही भक्ति है।हिंदी के साहित्य इतिहासकारों ने अध्ययन की सुविधा के लिए इसे पूर्व मध्यकाल भी कहा है । इसका समय संवत 1375 से लेकर संबंध 17 00 विक्रमी तक माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास नामक पुस्तक में इस काल का नामकरण भक्ति काल के रूप में किया है।कबीर तुलसी दादू नानक जायसी सूरदास मीराबाई रविदास रज्जब जैसे भक्तों की एक विस्तृत परंपरा इस युग में हमें दिखाई देती है।
गुरुवार, 4 सितंबर 2025
उल्टा पिरामिड
शैली की संरचना:
यह लेख का पहला भाग होता है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक जानकारी दी जाती है.
2. मुख्य भाग (बॉडी):
इस भाग में समाचार का विस्तार किया जाता है, जिसमें तथ्यों और संदर्भ का विवरण शामिल होता है.
3. निष्कर्ष (टेल/पूंछ):
छह ककार
किसी समाचार को लिखते हुए मुख्यतः छह सवालों का जवाब देने की कोशिश की जाती है क्या हुआ, किसके साथ हुआ, कहाँ हुआ, कब हुआ, कैसे और क्यों हुआ?
इस-क्या, किसके (या कौन), कहाँ, कब, क्यों और कैसे को छह ककारों के रूप में भी जाना जाता है। किसी घटना, समस्या या विचार से संबंधित खबर लिखते हुए इन छह ककारों को ही ध्यान में रखा जाता है।
ककार
समाचार के मुखड़े (इंट्रो) यानी पहले पैराग्राफ़ या शुरुआती दो-तीन पंक्तियों में आमतौर पर तीन या चार ककारों को आधार बनाकर खबर लिखी जाती है।
ये चार ककार हैं-क्या, कौन, कब और कहाँ?
इसके बाद समाचार की बॉडी में और समापन के पहले बाकी दो ककारों-कैसे और क्यों का जवाब दिया जाता है।
इस तरह छह ककारों के आधार पर समाचार तैयार होता है।
इनमें से पहले चार ककार-क्या, कौन, कब और कहाँ सूचनात्मक और तथ्यों पर आधारित होते हैं जबकि बाकी दो ककारों-कैसे और क्यों में विवरणात्मक, व्याख्यात्मक और विश्लेषणात्मक पहलू पर जोर दिया जाता है।
मात्रिक छंद
चोपाई : यह एक सम मात्रिक छन्द है। इसमें बार चरण होते हैं। प्रायेक चरण में १६ मात्राएँ होती है तथा अन्त में जगण (151) या सगणः (551) न रखने का विधान है। चौपाई के चरणान्त में (51) गुरु लघु नहीं होना चाहिए। इस छंद के दो चरणों को मिलाकर एक अर्धाली बनती है ।
उदाहरण
SIISII SI।।।।।१६।।। 11=१६ कंकन-किकिनि नूपुर घुनि सुनि। कहुत लबन सन राम हृदय गुनि ।। SIIIII SI555 = १६। 15511111155-१६ मानह मदन बुंदुभी दीन्ही । मनसा विस्व-विजय कहें कीन्ही ।।
दोहा : यह एक अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसके सम चरणों (दूसरे व बौथे चरणों) में ११-११ मात्राएँ और विषम चरणों (प्रथम व तृतीय चरणों) में १३-१३ मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार १३+११, १३+११ मात्राओं के क्रम से इसके चार चरणों का संयोजन होता है। दोहा के विषम चरणों के प्रारंभ में जगण (1S1) नहीं होना चाहिए और अन्त में (SI) गुरु लघु मात्रा के साथ सम चरणों को समाप्त होना चाहिए। अन्त में (SI) गुरु लघु का क्रम आवश्यक होता है।
उदाहरण-
11111151।।।।१३।11111151=११
रहिमन अंसुवा नयन करि, जिय दुख प्रगट करेइ ।
SIISS S। 5-१३।।।5।।।51 ११
जाहि निकारो गेह ते कस न भेद कहि देइ ।।
सोरठा : सोरठा को दोहा का उल्टा माना जाता है। दोहा के विषम बरणों (प्रथम व तृतीय) में ११-११ मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ) में १३-१३ मात्राएँ होती हैं। इस छंद में विषम चरणों के अन्त में तुक मिलता है।
उदाहरण-
111151151 = ११ ||5|| । ।। ऽ १३
लिखकर लोहित लेख, हब गया दिनमणि अहा ।
SISITISI-११ 51111।ऽऽ १३
ब्योम-सिन्धु सखि देख, तारक बुद बुद दे रहा ।।
बुधवार, 3 सितंबर 2025
लक्षणा
https://www.youtube.com/watch?v=hmqPmtxPCAI
मुख्यार्थ को छोड़ कर उससे संबंधित और संगत अर्थ को संकेतित करने वाली शब्द शक्ति लक्षणा है। पूर्वोक्त अभिमान में बना' वाक्य में 'डबना शब्द का अर्थ 'भरा होना लक्षणा शक्ति का ही परिणाम है। 'डबना का मुख्य अर्थ जब बाधित हो गया तब लक्षणा ने अपना कार्य किया और उसने लक्ष्यार्थ को सूचित किया।
जब वक्ता मुख्यार्थ या वाच्यार्थ से अपने भाव को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता, तब वह लक्षणा शक्ति का उपयोग करता है। इस प्रकार 'लक्षणा' के लिए तीन शर्ते मान्य है ।
१. मुख्यार्थ बाध,
२. मुख्यार्थ सम्बन्ध,
३. प्रयोजन रूढ़ि
लक्षणा के भेद : मुख्यार्थ बाघ होने पर उससे संबद्ध दूसरा संगत अर्थ जव
किसी धर्म या गुण के आधार पर व्यक्त होता है, तब गौणी लक्षणा होती है। 'चौकन्ना होना' में 'चौकन्ना' शब्द का मुख्यार्थ है- 'चार कानों वाला' । इसका लक्ष्यार्थ 'सावधान' है। इन दोनों अर्थों पर ध्यान देने पर स्पष्ट होता है कि मुख्यार्थ के बाधित होने पर भी उसका लक्ष्यार्थ से सादृश्य संबंध है। इसीलिए यहाँ गोणी लक्षणा है।
हम पुलिस को देखकर कहते हैं कि 'लाल पगड़ी' जा रही है। यहाँ 'लाल पगड़ी' शब्द का मुख्यार्थ बाधित हो गया है। उसका पुलिस अर्थ हमे लक्षणा शक्ति से ज्ञात हुआ है। 'लाल पगड़ी' और 'पुलिस' में किसी धर्म या गुण की समानता नहीं है। 'लाल पगड़ी' तो धारण की जाने वाली एक बस्तु है। पुलिस उसे धारण करने वाला व्यक्ति है। इस प्रकार यहाँ गुण-सादृश्य सम्बन्ध न होकर दूसरे प्रकार का सम्बन्ध उपस्थित है। ऐसी स्थिति में 'लाल पगड़ी' का लक्ष्यार्थ 'पुलिस' सूचित करने वाली शक्ति को शुद्ध लक्षणा वहते हैं।
लक्षणा को प्रयोजन और उसकी रूढ़ स्थिति के आधार पर दो श्रेणियों में बाँटा गया है- (१) रूढ़ि लक्षणा (२) प्रयोजनवती लक्षणा । रूढ़ि लक्षणा में रूढ़ि के अनुसार लक्षणा होती है। रूढ़ि का अर्थ प्राचीन प्रयोग समझना चाहिए । एक उदाहरण लीजिए -
'तैमूर के आक्रमण का समाचार सुनकर सारा देश भयभीत हो उठा' । यहाँ 'सारा देश' का अर्थ 'सम्पूर्ण देशवासी' है। प्राचीन प्रयोग में ही 'देश' का 'देशवासी' अर्थ रूढ़ हो उठा है। यह अर्थ लक्ष्यार्थ होते हुए भी रूढ़ है। इस-लिए यहाँ 'रूढ़ि लक्षणा' है ।
जब लक्षणा शक्ति का उपयोग प्रयोजन के अनुसार किया जाता है, तब 'प्रयोजनवती लक्षणा' सिद्ध होती है। काशी नगरी गंगों पर दसी हैं' में 'गंगा पर' का सामान्य अर्थ 'गंगा की धारा पर' होता है, किन्तु कोई नगरी नदी की धारा पर नहीं बस सकती । यहाँ 'गंगा पर' से प्रयोजन है 'गंगा तट पर', इसलिए प्रयोजनवती लक्षणा के कारण इसका अर्थ हुआ 'काशी नगरी गंगा के तट पर बसी है' ।
काव्य में दो वस्तुओं के बीच जब उपमा दी जाती है तब जिसकी उपमा दी जाती है उसे उपमेय और जिससे उपमा की जाती हैं उसे उपमान कहते हैं। उपमेय और उपमान दोनों का एक साथ कथन करने की क्रिया 'आरोप' कह-लाती है। ऐसी स्थिति में सारोपा लक्षणा मान्य होती है।
जब केवल उपमान का कथन होता है और इस रूप में उपमान उपमेया पर छा जाता है तब साध्यवसाना लक्षणा मानी जाती है। अध्यवसान का अर्थ है 'छ। जाना' । 'खेलते दो खंजन सुकुमार' में दो खंजन आँखों के उपमान हैं। इस कथन में उपमान तो कथित हुआ है पर उण्पेय का कथन नहीं है। इस लिए यहाँ 'साध्यवसाना लक्षणा' है ।
लक्षणा के विविध रूपों का अध्ययन करने के पश्चात् यह कहा जा सकता है कि लक्षणा के निम्नांकित भेद हैं-
1. गोणी लक्षणा और शुद्ध लक्षणा ।
२. रूढ़ि लक्षणा और प्रयोजनवती लक्षणा ।
३. सारोरा लक्षणा और साध्यवसाना लक्षणा ।
अभिधा शब्द शक्ति (Denotation):
यह शब्द की वह शक्ति है जो उसके पूर्व निर्धारित या मुख्य अर्थ का बोध कराती है, जिसे अभिधेयार्थ या मुख्यार्थ कहते हैं.
- शब्द के अर्थ का निर्धारण व्यवहार, आप्त वाक्य, कोश और व्याकरण द्वारा होता है.
- मुख्यार्थ को व्यक्त करने वाले शब्द 'वाचक शब्द' कहलाते हैं, जो तीन प्रकार के होते हैं:
- रूढ़ शब्द: वे शब्द जिनके खंड करने पर कोई अर्थ नहीं निकलता और जिनका अर्थ पूर्व निर्धारित होता है (जैसे: जल, कमल).
- यौगिक शब्द: वे शब्द जिनका खंड किया जा सकता है और जिनमें उपसर्ग या प्रत्यय का योग होता है (जैसे: दासता, अनुचित).
- योगरूढ़ शब्द: वे शब्द जो यौगिक होते हुए भी रूढ़ अर्थ प्रकट करते हैं, यानी उनके खंड किए जा सकते हैं लेकिन वे किसी विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो जाते हैं (जैसे: पंकज - 'पंक' और 'ज' का योग, जिसका शाब्दिक अर्थ 'कीचड़ में उत्पन्न होने वाला' है, लेकिन यह केवल कमल के लिए रूढ़ हो गया है).
- कुछ वाचक शब्द एकार्थक होते हैं (जैसे: पुस्तक) और कुछ अनेकार्थक (जैसे: गोली, टीका, कर), जिनका अर्थ संदर्भ के अनुसार बदलता है.

