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सोमवार, 15 जून 2026

बादल को घिरते देखा है

  •  नागार्जुन

यह कविता नागार्जुन की प्रसिद्ध प्रकृति-वर्णनात्मक कविता है। इसमें कवि ने हिमालय की अद्भुत प्राकृतिक छटा और वहाँ के मनोहारी दृश्यों का सजीव चित्रण किया है। कवि बार-बार "बादल को घिरते देखा है" कहकर अपने प्रत्यक्ष अनुभवों को व्यक्त करता है।

कवि बताता है कि उसने हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों पर बादलों को घिरते देखा है। मानसरोवर झील के स्वर्णिम कमलों पर ओस की बूँदों को मोतियों की तरह गिरते देखा है। हिमालय की झीलों में वर्षा ऋतु की उमस से व्याकुल हंसों को तैरते हुए देखा है।

वसंत ऋतु के सुंदर वातावरण में कवि ने चकवा-चकवी के प्रेम और उनके प्रणय-कलह का दृश्य भी देखा है। दुर्गम बर्फीली घाटियों में कस्तूरी मृग को अपनी ही सुगंध के पीछे भटकते हुए देखा है। आगे कवि पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए कुबेर की अलकापुरी और कालिदास के मेघदूत की स्मृति करता है, परंतु वह बताता है कि उसने स्वयं कैलाश पर्वत पर विशाल बादलों को प्रचंड हवाओं से टकराते देखा है।

अंतिम भाग में कवि हिमालय के देवदारु वनों, झरनों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच रहने वाले किन्नर-किन्नरियों के संगीत, नृत्य और आनंदमय जीवन का चित्र प्रस्तुत करता है। इस प्रकार कविता हिमालय की भव्यता, प्रकृति की सुंदरता और कवि के प्रत्यक्ष अनुभवों का अत्यंत जीवंत वर्णन करती है।

मुख्य भाव

यह कविता हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता, रहस्य, वैभव और प्रकृति के प्रति कवि के गहरे आकर्षण तथा अनुभूतियों को व्यक्त करती है। कवि ने प्रकृति के विविध रूपों का अत्यंत सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है।


जाग तुझको दूर जाना

महादेवी वर्मा 



 चिर सजग आँखे उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!

जाग तुझको दूर जाना!


अचल हिमगिरी के ह्रदय में आज चाहे कंप हो ले,

या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;


आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,

जागकर विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफ़ान बोले!


पर तुझे है नाश-पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!

जाग तुझको दूर जाना!


बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?

पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?


विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,

क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?


तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!

जाग तुझको दूर जाना!


वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया,

दे किसे जीवन सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?


सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?

विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया?


अमरता-सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?

जाग तुझको दूर जाना!


कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,

आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;


हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,

राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!


है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!

जाग तुझको दूर जाना!

रविवार, 14 जून 2026

भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है

  • भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?

भारतेंदु हरिश्चंद्र 



आज बड़े आनंद का दिन है कि छोटे-से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है। बनारस ऐसे-ऐसे बड़े नगरों में जब कुछ नहीं होता तो हम यह न कहेंगे कि बलिया में जो कुछ हमने देखा वह बहुत ही प्रशंसा के योग्य है। इस उत्साह का मूल कारण जो हमने खोजा, तो प्रकट हो गया कि इस देश के भाग्य से आजकल यहाँ सारा समाज ही एकत्र है। जहाँ राबर्ट साहब बहादुर जैसे कलेक्टर जहाँ हो, वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो। जिस देश और काल में ईश्वर ने अकबर को उत्पन्न किया था उसी में अबुल फज़ल, बीरबल, टोडरमल को भी उत्पन्न किया। यहाँ राबर्ट साहब अकबर हैं, जो मुंशी चतुर्भुज सहाय, मुंशी बिहारीलाल साहब आदि अबुलफज़ल और टोडरमल हैं। हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी है। यद्यपि फ़र्स्ट क्लास, सैकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी है पर बिना इंजिन सब नहीं चल सकती, वैसी ही हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो, तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए, का चुप साधि रहा बलवाना फिर देखिए कि हनुमान जी को अपना बल कैसे याद आता है। सो बल कौन याद दिलावे या हिंदुस्तानी राजे—महाराजे या नवाब-रईस या हाकिम। राजे-महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छुट्टी नहीं। हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है, कुछ बाॉल, घुड़दौड़, थिएटर, अख़बार में समय लगा। कुछ समय बचा भी तो उनको क्या ग़रज़ है कि हम ग़रीब, गंदे, काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवैं। बस वही मसल रही—तुम्हें ग़ैरों से कब फ़ुरसत, हम अपने ग़म से कब ख़ाली। चलो, बस हो चुका मिलना न हम ख़ाली न तुम ख़ाली॥ तीन मेंढ़क एक के ऊपर एक बैठे थे। ऊपरवाले ने कहा, 'ज़ौक़ शौक़', बीचवाला बोला, 'ग़म सुम', सबके नीचेवाला पुकारा, 'गए हम'। सो हिंदुस्तान की साधारण प्रजा की दशा यही है—'गए हम'।

पहले भी जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आकर बसे थे, राजा और ब्राह्मणों के ज़िम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलावैं और अब भी ये लोग चाहैं तो हिंदुस्तान प्रतिदिन कौन कहै, प्रतिछिन बढ़ैं। पर इन्हीं लोगों को सारे संसार के निकम्मेपन ने घेर रखा है। “बौद्धारो मत्सरग्रस्ता अभवः समरदूषिताः” हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जब इनके पुरुषों  के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठकर बाँस की नालियों से जो तारा, ग्रह आदि वेध करने उनकी गति लिखी है, वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुपए की लागत से विलायत में जो दूरबीन बनी है उनसे उन ग्रहों को वेध करने में भी वही गति ठीक आती है और जब आज इस काल में हम लोगों को अँग्रेज़ी विद्या की ओर जगत की उन्नति की कृपा से लाखों पुस्तकें और हज़ारों यंत्र तैयार हैं। तब हम लोग निरी चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी बना रहे हैं। यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन, ‍‍अँग्रेज़, फ्रांसीस आदि तुर्की-ताज़ी सब सरपट्ट दौड़े जाते हैं। सबके जी में यही है कि पाला हमीं पहले छू लें। उस समय हिंदू काठियावाड़ी ख़ाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं। इनको, औरों को जाने दीजिए, जापानी टट्टुओं को हाँफते हुए दौड़ते देखकर के भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जाएगा, फिर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सकैगा। इस लूट में, इस बरसात में भी जिसके सिर पर कमबख़्ती का छाता और आँखों में मूर्खता की पट्टी बँधी रहे उन पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए।


मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज कुछ कहो कि हिंदुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है। भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ ‘भागवत’ में एक श्लोक है—नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरु कर्णधारं।मयाsनुकूलेन नभ: स्वतेरितुं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा। भगवान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जनम ही दुर्लभ है, सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और उस पर मेरी अनुकूलता। इतना सामान पाकर भी जो मनुष्य इस संसार-सागर के पार न जाए, उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए। वही दशा इस समय हिंदुस्तान की है। अँग्रेज़ों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पाकर भी हम लोग जो इस समय उन्नति न करैं तो हमारे केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है। सास के अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंगमहल में जाकर भी बहुत दिन से जिस प्रान से प्यारे परदेसी पति से मिलकर छाती ठंडी करने की इच्छा थी, उसका लाज से मुँह भी न देखै और बोलै भी न, तो उसका अभाग्य ही है। वह तो कल फिर परदेस चला जाएगा। वैसे ही अँग्रेज़ों के राज्य में भी जो हम कुँए के मेंढ़क, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम ही रहैं तो हमारी कमबख़्त कमबख़्ती फिर कमबख़्ती है।

बहुत लोग यह कहैंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती बाबा, हम क्या उन्नति करैं? तुम्हारा पेट भरा है तुम को दून की सूझती है। यह कहना उनकी बहुत भूल है।  इंग्लैंड का पेट भी कभी यों ही ख़ाली  था। उसने एक हाथ से अपना पेट भरा, दूसरे हाथ से उन्नति के काँटों को साफ़ किया। क्या इंग्लैंड में किसान, खेतवाले, गाड़ीवान, मज़दूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते। किंतु वे लोग जहाँ खेत जोतते-बोते  हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी और कौन नई कल या मसाला बनावैं, जिसमें  इस खेत में आगे से दूना अन्न उपजे। विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अख़बार पढ़ते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अख़बार निकाला। यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी। वहाँ के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध छाँटते हैं। सिद्धांत यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाए। उसके बदले यहाँ के लोगों को जितना निकम्मापन हो उतना ही वह बड़ा अमीर समझा जाता है। आलस यहाँ इतनी बढ़ गई कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला—अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम। दास मलूका कहि गए, सबके दाता राम॥ चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करने वालों की ही चारों ओर बढ़ती है। रोज़गार कहीं कुछ भी नहीं है, अमीरों की मुसाहबी, दल्लाली या अमीरों के नौजवान लड़कों को ख़राब करना या किसी की जमा मार लेना, इनके सिवा बतलाइए और कौन रोज़गार है। जिससे कुछ रुपया मिलै। चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुई है। किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र कुटुंबी इस तरह अपनी इज़्ज़त को बचाता फिरता है, जैसे लाजवंती कुल की बहू फटे कपड़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है। वही दशा हिंदुस्तान की है।


मुर्दमशुमारी की रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन-दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन-दिन कमती होता जाता है। तो अब बिना ऐसा उपाय किए काम नहीं चलैगा कि रुपया भी बढ़ै और वह रुपया बिना बुद्धि बढे न बढ़ैगा। भाइयों, राजा-महाराजों का मुँह मत देखो, मत यह आशा रखो कि पंडित जी कथा में ऐसा कोई उपाय भी  बतलावैंगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े। तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो। कब तक अपने को  जंगली, हूस, मूर्ख, बोदे, डरपोकने  पुकरवाओगे। दौड़ो,  इस घुड़दौड़ में जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है। “फिर कब राम जनकपुर एहैं' अबकी जो पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहुँचोगे। जब पृथ्वीराज को क़ैद करके गोर ले गए तो शहाबुद्दीन के भाई गयासुद्दीन से किसी ने कहा कि वह शब्दबेधी बाण बहुत अच्छा मारता है। एक दिन सभा नियत हुई और सात लोहे के तावे बाण से फोड़ने को रखे गए। पृथ्वीराज को लोगों ने पहले ही से अंधा कर दिया था। संकेत यह हुआ कि जब गयासुद्दीन 'हूँ' करे तब वह तावों पर बाण मारे। चंद कवि भी उसके साथ क़ैदी था। यह सामान देखकर उसने यह दोहा पढ़ा—अबकी चढ़ी कमान, को जानै फिर कब चढ़ै। जिन चूक्के चौहाण, इक्के मारय इक्क सर। उसका संकेत समझकर जब गयासुद्दीन ने 'हूँ' किया तो पृथ्वीराज ने उसी को बाण मार दिया। वही बात अब है। अबकी चढ़ी, इस समय में सरकार का राज्य पाकर और उन्नति का इतना सामान पाकर भी तुम लोग अपने को न सुधारो तो तुम्हीं रहो और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो। धर्म में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोज़गार में, शिष्टाचार में, चाल-चलन में, शरीर के बल में, मन के बल में, समाज में, बालक में, युवा में, वृद्ध में, स्त्री में, पुरुष में, अमीर में, गरीब में, भारतवर्ष की सब अवस्था , सब जाति सब देश में उन्नति करो। सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटक हों, चाहे तुम्हैं लोग निकम्मा कहैं या नंगा कहैं, कृस्तान कहें या भ्रष्ट कहैं। तुम केवल अपने देश की दीनदशा को देखो और उनकी बात मत सुनो।

अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः


स्वकार्य्यं साधयेत् धीमान् कार्य्यध्वंसो हि मूर्खता।

जो लोग अपने को देश-हितैषी लगाते हों, वह अपने सुख को होम करके, अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो। देखादेखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा। अपनी ख़राबियों के मूल कारणों को खोजो। कोई धर्म की आड़ में, कोई देश की चाल की आड़ में, कोई सुख की आड़ में छिपे हैं। उन चोरों को वहाँ-वहाँ से पकड़-पकड़कर लाओ। उनको बाँध-बाँधकर क़ैद करो। हम इससे बढ़कर क्या कहें कि जैसे तुम्हारे घर में कोई पुरुष व्याभिचार करने आवै तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शक्ति होगी उसका सत्यानाश करोगे। उसी तरह इस समय जो-जो बातैं तुम्हारे उन्नति-पथ में काँटा हों, उनकी जड़ खोदकर फेंक दो। कुछ मत डरो। जब तक सौ-दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जाएँगे, दरिद्र न हो जाएँगे, क़ैद न होंगे वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोई देश भी न सुधरैगा।


अब यह प्रश्न होगा कि भाई, हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधरना किस चिड़िया का नाम है। किसको अच्छा समझैं। क्या लें, क्या छोड़ैं? तो कुछ बातैं जो इस शीघ्रता से मेरे ध्यान में आती हैं उनको मैं कहता हूँ सुनो—

सब उन्नतियों का मूल धर्म है। इससे सबसे पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है। देखो अँग्रेज़ों की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली है, इससे उनकी दिन-दिन कैसी उन्नति हुई है। उनको जाने दो, अपने ही यहाँ देखो! तुम्हारे यहाँ धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति, समाज-गठन, वैद्यक आदि भरे हुए हैं। दो-एक मिसाल सुनो। यही तुम्हारा बलिया का मेला और यहाँ स्नान क्यों बनाया गया है? जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते, दस-दस, पाँच-पाँच कोस से वे लोग एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें। एक-दूसरे का दुःख-सुख जानैं। गृहस्थी के काम की वह चीज़ें जो गाँव में नहीं मिलतीं यहाँ से ले जाएँ। एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिसमें महिने में दो-एक उपवास से शरीर शुद्ध हो जाए। गंगा जी नहाने जाते हैं तो पहले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर पर डालने का विधान क्यों है? जिसमें तलुए से गर्मी सिर में चढ़कर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने साल भर में एक बेर तो सफ़ाई हो जाए। होली इसी हेतु है कि बसंत की बिगड़ी हवा स्थान-स्थान पर अग्नि जलने से स्वच्छ हो जाए। यही तिहवार ही तुम्हारी म्युनिसिपालिटी है। ऐसे ही सब पर्व, सब तीर्थ, व्रत आदि में कोई हिकमत ही है। उन लोगों ने धर्मनीति और समाजनीति को दूध-पानी की भाँति मिला दिया है। ख़राबी जो बीच में भई है वह यह कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मानने लिखे थे, इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धर्म मान लिया। भाइयो, वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है। ये सब तो समाज धर्म हैं जो देश काल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं। दूसरी ख़राबी यह हुई कि उन्हीं महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों ने अपने बाप-दादों का मतलब न समझकर बहुत से नए-नए धर्म बनाकर शास्त्रों में धर दिए। बस सभी तिथि-व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए। सो इन बातों को अब एक बेर आँख खोलकर देख और समझ लीजिए कि फलानी बात उन बुद्धिमान ऋषियों ने क्यों बनाई और उनमें देश और काल के जो अनुकूल और उपकारी हों, उनका ग्रहण कीजिए। बहुत-सी बातैं जो समाज-विरुद्ध मानी हैं, किंतु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है, उनको मत चलाइए। जैसा जहाज़ का सफ़र, विधवा-विवाह आदि। लड़कों की छोटेपन ही में शादी करके उनका बल, वीर्य, आयुष्य सब मत घटाइए। आप उनके माँ-बाप हैं या उनके शत्रु हैं? वीर्य उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए; नोन, तेल लकड़ी की फ़िक्र करने की बुद्धि सीख लेने दीजिए—तब उनका पैर काठ में डालिए। कुलीन-प्रथा, बहु-विवाह आदि को दूर कीजिए। लड़कियों को भी पढ़ाइए, किंतु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुलधर्म सीखें, पति की भक्ति करैं और लड़कों को सहज में शिक्षा दें। वैष्णव, शाक्त इत्यादि नाना प्रकार के लोग आपस का वैर छोड़ दें। यह समय इन झगड़ों का नहीं। हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए। जाति में कोई चाहे ऊँचा हो चाहे नीचा हो, सबका आदर कीजिए, जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए। छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए। सब लोग आपस में मिलिए।


मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिंदुस्तान में बसकर वे लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें। ठीक भाइयों की भाँति हिंदुओं से बरताव करैं। ऐसी बात, जो हिंदुओं का जी दुखाने वाली हों, न करें। घर में आग लगै, सब जिठानी-द्यौरानी को आपस का डाह छोड़कर एक साथ वह आग बुझानी चाहिए। जो बात हिंदुओं को नहीं मयस्सर है वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त है। उनमें  जाति नहीं, खाने-पीने में चौका-चूल्हा नहीं, विलायत जाने में रोक-टोक नहीं, फिर भी बड़े ही सोच की बात है, मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी। अभी तक बहुतों को यही ज्ञात है कि दिल्ली, लखनऊ की बादशाहत क़ायम है। यारो! वे दिन गए। अब आलस, हठधर्मी यह सब छोड़ो। चलो, हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो, एक-एक-दो होंगे। पुरानी बातैं दूर करो। मीरहसन की ‘मसनवी’ और इंदरसभा पढ़ाकर छोटेपन ही से लड़कों का सत्यानाश मत करो। होश संभाला नहीं कि पट्टी पार ली,  चुस्त कपड़ा पहनना और ग़ज़ल गुनगुनाए—शौक़ तिफ़्ली से मुझे गुल की जो दीदार का था। न किया हमने गुलिस्ताँ का सबक़ याद कभी॥ भला सोचो कि इस हालत में बड़े होने पर वे लड़के क्यों न बिगड़ैंगे। अपने लड़कों को ऐसी किताबैं छूने भी मत दो। अच्छी-से-अच्छी उनको तालीम दो। पिनशिन और वज़ीफ़ा या नौकरी का भरोसा छोड़ो। लड़कों को रोज़गार सिखलाओ। विलायत भेजो। छोटेपन से मेहनत करने की आदत दिलाओ। सौ-सौ महलों के लाड़-प्यार दुनिया से बेख़बर रहने की राह मत दिखलाओ।

भाई हिंदुओं! तुम भी मत-मतांतर का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जप करो। जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग, जाति का क्यों ना हो, वह हिंदू। हिंदू की सहायता करो। बंगाली, मराठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमानों सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिससे तुम्हारे यहाँ बढ़ै, तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहै वह करो। देखो, जैसे हज़ार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली है वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हज़ार तरह से इंग्लैंड, फ्रांसीसी, जर्मनी, अमेरिका को जाती है। दीयासलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है। ज़रा अपने ही को देखो। तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बनी है। जिस लंकिलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंग्लैंड का है। फ्रांसीसी की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तुम्हारे सामने जल रही है। यह तो वही मसल हुई एक बेफ़िकरे मँगती का कपड़ा पहिनकर किसी महफ़िल में गए। कपड़े को पहिचानकर एक ने कहा, 'अजी अंगा तो फलाने का है।' दूसरा बोला, 'अजी टोपी भी फलाने की है।' तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि 'घर की तो मूछैं ही मूछैं हैं।' हाय अफ़सोस, तुम ऐसे हो गए कि अपने निज की काम की वस्तु भी नहीं बना सकते। भइयों, अब तो नींद से चौंको, अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी बातचीत करो। परदेसी वस्तु और परदेसी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने में अपनी भाषा में उन्नति करो।


खानाबदोश

  •  ओम प्रकाश बाल्मीकी 

 

कहानी का सारांश

'खानाबदोश' हिंदी के प्रसिद्ध दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखी गई एक मार्मिक कहानी है। यह कहानी ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले गरीब मजदूरों के जीवन-संघर्ष, शोषण, जातिगत भेदभाव और उनके सपनों के टूटने की त्रासदी को प्रस्तुत करती है।

कहानी के मुख्य पात्र सुकिया और मानो हैं, जो गरीबी और अभाव से मुक्ति पाने के लिए अपने गाँव को छोड़कर एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करने आते हैं। दोनों मेहनत से ईंटें बनाते हैं और अपनी आय बढ़ाने का प्रयास करते हैं। भट्ठे पर काम करते हुए मानो के मन में अपने गाँव में पक्की ईंटों का एक छोटा-सा घर बनाने का सपना जन्म लेता है। यह सपना उनके जीवन का लक्ष्य बन जाता है और वे अधिक मेहनत करके पैसे बचाने लगते हैं।

भट्ठे का मालिक मुख्तार सिंह और उसका बेटा सूबेसिंह मजदूरों का शोषण करते हैं। सूबेसिंह की बुरी नज़र मजदूर महिलाओं पर रहती है। वह पहले किसनी नामक महिला को अपने प्रभाव में ले लेता है और बाद में मानो को भी फँसाने की कोशिश करता है। जब मानो उसके इरादों के सामने झुकने से इनकार करती है, तो वह उसे और सुकिया को परेशान करने लगता है।

इस दौरान जसदेव नामक एक युवा मजदूर मानो का साथ देने का प्रयास करता है, लेकिन सूबेसिंह उसे बुरी तरह पीट देता है। भय और स्वार्थ के कारण बाद में जसदेव भी उनसे दूरी बना लेता है। दूसरी ओर सुकिया और मानो अपने सपने को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करते रहते हैं।

सूबेसिंह उनकी प्रगति से जलता है और उन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए षड्यंत्र रचता है। एक दिन रात में उनकी मेहनत से बनाई गई कच्ची ईंटों को किसी के द्वारा तोड़ दिया जाता है। उनकी सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है और उन्हें मजदूरी भी नहीं मिलती। यह घटना उनके पक्के घर के सपने को चकनाचूर कर देती है।

अंततः निराश होकर सुकिया और मानो भट्ठा छोड़ देते हैं और एक नए ठिकाने की तलाश में निकल पड़ते हैं। वे फिर से खानाबदोश बन जाते हैं। कहानी का अंत अत्यंत मार्मिक है, जहाँ अपने सपनों के टूटने की पीड़ा के साथ वे अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ जाते हैं।

कहानी का संदेश

यह कहानी समाज में व्याप्त आर्थिक शोषण, जातिगत भेदभाव, स्त्री-उत्पीड़न और मजदूरों की असुरक्षित स्थिति को उजागर करती है। साथ ही यह बताती है कि गरीब मजदूर दूसरों के लिए घर बनाते हैं, लेकिन स्वयं जीवनभर अपने घर के सपने के लिए भटकते रहते हैं। "खानाबदोश" शोषित वर्ग के संघर्ष, स्वाभिमान और टूटते सपनों की अत्यंत संवेदनशील कहानी है।

उसकी माँ

  


लेखक : पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’

सारांश

‘उसकी माँ’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित एक अत्यंत मार्मिक कहानी है। इसमें एक क्रांतिकारी युवक लाल, उसकी त्यागमयी माँ जानकी, और एक जमींदार कथावाचक के माध्यम से देशभक्ति, मातृत्व और औपनिवेशिक शासन की क्रूरता का चित्रण किया गया है।

कहानी का आरंभ तब होता है जब पुलिस सुपरिंटेंडेंट कथावाचक से लाल के बारे में पूछताछ करने आता है। कथावाचक को पता चलता है कि सरकार लाल की गतिविधियों पर नज़र रख रही है। लाल एक कॉलेज छात्र है, जो देश की पराधीनता से दुखी है और अंग्रेज़ी शासन का विरोध करता है। उसकी माँ जानकी एक सरल, भोली और ममतामयी स्त्री है, जिसे अपने बेटे और उसके मित्रों पर गर्व है। वह उन सभी युवकों को अपने बच्चों की तरह प्यार करती है।

लाल और उसके साथी देश की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी विचार रखते हैं। वे अंग्रेज़ी शासन को अन्यायपूर्ण और शोषणकारी मानते हैं। धीरे-धीरे पुलिस को उनके क्रांतिकारी कार्यों का संदेह होता है। एक दिन पुलिस छापा मारकर लाल और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लेती है। उन पर षड्यंत्र, विद्रोह और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं।

जानकी को विश्वास नहीं होता कि उसका बेटा अपराधी हो सकता है। वह अदालतों, वकीलों और जेलों के चक्कर लगाती रहती है। अपने बर्तन, गहने और घर का सामान बेचकर वह जेल में बंद युवकों के लिए भोजन पहुँचाती है। वह उन्हें अपने बेटे समान समझती है और अंत तक उनके निर्दोष होने की आशा बनाए रखती है।

लंबे मुकदमे के बाद अदालत लाल और उसके कुछ साथियों को फाँसी तथा अन्य को कठोर कारावास की सज़ा सुनाती है। सज़ा सुनाए जाने पर भी लाल और उसके साथी विचलित नहीं होते। वे हँसते हुए अपनी माँ को सांत्वना देते हैं और स्वतंत्रता के आदर्शों के लिए बलिदान को गौरवपूर्ण मानते हैं।

फाँसी से पहले लाल अपनी माँ को एक अंतिम पत्र लिखता है, जिसमें वह मृत्यु को एक नए मिलन और स्वतंत्रता की ओर यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह पत्र पढ़कर भी जानकी स्तब्ध रह जाती है। उसके भीतर का सारा दुःख मानो पत्थर बन जाता है। अंततः पुत्र-वियोग की असहनीय पीड़ा सह न पाने के कारण वह घर के बाहर बैठी-बैठी प्राण त्याग देती है।

कहानी का उद्देश्य

यह कहानी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों के त्याग, मातृबलिदान और अंग्रेज़ी शासन की कठोरता को उजागर करती है। लेखक ने दिखाया है कि स्वतंत्रता केवल क्रांतिकारियों के बलिदान से नहीं, बल्कि उनकी माताओं के अनकहे त्याग और पीड़ा से भी प्राप्त हुई है।

मुख्य संदेश

  • मातृत्व का सर्वोच्च त्याग और प्रेम।
  • देशभक्ति एवं स्वतंत्रता के लिए बलिदान का महत्व।
  • औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों की आलोचना।
  • क्रांतिकारियों के प्रति समाज के भय और उदासीनता का चित्रण।

‘उसकी माँ’ केवल एक माँ की कथा नहीं, बल्कि उन असंख्य भारतीय माताओं को श्रद्धांजलि है जिन्होंने अपने पुत्रों को देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान होते देखा।

‘उसकी माँ’ – महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

1. ‘उसकी माँ’ कहानी के लेखक कौन हैं?

उत्तर: ‘उसकी माँ’ कहानी के लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ हैं।


2. कहानी का मुख्य पात्र कौन है?

उत्तर: कहानी का मुख्य पात्र लाल है, जो एक युवा क्रांतिकारी है। उसकी माँ जानकी भी कहानी का प्रमुख पात्र है।


3. लाल की माँ का नाम क्या था?

उत्तर: लाल की माँ का नाम जानकी था।


4. पुलिस सुपरिंटेंडेंट कथावाचक से किसके बारे में पूछताछ करता है?

उत्तर: पुलिस सुपरिंटेंडेंट लाल के बारे में पूछताछ करता है।


5. लाल के पिता कौन थे?

उत्तर: लाल के पिता रामनाथ थे, जो कथावाचक की जमींदारी के मुख्य मैनेजर थे।


6. लाल का स्वभाव कैसा था?

उत्तर: लाल साहसी, तेजस्वी, देशभक्त और क्रांतिकारी विचारों वाला युवक था।


7. लाल अंग्रेज़ी शासन के बारे में क्या सोचता था?

उत्तर: लाल अंग्रेज़ी शासन को अन्यायपूर्ण, शोषणकारी और दमनकारी मानता था तथा उसका विरोध करता था।


8. जानकी अपने बेटे और उसके मित्रों के साथ कैसा व्यवहार करती थी?

उत्तर: जानकी उन्हें अपने बच्चों की तरह प्यार करती थी और उनके लिए भोजन बनाकर खिलाती थी।


9. लड़कों ने जानकी की तुलना किससे की थी?

उत्तर: लड़कों ने जानकी की तुलना भारत माता से की थी।


10. पुलिस को लाल के घर से क्या मिला?

उत्तर: पुलिस को लाल के घर से पिस्तौल, कारतूस और क्रांतिकारी पत्र मिले।


11. लाल और उसके साथियों पर कौन-कौन से आरोप लगाए गए?

उत्तर: उन पर षड्यंत्र, विद्रोह, हत्या और सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना बनाने के आरोप लगाए गए।


12. जानकी अपने बेटे के लिए क्या-क्या त्याग करती है?

उत्तर: जानकी अपने गहने, बर्तन और घरेलू सामान बेचकर जेल में बंद लड़कों के लिए भोजन पहुँचाती है और उनकी पैरवी के लिए प्रयास करती है।


13. अदालत ने लाल को क्या सजा दी?

उत्तर: अदालत ने लाल को फाँसी की सजा दी।


14. फाँसी की सजा सुनने के बाद लाल का व्यवहार कैसा था?

उत्तर: लाल निडर और प्रसन्न दिखाई देता है। वह अपनी माँ को सांत्वना देता है।


15. लाल ने अपनी अंतिम चिट्ठी में क्या लिखा?

उत्तर: लाल ने लिखा कि मृत्यु के बाद भी वह अपनी माँ से अलग नहीं होगा और वे पुनः मिलेंगे।


16. जानकी की मृत्यु कैसे हुई?

उत्तर: पुत्र-वियोग के दुःख और मानसिक आघात के कारण जानकी अपने घर के बाहर बैठी-बैठी प्राण त्याग देती है।


17. कहानी का शीर्षक ‘उसकी माँ’ क्यों रखा गया है?

उत्तर: क्योंकि कहानी का केंद्र बिंदु लाल की माँ जानकी का त्याग, ममता और पुत्र-प्रेम है।


18. कहानी में अंग्रेज़ी शासन का कौन-सा रूप दिखाई देता है?

उत्तर: अंग्रेज़ी शासन का दमनकारी, क्रूर और शोषणकारी रूप दिखाई देता है।


19. ‘उसकी माँ’ कहानी का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: स्वतंत्रता केवल क्रांतिकारियों के बलिदान से नहीं, बल्कि उनकी माताओं के त्याग और पीड़ा से भी प्राप्त हुई है।


20. कहानी में मातृत्व का कौन-सा रूप चित्रित हुआ है?

उत्तर: निस्वार्थ प्रेम, त्याग, समर्पण और असीम वात्सल्य का आदर्श रूप चित्रित हुआ है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. जानकी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
जानकी एक आदर्श भारतीय माँ है। वह सरल, भोली, ममतामयी, त्यागमयी और सहनशील है। वह अपने बेटे लाल तथा उसके मित्रों को समान स्नेह देती है। पुत्र के जेल जाने पर भी वह उसके लिए भोजन पहुँचाती है और उसके निर्दोष होने का विश्वास बनाए रखती है। अंततः पुत्र-वियोग सहन न कर पाने के कारण उसका जीवन समाप्त हो जाता है।


2. ‘उसकी माँ’ कहानी में देशभक्ति की भावना किस प्रकार व्यक्त हुई है?

उत्तर:
कहानी में लाल और उसके साथी देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान करने को तैयार रहते हैं। वे अंग्रेज़ी शासन का विरोध करते हैं और फाँसी की सजा मिलने पर भी विचलित नहीं होते। उनका साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम देशभक्ति की भावना को व्यक्त करता है।


3. कहानी के आधार पर लाल का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर:
लाल एक शिक्षित, साहसी, निर्भीक और देशभक्त युवक है। वह अंग्रेज़ी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध करता है। उसके विचार क्रांतिकारी हैं और वह राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखता है। फाँसी का सामना भी वह मुस्कुराते हुए करता है। उसके चरित्र में त्याग, साहस और आदर्शवाद के गुण दिखाई देते हैं।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण पंक्तियाँ

“हम मिले थे, मिले हैं, मिलेंगे।”
— यह पंक्ति लाल के अटूट मातृप्रेम, आत्मविश्वास और बलिदान की भावना को व्यक्त करती है।

“माँ! तू भी जल्द वहीं आना, जहाँ हम लोग जा रहे हैं।”
— यह कथन स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाले क्रांतिकारियों की निर्भीकता को दर्शाता है।

सोमवार, 1 सितंबर 2025

कार्नेलिया का गीत : व्याख्या

 

करनेलिया








सारांश:
कार्नेलिया अपने गीत में  अरुण यानी सुबह के सूर्य को संबोधित करते हुए भारत के प्राकृतिक और सांस्कृतिक सौंदर्य का वर्णन कर रही है।  अरुणिमा नएपन का भी प्रतीक है।  भारत के संस्कृति के दीप्त या प्रकाशित अर्थात उन तत्वों का प्रतीक है, जो भारतीय संस्कृति को विशिष्ट और महान बनाते हैं । कार्नेलिया भारत को संबोधित करते हुए ही भारत और भारत के सांस्कृतिक गौरव को भी संबोधित कर रही है।  वह कह रही है कि यह देश, यह हमारा देश,  यानी यह भारत देश मधुमेह है,  सुन्दर है और अपने संस्कृति तथा प्राकृतिक सौंदर्य के कारण सहज ही सम्मोहित करने वाला है । कार्नेलिया भारत के सौंदर्य से,  भारत की संस्कृति से और भारत की प्रकृति से इस तरह प्रभावित है कि वह भारत को अपना देश कह रही है । वह स्वयं एक यवन (युनानी/ग्रीक )  कन्या है । वह भारत पर आक्रमण करने वाले सिकंदर की सेना पति सेल्यूकस की पुत्री है, लेकिन उसका भारत की संस्कृति और प्रकृति से गहरा लगाव भारत को अपना देश कहने के लिए बाते करता है । वह भारत की मधुमय लगने का कारण ही बताती है वह कहती हैं कि भारत मधु माँ इसलिए है भारत सुन्दर इसलिए है क्योंकि यहाँ की जो सुबह हैं यहाँ का का जो सुबह का प्रकाश है सुबह का समय है वह सरस कमलों को अपने गर्भ में धारण किए हुए हैं यानी कि यहाँ के प्रभात वेला में सरोवरों में सुन्दर सुन्दर लाल रंग के कमल खिले रहते हैं या सूरज की लाल लाल किरणें भारत की सदानीरा धरती केस रोवर और नदियों में जब पड़ती है तो ऐसा लगता है कि पूरी भारत भूमि भारत का संपूर्ण जलाशय भारत की समूची प्रकृति लाल लाल कमरों से भर लिए भारत के बन बाग उप मान मैं सीतला मंद सुगंध हवा जब सुबह चलती है तो वृक्षों की सिखाए इस तरह से झूमने लगती है जैसे लगता है कि कोई बालिका इस सौंदर्य को देख कर अत्यंत नृत्य कर रहे भारत की धरती निपटे वसंत की धरती है सुजलाम सुफलाम श्याम अलार्म यह सुझाव है सुंदर फलों से युक्त है फसलों की हरितिमा से युक्त है वंदे मातरम् का विचार नहीं बंकिम जिन विशेशताओं का वर्णन कर रहे हैं उसी का वर्णन यहाँ कार्य लिया के माध्यम से बेसन का प्रसाद ने भी किया है छुट का जीवन हरियाली पर भारत के यू हरी भरी जीवंत हरा रंग जीवंतता का प्रतीक है जीवन का प्रतीक है तो जो भरी भरी अंत धरती है भारत की उस हरी भरी जीवंत धरती पर छुटके हुआ सुबह का प्रकाश सुबह के सूर्य की लाल लाल किरणें ऐसी लग रही है जैसे उन पर किसी ने शुभता के कला सिंदूर बिखेर दिया है कुमकुम बिखेर दिया है कुमकुम मंगल का प्रतीक है शुभता का प्रतीक है और हरितिमा जीवन का इसे देखकर ऐसा लगता है जैसे भारत की हरी भरी धरती सौभाग्यवती हो गई है सुहागण हो गयी है ।