रविवार, 14 जून 2026

'कुटज'

हजारी प्रसाद द्विवेदी

खानाबदोश

  •  ओम प्रकाश बाल्मीकी 

 

कहानी का सारांश

'खानाबदोश' हिंदी के प्रसिद्ध दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखी गई एक मार्मिक कहानी है। यह कहानी ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले गरीब मजदूरों के जीवन-संघर्ष, शोषण, जातिगत भेदभाव और उनके सपनों के टूटने की त्रासदी को प्रस्तुत करती है।

कहानी के मुख्य पात्र सुकिया और मानो हैं, जो गरीबी और अभाव से मुक्ति पाने के लिए अपने गाँव को छोड़कर एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करने आते हैं। दोनों मेहनत से ईंटें बनाते हैं और अपनी आय बढ़ाने का प्रयास करते हैं। भट्ठे पर काम करते हुए मानो के मन में अपने गाँव में पक्की ईंटों का एक छोटा-सा घर बनाने का सपना जन्म लेता है। यह सपना उनके जीवन का लक्ष्य बन जाता है और वे अधिक मेहनत करके पैसे बचाने लगते हैं।

भट्ठे का मालिक मुख्तार सिंह और उसका बेटा सूबेसिंह मजदूरों का शोषण करते हैं। सूबेसिंह की बुरी नज़र मजदूर महिलाओं पर रहती है। वह पहले किसनी नामक महिला को अपने प्रभाव में ले लेता है और बाद में मानो को भी फँसाने की कोशिश करता है। जब मानो उसके इरादों के सामने झुकने से इनकार करती है, तो वह उसे और सुकिया को परेशान करने लगता है।

इस दौरान जसदेव नामक एक युवा मजदूर मानो का साथ देने का प्रयास करता है, लेकिन सूबेसिंह उसे बुरी तरह पीट देता है। भय और स्वार्थ के कारण बाद में जसदेव भी उनसे दूरी बना लेता है। दूसरी ओर सुकिया और मानो अपने सपने को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करते रहते हैं।

सूबेसिंह उनकी प्रगति से जलता है और उन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए षड्यंत्र रचता है। एक दिन रात में उनकी मेहनत से बनाई गई कच्ची ईंटों को किसी के द्वारा तोड़ दिया जाता है। उनकी सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है और उन्हें मजदूरी भी नहीं मिलती। यह घटना उनके पक्के घर के सपने को चकनाचूर कर देती है।

अंततः निराश होकर सुकिया और मानो भट्ठा छोड़ देते हैं और एक नए ठिकाने की तलाश में निकल पड़ते हैं। वे फिर से खानाबदोश बन जाते हैं। कहानी का अंत अत्यंत मार्मिक है, जहाँ अपने सपनों के टूटने की पीड़ा के साथ वे अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ जाते हैं।

कहानी का संदेश

यह कहानी समाज में व्याप्त आर्थिक शोषण, जातिगत भेदभाव, स्त्री-उत्पीड़न और मजदूरों की असुरक्षित स्थिति को उजागर करती है। साथ ही यह बताती है कि गरीब मजदूर दूसरों के लिए घर बनाते हैं, लेकिन स्वयं जीवनभर अपने घर के सपने के लिए भटकते रहते हैं। "खानाबदोश" शोषित वर्ग के संघर्ष, स्वाभिमान और टूटते सपनों की अत्यंत संवेदनशील कहानी है।

उसकी माँ

  


लेखक : पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’

सारांश

‘उसकी माँ’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित एक अत्यंत मार्मिक कहानी है। इसमें एक क्रांतिकारी युवक लाल, उसकी त्यागमयी माँ जानकी, और एक जमींदार कथावाचक के माध्यम से देशभक्ति, मातृत्व और औपनिवेशिक शासन की क्रूरता का चित्रण किया गया है।

कहानी का आरंभ तब होता है जब पुलिस सुपरिंटेंडेंट कथावाचक से लाल के बारे में पूछताछ करने आता है। कथावाचक को पता चलता है कि सरकार लाल की गतिविधियों पर नज़र रख रही है। लाल एक कॉलेज छात्र है, जो देश की पराधीनता से दुखी है और अंग्रेज़ी शासन का विरोध करता है। उसकी माँ जानकी एक सरल, भोली और ममतामयी स्त्री है, जिसे अपने बेटे और उसके मित्रों पर गर्व है। वह उन सभी युवकों को अपने बच्चों की तरह प्यार करती है।

लाल और उसके साथी देश की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी विचार रखते हैं। वे अंग्रेज़ी शासन को अन्यायपूर्ण और शोषणकारी मानते हैं। धीरे-धीरे पुलिस को उनके क्रांतिकारी कार्यों का संदेह होता है। एक दिन पुलिस छापा मारकर लाल और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लेती है। उन पर षड्यंत्र, विद्रोह और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं।

जानकी को विश्वास नहीं होता कि उसका बेटा अपराधी हो सकता है। वह अदालतों, वकीलों और जेलों के चक्कर लगाती रहती है। अपने बर्तन, गहने और घर का सामान बेचकर वह जेल में बंद युवकों के लिए भोजन पहुँचाती है। वह उन्हें अपने बेटे समान समझती है और अंत तक उनके निर्दोष होने की आशा बनाए रखती है।

लंबे मुकदमे के बाद अदालत लाल और उसके कुछ साथियों को फाँसी तथा अन्य को कठोर कारावास की सज़ा सुनाती है। सज़ा सुनाए जाने पर भी लाल और उसके साथी विचलित नहीं होते। वे हँसते हुए अपनी माँ को सांत्वना देते हैं और स्वतंत्रता के आदर्शों के लिए बलिदान को गौरवपूर्ण मानते हैं।

फाँसी से पहले लाल अपनी माँ को एक अंतिम पत्र लिखता है, जिसमें वह मृत्यु को एक नए मिलन और स्वतंत्रता की ओर यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह पत्र पढ़कर भी जानकी स्तब्ध रह जाती है। उसके भीतर का सारा दुःख मानो पत्थर बन जाता है। अंततः पुत्र-वियोग की असहनीय पीड़ा सह न पाने के कारण वह घर के बाहर बैठी-बैठी प्राण त्याग देती है।

कहानी का उद्देश्य

यह कहानी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों के त्याग, मातृबलिदान और अंग्रेज़ी शासन की कठोरता को उजागर करती है। लेखक ने दिखाया है कि स्वतंत्रता केवल क्रांतिकारियों के बलिदान से नहीं, बल्कि उनकी माताओं के अनकहे त्याग और पीड़ा से भी प्राप्त हुई है।

मुख्य संदेश

  • मातृत्व का सर्वोच्च त्याग और प्रेम।
  • देशभक्ति एवं स्वतंत्रता के लिए बलिदान का महत्व।
  • औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों की आलोचना।
  • क्रांतिकारियों के प्रति समाज के भय और उदासीनता का चित्रण।

‘उसकी माँ’ केवल एक माँ की कथा नहीं, बल्कि उन असंख्य भारतीय माताओं को श्रद्धांजलि है जिन्होंने अपने पुत्रों को देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान होते देखा।

‘उसकी माँ’ – महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

1. ‘उसकी माँ’ कहानी के लेखक कौन हैं?

उत्तर: ‘उसकी माँ’ कहानी के लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ हैं।


2. कहानी का मुख्य पात्र कौन है?

उत्तर: कहानी का मुख्य पात्र लाल है, जो एक युवा क्रांतिकारी है। उसकी माँ जानकी भी कहानी का प्रमुख पात्र है।


3. लाल की माँ का नाम क्या था?

उत्तर: लाल की माँ का नाम जानकी था।


4. पुलिस सुपरिंटेंडेंट कथावाचक से किसके बारे में पूछताछ करता है?

उत्तर: पुलिस सुपरिंटेंडेंट लाल के बारे में पूछताछ करता है।


5. लाल के पिता कौन थे?

उत्तर: लाल के पिता रामनाथ थे, जो कथावाचक की जमींदारी के मुख्य मैनेजर थे।


6. लाल का स्वभाव कैसा था?

उत्तर: लाल साहसी, तेजस्वी, देशभक्त और क्रांतिकारी विचारों वाला युवक था।


7. लाल अंग्रेज़ी शासन के बारे में क्या सोचता था?

उत्तर: लाल अंग्रेज़ी शासन को अन्यायपूर्ण, शोषणकारी और दमनकारी मानता था तथा उसका विरोध करता था।


8. जानकी अपने बेटे और उसके मित्रों के साथ कैसा व्यवहार करती थी?

उत्तर: जानकी उन्हें अपने बच्चों की तरह प्यार करती थी और उनके लिए भोजन बनाकर खिलाती थी।


9. लड़कों ने जानकी की तुलना किससे की थी?

उत्तर: लड़कों ने जानकी की तुलना भारत माता से की थी।


10. पुलिस को लाल के घर से क्या मिला?

उत्तर: पुलिस को लाल के घर से पिस्तौल, कारतूस और क्रांतिकारी पत्र मिले।


11. लाल और उसके साथियों पर कौन-कौन से आरोप लगाए गए?

उत्तर: उन पर षड्यंत्र, विद्रोह, हत्या और सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना बनाने के आरोप लगाए गए।


12. जानकी अपने बेटे के लिए क्या-क्या त्याग करती है?

उत्तर: जानकी अपने गहने, बर्तन और घरेलू सामान बेचकर जेल में बंद लड़कों के लिए भोजन पहुँचाती है और उनकी पैरवी के लिए प्रयास करती है।


13. अदालत ने लाल को क्या सजा दी?

उत्तर: अदालत ने लाल को फाँसी की सजा दी।


14. फाँसी की सजा सुनने के बाद लाल का व्यवहार कैसा था?

उत्तर: लाल निडर और प्रसन्न दिखाई देता है। वह अपनी माँ को सांत्वना देता है।


15. लाल ने अपनी अंतिम चिट्ठी में क्या लिखा?

उत्तर: लाल ने लिखा कि मृत्यु के बाद भी वह अपनी माँ से अलग नहीं होगा और वे पुनः मिलेंगे।


16. जानकी की मृत्यु कैसे हुई?

उत्तर: पुत्र-वियोग के दुःख और मानसिक आघात के कारण जानकी अपने घर के बाहर बैठी-बैठी प्राण त्याग देती है।


17. कहानी का शीर्षक ‘उसकी माँ’ क्यों रखा गया है?

उत्तर: क्योंकि कहानी का केंद्र बिंदु लाल की माँ जानकी का त्याग, ममता और पुत्र-प्रेम है।


18. कहानी में अंग्रेज़ी शासन का कौन-सा रूप दिखाई देता है?

उत्तर: अंग्रेज़ी शासन का दमनकारी, क्रूर और शोषणकारी रूप दिखाई देता है।


19. ‘उसकी माँ’ कहानी का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: स्वतंत्रता केवल क्रांतिकारियों के बलिदान से नहीं, बल्कि उनकी माताओं के त्याग और पीड़ा से भी प्राप्त हुई है।


20. कहानी में मातृत्व का कौन-सा रूप चित्रित हुआ है?

उत्तर: निस्वार्थ प्रेम, त्याग, समर्पण और असीम वात्सल्य का आदर्श रूप चित्रित हुआ है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. जानकी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
जानकी एक आदर्श भारतीय माँ है। वह सरल, भोली, ममतामयी, त्यागमयी और सहनशील है। वह अपने बेटे लाल तथा उसके मित्रों को समान स्नेह देती है। पुत्र के जेल जाने पर भी वह उसके लिए भोजन पहुँचाती है और उसके निर्दोष होने का विश्वास बनाए रखती है। अंततः पुत्र-वियोग सहन न कर पाने के कारण उसका जीवन समाप्त हो जाता है।


2. ‘उसकी माँ’ कहानी में देशभक्ति की भावना किस प्रकार व्यक्त हुई है?

उत्तर:
कहानी में लाल और उसके साथी देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान करने को तैयार रहते हैं। वे अंग्रेज़ी शासन का विरोध करते हैं और फाँसी की सजा मिलने पर भी विचलित नहीं होते। उनका साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम देशभक्ति की भावना को व्यक्त करता है।


3. कहानी के आधार पर लाल का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर:
लाल एक शिक्षित, साहसी, निर्भीक और देशभक्त युवक है। वह अंग्रेज़ी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध करता है। उसके विचार क्रांतिकारी हैं और वह राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखता है। फाँसी का सामना भी वह मुस्कुराते हुए करता है। उसके चरित्र में त्याग, साहस और आदर्शवाद के गुण दिखाई देते हैं।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण पंक्तियाँ

“हम मिले थे, मिले हैं, मिलेंगे।”
— यह पंक्ति लाल के अटूट मातृप्रेम, आत्मविश्वास और बलिदान की भावना को व्यक्त करती है।

“माँ! तू भी जल्द वहीं आना, जहाँ हम लोग जा रहे हैं।”
— यह कथन स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाले क्रांतिकारियों की निर्भीकता को दर्शाता है।

दूसरा देवदास

 'दूसरा देवदास' ममता कालिया की एक रोचक और संवेदनशील कहानी है, जिसमें युवा मन की सहज प्रेमानुभूति, संकोच, आकर्षण और भावनात्मक उथल-पुथल का सुंदर चित्रण किया गया है।

कहानी का नायक संभव अपने माता-पिता के कहने पर हरिद्वार आया है। वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा एक आधुनिक शिक्षित युवक है। हरिद्वार में वह अपनी नानी के घर ठहरा हुआ है। एक दिन वह हर की पौड़ी पर गंगा स्नान और संध्या आरती देखने जाता है। वहाँ गंगा आरती का भव्य और आध्यात्मिक वातावरण उसे आकर्षित करता है।

आरती के बाद वह एक छोटे मंदिर में दर्शन करने जाता है। उसी समय एक सुंदर, श्यामल और भीगे वस्त्रों वाली युवती भी वहाँ पहुँचती है। दोनों संयोगवश एक-दूसरे के निकट खड़े होते हैं। मंदिर का पुजारी उन्हें पति-पत्नी या युगल समझकर आशीर्वाद देता है—"सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना।" इस अप्रत्याशित आशीर्वाद से दोनों संकोच में पड़ जाते हैं और बिना कुछ कहे अलग हो जाते हैं।

यह छोटी-सी घटना संभव के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। वह रात भर उसी युवती के बारे में सोचता रहता है। अगले दिन वह पुनः हर की पौड़ी और बाद में मंसा देवी मंदिर जाता है। वहाँ संयोगवश उसकी मुलाकात एक बालक मन्नू से होती है। बाद में रोपवे से लौटते समय उसे पता चलता है कि वही युवती मन्नू की बुआ है।

मन्नू दोनों का परिचय कराता है। युवती का नाम पारो है। उसका नाम सुनकर संभव को प्रसिद्ध उपन्यास देवदास की पारो की याद आ जाती है। वह हँसते हुए स्वयं को "देवदास" कह देता है। इस प्रकार कहानी एक मधुर और आशावादी मोड़ पर समाप्त होती है।

कहानी में हरिद्वार की धार्मिक आस्था, गंगा आरती का अलौकिक वातावरण, युवा मन की प्रथम प्रेमानुभूति तथा संयोग की भूमिका का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। शीर्षक "दूसरा देवदास" इसलिए सार्थक है क्योंकि यहाँ भी देवदास और पारो जैसे नाम सामने आते हैं, किंतु यह कथा निराशा नहीं बल्कि संभावनाओं, आशा और जीवन की सकारात्मकता का संदेश देती है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. हर की पौड़ी पर आरती का दृश्य कैसा था?
  2. संभव हरिद्वार क्यों आया था?
  3. मंगल पंडा ने संभव से क्या कहा?
  4. पुजारी ने संभव और युवती को कौन-सा आशीर्वाद दिया?
  5. लड़की का नाम क्या था?
  6. मन्नू का पारो से क्या संबंध था?
  7. संभव को युवती पहली बार कहाँ दिखाई दी?
  8. मंसा देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए संभव ने किस साधन का उपयोग किया?
  9. संभव किस परीक्षा की तैयारी कर रहा था?
  10. कहानी का शीर्षक "दूसरा देवदास" क्यों रखा गया है?

लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. हर की पौड़ी की संध्या आरती का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।
  2. पुजारी द्वारा दिए गए आशीर्वाद से संभव और युवती क्यों संकोच में पड़ गए?
  3. संभव के मन में युवती के प्रति आकर्षण कैसे उत्पन्न हुआ?
  4. बैसाखी के अवसर पर हरिद्वार की भीड़ की क्या विशेषताएँ थीं?
  5. मंसा देवी मंदिर में मनोकामना की गाँठ बाँधने का क्या सांकेतिक महत्व है?
  6. संभव के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
  7. नानी और संभव के संबंधों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  8. कहानी में हरिद्वार के धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण का चित्रण कैसे हुआ है?

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

  1. "दूसरा देवदास" कहानी में प्रेम की प्रथम अनुभूति का चित्रण कीजिए।
  2. हरिद्वार के परिवेश का कहानी में क्या महत्व है? स्पष्ट कीजिए।
  3. संभव के मनोभावों का विश्लेषण कीजिए।
  4. कहानी के शीर्षक "दूसरा देवदास" की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
  5. ममता कालिया ने कहानी में आधुनिक युवा मनोविज्ञान को किस प्रकार प्रस्तुत किया है?
  6. धार्मिक आस्था और मानवीय भावनाओं के समन्वय पर टिप्पणी कीजिए।

महत्त्वपूर्ण चरित्र-चित्रण

  1. संभव का चरित्र-चित्रण।
  2. पारो का चरित्र-चित्रण।
  3. नानी का चरित्र-चित्रण।
  4. मन्नू का चरित्र-चित्रण।

परीक्षा हेतु संभावित उद्धरण-व्याख्या

  1. "सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना।"
  2. "मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है।"
  3. "इस भीड़ में एकसूत्रता थी।"

शनिवार, 13 जून 2026

पुरस्कार

जयशंकर प्रसाद





आर्द्रा नक्षत्र; आकाश में काले-काले बादलों की घुमड़, जिसमें देव-दुंदुभी का गंभीर घोष। प्राची के एक निरभ्र कोने से स्वर्ण-पुरुष झाँकने लगा।—देखने लगा महाराज की सवारी। शैलमाला के अंचल में समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास उठ रही थी। नगर-तोरण से जयघोष हुआ, भीड़ में गजराज का चामरधारी शुंड उन्नत दिखाई पड़ा। वह हर्ष और उत्साह का समुद्र हिलोर भरता हुआ आगे बढ़ने लगा।

प्रभात की हेम-किरणों से अनुरंजित नन्हीं-नन्हीं बूँदों का एक झोंका स्वर्ण-मल्लिका के समान बरस पड़ा। मंगल सूचना से जनता ने हर्ष-ध्वनि की।


रथों, हाथियों और अश्वारोहियों की पंक्ति जम गई। दर्शकों की भीड़ भी कम न थी। गजराज बैठ गया, सीढ़ियों से महाराज उतरे। सौभाग्यवती और कुमारी सुंदरियों के दो दल, आम्रपल्लवों से सुशोभित मंगल-कलश और फूल, कुंकुम तथा खीलों से भरे थाल लिए, मधुर गान करते हुए आगे बढ़े।

महाराज के मुख पर मधुर मुस्कान थी। पुरोहित-वर्ग ने स्वस्त्ययन किया। स्वर्ण-रंजित हल की मूठ पकड़कर महाराज ने जुते हुए सुंदर पुष्ट बैलों को चलने का संकेत किया। बाजे बजने लगे। किशोरी कुमारियों ने खीलों और फूलों की वर्षा की।


कोशल का यह उत्सव प्रसिद्ध था। एक दिन के लिए महाराज को कृषक बनना पड़ता—उस दिन इंद्र-पूजन की धूम-धाम होती; गोठ होती। नगर-निवासी उस पहाड़ी भूमि में आनंद मनाते। प्रतिवर्ष कृषि का यह महोत्सव उत्साह से संपन्न होता; दूसरे राज्यों से भी युवक राजकुमार इस उत्सव में बड़े चाव से आकर योग देते।

मगध का एक राजकुमार अरुण अपने रथ पर बैठा बड़े कुतूहल से यह दृश्य देख रहा था।


बीजों का एक बाल लिए कुमारी मधूलिका महाराज के साथ थी। बीज बोते हुए महाराज जब हाथ बढ़ाते, तब मधूलिका उनके सामने थाल कर देती। यह खेत मधूलिका का था, जो इस साल महाराज की खेती के लिए चुना गया था; इसलिए बीज देने का सम्मान मधूलिका ही को मिला। वह कुमारी थी। सुंदरी थी। कौशेयवसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे सम्हालती और कभी अपने रूखे अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी, वे सब बरौनियों में गुँथे जा रहे थे। सम्मान और लज्जा उसके अधरों पर मंद मुस्कराहट के साथ सिहर उठते; किंतु महाराज को बीज देने में उसने शिथिलता नहीं की। सब लोग महाराज का हल चलाना देख रहे थे—विस्मय से, कुतूहल से। और अरुण देख रहा था कृषक कुमारी मधूलिका को। अहा कितना भोला सौंदर्य! कितनी सरल चितवन!

उत्सव का प्रधान कृत्य समाप्त हो गया। महाराज ने मधूलिका के खेत का पुरस्कार दिया, थाल में कुछ स्वर्ण मुद्राएँ। वह राजकीय अनुग्रह था। मधूलिका ने थाली सिर से लगा ली; किंतु साथ उसमें की स्वर्णमुद्राओं को महाराज पर न्योछावर करके बिखेर दिया। मधूलिका की उस समय की ऊर्जस्वित मूर्ति लोग आश्चर्य से देखने लगे! महाराज की भृकुटी भी ज़रा चढ़ी ही थी कि मधूलिका ने सविनय कहा—


देव! यह मेरे पितृ-पितामहों की भूमि है। इसे बेचना अपराध है; इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है। महाराज के बोलने के पहले ही वृद्ध मंत्री ने तीखे स्वर से कहा— अबोध! क्या बक रही है? राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार! तेरी भूमि से चौगुना मूल्य है; फिर कोशल का तो यह सुनिश्चित राष्ट्रीय नियम है। तू आज से राजकीय रक्षण पाने की अधिकारिणी हुई, इस धन से अपने को सुखी बना।

राजकीय रक्षण की अधिकारिणी तो सारी प्रजा है, मंत्रीवर!...महाराज को भूमि-समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध न था और न है; किंतु मूल्य स्वीकार करना असंभव है।—मधूलिका उत्तेजित हो उठी।


महाराज के संकेत करने पर मंत्री ने कहा—देव! वाराणसी-युद्ध के अन्यतम वीर सिंहमित्र की यह एक-मात्र कन्या है।—महाराज चौंक उठे—सिंहमित्र की कन्या! जिसने मगध के सामने कोशल की लाज रख ली थी, उसी वीर की मधूलिका कन्या है?

हाँ, देव!—सविनय मंत्री ने कहा।


इस उत्सव के परंपरागत नियम क्या हैं, मंत्रीवर?—महाराज ने पूछा।

देव, नियम तो बहुत साधारण हैं। किसी भी अच्छी भूमि को इस उत्सव के लिए चुनकर नियमानुसार पुरस्कार-स्वरूप उसका मूल्य दे दिया जाता है। वह भी अत्यंत अनुग्रहपूर्वक अर्थात् भू-संपत्ति का चौगुना मूल्य उसे मिलता है। उस खेती को वही व्यक्ति वर्ष भर देखता है। वह राजा का खेत कहा जाता है।


महाराज को विचार-संघर्ष से विश्राम की अत्यंत आवश्यकता थी। महाराज चुप रहे। जयघोष के साथ सभा विसर्जित हुई। सब अपने-अपने शिविरों में चले गए। किंतु मधूलिका को उत्सव में फिर किसी ने न देखा। वह अपने खेत की सीमा पर विशाल मधूक-वृक्ष के चिकने हरे पत्तों की छाया में अनमनी चुपचाप बैठी रही।

रात्रि का उत्सव अब विश्राम ले रहा था। राजकुमार अरुण उसमें सम्मिलित नहीं हुआ—अपने विश्राम-भवन में जागरण कर रहा था। आँखों में नींद न थी। प्राची में जैसी गुलाली खिल रही थी, वह रंग उसकी आँखों में था। सामने देखा तो मुँडेर पर कपोती एक पैर पर खड़ी पंख फैलाए अँगड़ाई ले रही थी। अरुण उठ खड़ा हुआ। द्वार पर सुसज्जित अश्व था, वह देखते-देखते नगर-तोरण पर जा पहुँचा। रक्षक-गण ऊँघ रहे थे, अश्व के पैरों के शब्द से चौंक उठे।


युवक-कुमार तीर-सा निकल गया। सिंधुदेश का तुरंग प्रभात के पवन से पुलकित हो रहा था। घूमता-घूमता अरुण उसी मधूक-वृक्ष के नीचे पहुँचा, जहाँ मधूलिका अपने हाथ पर सिर धरे हुए खिन्न-निद्रा का सुख ले रही थी।

अरुण ने देखा, एक छिन्न माधवीलता वृक्ष की शाखा से च्युत होकर पड़ी है। सुमन मुकुलित, भ्रमर निस्पंद थे। अरुण ने अपने अश्व को मौन रहने का संकेत किया, उस सुषमा को देखने लिए, परंतु कोकिल बोल उठा। जैसे उसने अरुण से प्रश्न किया—छि:, कुमारी के सोये हुए सौंदर्य पर दृष्टिपात करनेवाले धृष्ट, तुम कौन? मधूलिका की आँखे खुल पड़ीं। उसने देखा, एक अपरिचित युवक। वह संकोच से उठ बैठी।—भद्रे! तुम्हीं न कल के उत्सव की संचालिका रही हो?


—उत्सव! हाँ, उत्सव ही तो था।

—कल उस सम्मान...


—क्यों आपको कल का स्वप्न सता रहा है? भद्र! आप क्या मुझे इस अवस्था में संतुष्ट न रहने देंगे?

—मेरा हृदय तुम्हारी उस छवि का भक्त बन गया है, देवि!


—मेरे उस अभिनय का—मेरी विडंबना का। आह! मनुष्य कितना निर्दय है, अपरिचित! क्षमा करो, जाओ अपने मार्ग।

—सरलता की देवि! मैं मगध का राजकुमार तुम्हारे अनुग्रह का प्रार्थी हूँ—मेरे हृदय की भावना अवगुण्ठन में रहना नहीं जानती। उसे अपनी...।


—राजकुमार! मैं कृषक-बालिका हूँ। आप नंदनबिहारी और मैं पृथ्वी पर परिश्रम करके जीनेवाली। आज मेरी स्नेह की भूमि पर से मेरा अधिकार छीन लिया गया है। मैं दु:ख से विकल हूँ; मेरा उपहास न करो।

—मैं कोशल-नरेश से तुम्हारी भूमि तुम्हें दिलवा दूँगा।


—नहीं, वह कोशल का राष्ट्रीय नियम है। मैं उसे बदलना नहीं चाहती—चाहे उससे मुझे कितना ही दु:ख हो।

—तब तुम्हारा रहस्य क्या है?


—यह रहस्य मानव-हृदय का है, मेरा नहीं। राजकुमार, नियमों से यदि मानव-हृदय बाध्य होता, तो आज मगध के राजकुमार का हृदय किसी राजकुमारी की ओर न खिंचकर एक कृषक-बालिका का अपमान करने न आता। मधूलिका उठ खड़ी हुई।

चोट खाकर राजकुमार लौट पड़ा। किशोर किरणों में उसका रत्नकिरीट चमक उठा। अश्व वेग से चला जा रहा था और मधूलिका निष्ठुर प्रहार करके क्या स्वयं आहत न हुई? उसके हृदय में टीस-सी होने लगी। वह सजल नेत्रों से उड़ती हुई धूल देखने लगी।


मधूलिका ने राजा का प्रतिपादन, अनुग्रह नहीं लिया। वह दूसरे खेतों में काम करती और चौथे पहर रूखी-सूखी खाकर पड़ रहती। मधूक-वृक्ष के नीचे छोटी-सी पर्णकुटीर थी। सूखे डंठलों से उसकी दीवार बनी थी। मधूलिका का वही आश्रय था। कठोर परिश्रम से जो रूखा अन्न मिलता, वही उसकी साँसों को बढ़ाने के लिए पर्याप्त था।

दुबली होने पर भी उसके अंग पर तपस्या की कांति थी। आस-पास के कृषक उसका आदर करते। वह एक आदर्श बालिका थी। दिन, सप्ताह, महीने और वर्ष बीतने लगे।


शीतकाल की रजनी, मेघों से भरा आकाश, जिसमें बिजली की दौड़-धूप। मधूलिका का छाजन टपक रहा था! ओढ़ने की कमी थी। वह ठिठुरकर एक कोने में बैठी थी। मधूलिका अपने अभाव को आज बढ़ाकर सोच रही थी। जीवन से सामंजस्य बनाए रखने वाले उपकरण तो अपनी सीमा निर्धारित रखते हैं; परंतु उनकी आवश्यकता और कल्पना भावना के साथ बढ़ती-घटती रहती है। आज बहुत दिनों पर उसे बीती हुई बात स्मरण हुई। दो, नहीं-नहीं, तीन वर्ष हुए होंगे, इसी मधूक के नीचे प्रभात में—तरुण राजकुमार ने क्या कहा था?

वह अपने हृदय से पूछने लगी—उन चाटुकारी के शब्दों को सुनने के लिए उत्सुक-सी वह पूछने लगी—क्या कहा था? दु:ख-दग्ध हृदय उन स्वप्न-सी बातों को स्मरण रख सकता था? और स्मरण ही होता, तो भी कष्टों की इस काली निशा में वह कहने का साहस करता। हाय री विडंबना!


आज मधूलिका उस बीते हुए क्षण को लौटा लेने के लिए विकल थी। दारिद्रय की ठोकरों ने उसे व्यथित और अधीर कर दिया है। मगध की प्रासाद-माला के वैभव का काल्पनिक चित्र—उन सूखे डंठलों के रंध्रों से, नभ में—बिजली के आलोक में—नाचता हुआ दिखाई देने लगा। खिलवाड़ी शिशु जैसे श्रावण की संध्या में जुगनू को पकड़ने के लिए हाथ लपकाता है, वैसे ही मधूलिका मन-ही-मन कर रही थी। ‘अभी वह निकल गया’। वर्षा ने भीषण रूप धारण किया। गड़गड़ाहट बढ़ने लगी; ओले पड़ने की संभावना थी। मधूलिका अपनी जर्ज़र झोपड़ी के लिए काँप उठी। सहसा बाहर कुछ शब्द हुआ—

कौन है यहाँ? पथिक को आश्रय चाहिए।


मधूलिका ने डंठलों का कपाट खोल दिया। बिजली चमक उठी। उसने देखा, एक पुरुष घोड़े की डोर पकड़े खड़ा है। सहसा वह चिल्ला उठी—राजकुमार!

मधूलिका?—आश्चर्य से युवक ने कहा।


एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। मधूलिका अपनी कल्पना को सहसा प्रत्यक्ष देखकर चकित हो गई—इतने दिनों के बाद आज फिर!

अरुण ने कहा—कितना समझाया मैंने—परंतु...


मधूलिका अपनी दयनीय अवस्था पर संकेत करने देना नहीं चाहती थी। उसने कहा—और आज आपकी यह क्या दशा है?

सिर झुकाकर अरुण ने कहा—मैं मगध का विद्रोही निर्वासित कोशल में जीविका खोजने आया हूँ।


मधूलिका उस अंधकार में हँस पड़ी—मगध का विद्रोही राजकुमार का स्वागत करे एक अनाथिनी कृषक-बालिका, यह भी एक विडंबना है, तो भी मैं स्वागत के लिए प्रस्तुत हूँ।

शीतकाल की निस्तब्ध रजनी, कुहरे से धुली हुई चाँदनी, हाड़ कँपा देनेवाला समीर, तो भी अरुण और मधूलिका दोनों पहाड़ी गह्वर के द्वार पर वट-वृक्ष के नीचे बैठे हुए बातें कर रहे हैं। मधूलिका की वाणी में उत्साह था, किंतु अरुण जैसे अत्यंत सावधान होकर बोलता।


मधूलिका ने पूछा—जब तुम इतनी विपन्न अवस्था में हो, तो फिर इतने सैनिकों को साथ रखने की क्या आवश्यकता है?

मधूलिका! बाहुबल ही तो वीरों की आजीविका है। ये मेरे जीवन-मरण के साथी हैं, भला मैं इन्हें कैसे छोड़ देता? और करता ही क्या?


क्यों? हम लोग परिश्रम से कमाते और खाते। अब तो तुम...।

भूल न करो, मैं अपने बाहुबल पर भरोसा करता हूँ। नए राज्य की स्थापना कर सकता हूँ। निराश क्यों हो जाऊँ?—अरुण के शब्दों में कंपन था; वह जैसे कुछ कहना चाहता था; पर कह न सकता था।


—नवीन राज्य! ओहो, तुम्हारा उत्साह तो कम नहीं। भला कैसे? कोई ढंग बताओ, तो मैं भी कल्पना का आनंद ले लूँ।

—कल्पना का आनंद नहीं मधूलिका, मैं तुम्हे राजरानी के सम्मान में सिंहासन पर बिठाऊँगा! तुम अपने छिने हुए खेत की चिंता करके भयभीत न हो।


एक क्षण में सरल मधूलिका के मन में प्रमाद का अंधड़ बहने लगा—द्वंद्व मच गया। उसने सहसा कहा—आह, मैं सचमुच आज तक तुम्हारी प्रतीक्षा करती थी, राजकुमार!

अरुण ढिठाई से उसके हाथों को दबाकर बोला—तो मेरा भ्रम था, तुम सचमुच मुझे प्यार करती हो?


युवती का वक्षस्थल फूल उठा, वह हाँ भी नहीं कह सकी, ना भी नहीं। अरुण ने उसकी अवस्था का अनुभव कर लिया। कुशल मनुष्य के समान उसने अवसर को हाथ से न जाने दिया। तुरंत बोल उठा—तुम्हारी इच्छा हो, तो प्राणों से पण लगाकर मैं तुम्हें इस कोशल— सिंहासन पर बिठा दूँ। मधूलिके! अरुण के खड्ग का आतंक देखोगी?—मधूलिका एक बार काँप उठी। वह कहना चाहती थी...नहीं; किंतु उसके मुँह से निकला—क्या?

—सत्य मधूलिका, कोशल—नरेश तभी से तुम्हारे लिए चिंतित हैं। यह मैं जानता हूँ, तुम्हारी साधारण-सी प्रार्थना वह अस्वीकार न करेंगे। और मुझे यह भी विदित है कि कोशल के सेनापति अधिकांश सैनिको के साथ पहाड़ी दस्युओं का दमन करने के लिए बहुत दूर चले गए हैं।


मधूलिका की आँखों के आगे बिजलियाँ हँसने लगी। दारुण भावना से उसका मस्तक विकृत हो उठा। अरुण ने कहा—तुम बोलती नहीं हो?

—जो कहोगे, वह करूँगी...मंत्रमुग्ध-सी मधूलिका ने कहा।


स्वर्णमंच पर कोशल-नरेश अर्द्धनिद्रित अवस्था में आँखे मुकुलित किए हैं। एक चामधारिणी युवती पीछे खड़ी अपनी कलाई बड़ी कुशलता से घुमा रही है। चामर के शुभ्र आंदोलन उस प्रकोष्ठ में धीरे-धीरे संचलित हो रहे हैं। तांबूल-वाहिनी प्रतिमा के समान दूर खड़ी है।

प्रतिहारी ने आकर कहा—जय हो देव! एक स्त्री कुछ प्रार्थना लेकर आई है।


आँख खोलते हुए महाराज ने कहा—स्त्री! प्रार्थना करने आई? आने दो।

प्रतिहारी के साथ मधूलिका आई। उसने प्रणाम किया। महाराज ने स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा और कहा—तुम्हें कहीं देखा है?


—तीन बरस हुए देव! मेरी भूमि खेती के लिए ली गई थी।

ओह, तो तुमने इतने दिन कष्ट में बिताए, आज उसका मूल्य माँगने आई हो, क्यों? अच्छा-अच्छा तुम्हें मिलेगा। प्रतिहारी!


—नहीं महाराज, मुझे मूल्य नहीं चाहिए।

—मूर्ख! फिर क्या चाहिए?


उतनी ही भूमि, दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की जंगली भूमि, वहीं मैं अपनी खेती करूँगी। मुझे एक सहायक मिल गया है। वह मनुष्यों से मेरी सहायता करेगा, भूमि को समतल भी बनाना होगा।

महाराज ने कहा—कृषक बालिके! वह बड़ी उबड़-खाबड़ भूमि है। तिस पर वह दुर्ग के समीप एक सैनिक महत्त्व रखती है।


—तो फिर निराश लौट जाऊँ?

—सिंहमित्र की कन्या! मैं क्या करूँ, तुम्हारी यह प्रार्थना...


—देव! जैसी आज्ञा हो!

—जाओ, तुम श्रमजीवियों को उसमें लगाओ। मैं अमात्य को आज्ञापत्र देने का आदेश करता हूँ।


—जय हो देव! —कहकर प्रणाम करती हुई मधूलिका राजमंदिर के बाहर आई।

दुर्ग के दक्षिण, भयावने नाले के तट पर, घना जंगल है, आज मनुष्यों के पद-संचार से शून्यता भंग हो रही थी। अरुण के छिपे वे मनुष्य स्वतंत्रता से इधर-उधर घूमते थे। झाड़ियों को काट कर पथ बन रहा था। नगर दूर था, फिर उधर यों ही कोई नहीं आता था। फिर अब तो महाराज की आज्ञा से वहाँ मधूलिका का अच्छा-सा खेत बन रहा था। तब इधर की किसको चिंता होती?


एक घने कुंज में अरुण और मधूलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। संध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षीगण अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे।

प्रसन्नता से अरुण की आँखे चमक उठीं। सूर्य की अंतिम किरण झुरमुट में घुसकर मधूलिका के कपोलों से खेलने लगी। अरुण ने कहा—चार प्रहर और, विश्वास करो, प्रभात में ही इस जीर्ण-कलेवर कोशल-राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा और मगध से निर्वासित मैं एक स्वतंत्र राष्ट्र का अधिपति बनूँगा, मधूलिके!


भयानक! अरुण, तुम्हारा साहस देखकर मैं चकित हो रही हूँ। केवल सौ सैनिकों से तुम...

रात के तीसरे प्रहर मेरी विजय-यात्रा होगी।


तो तुमको इस विजय पर विश्वास है?

अवश्य, तुम अपनी झोपड़ी में यह रात बिताओ; प्रभात से तो राज-मंदिर ही तुम्हारा लीला-निकेतन बनेगा।


मधूलिका प्रसन्न थी; किंतु अरुण के लिए उसकी कल्याण-कामना सशंक थी। वह कभी-कभी उद्विग्न-सी होकर बालकों के समान प्रश्न कर बैठती। अरुण उसका समाधान कर देता। सहसा कोई संकेत पाकर उसने कहा—अच्छा, अंधकार अधिक हो गया। अभी तुम्हें दूर जाना है और मुझे भी प्राण-पण से इस अभियान के प्रारंभिक कार्यों को अर्द्धरात्रि तक पूरा कर लेना चाहिए; तब रात्रि भर के लिए विदा! मधूलिके!

मधूलिका उठ खड़ी हुई। कँटीली झाड़ियों से उलझती हुई क्रम से, बढ़ने वाले अंधकार में वह झोपड़ी की ओर चली।


पथ अंधकारमय था और मधूलिका का हृदय भी निविड़-तम से घिरा था। उसका मन सहसा विचलित हो उठा, मधुरता नष्ट हो गई। जितनी सुख-कल्पना थी, वह जैसे अंधकार में विलीन होने लगी। वह भयभीत थी, पहला भय उसे अरुण के लिए उत्पन्न हुआ, यदि वह सफल न हुआ तो? फिर सहसा सोचने लगी—वह क्यों सफल हो? श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाए? मगध का चिरशत्रु! ओह, उसकी विजय! कोशल-नरेश ने क्या कहा था—‘सिंहमित्र की कन्या।’ सिंहमित्र, कोशल का रक्षक वीर, उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है? नहीं, नहीं, मधूलिका! मधूलिका!!’ जैसे उसके पिता उस अंधकार में पुकार रहे थे। वह पगली की तरह चिल्ला उठी। रास्ता भूल गई।

रात एक पहर बीत चली, पर मधूलिका अपनी झोपड़ी तक न पहुँची। वह उधेड़बुन में विक्षिप्त-सी चली जा रही थी। उसकी आँखों के सामने कभी सिंहमित्र और कभी अरुण की मूर्ति अंधकार में चित्रित होती जाती। उसे सामने आलोक दिखाई पड़ा। वह बीच पथ में खड़ी हो गई। प्राय: एक सौ उल्का धारी अश्वारोही चले आ रहे थे और आगे-आगे एक वीर अधेड़ सैनिक था। उसके बाएँ हाथ में अश्व की वल्गा और दाहिने हाथ में नग्न खड्ग। अत्यंत धीरता से वह टुकड़ी अपने पथ पर चल रही थी। परंतु मधूलिका बीच पथ से हिली नहीं। प्रमुख सैनिक पास आ गया; पर मधूलिका अब भी नहीं हटी। सैनिक ने अश्व रोककर कहा— कौन? कोई उत्तर नहीं मिला। तब तक दूसरे अश्वारोही ने सड़क पर कहा—तू कौन है, स्त्री? कोशल के सेनापति को उत्तर शीघ्र दे।


रमणी जैसे विकार-ग्रस्त स्वर में चिल्ला उठी—बाँध लो, मुझे बाँध लो! मेरी हत्या करो। मैंने अपराध ही ऐसा किया है।

सेनापति हँस पड़े, बोले—पगली है।


—पगली नहीं, यदि वही होती, तो इतनी विचार-वेदना क्यों होती? सेनापति! मुझे बाँध लो। राजा के पास ले चलो।

—क्या है, स्पष्ट कह!


—श्रावस्ती का दुर्ग एक प्रहर में दस्युओं के हस्तगत हो जाएगा। दक्षिणी नाले के पार उनका आक्रमण होगा।

सेनापति चौंक उठे। उन्होंने आश्चर्य से पूछा—तू क्या कह रही है?


—मैं सत्य कह रही हूँ; शीघ्रता करो।

सेनापति ने अस्सी सैनिकों को नाले की ओर धीरे-धीरे बढ़ने की आज्ञा दी और स्वयं बीस अश्वारोहियों के साथ दुर्ग की ओर बढ़े। मधूलिका एक अश्वारोही के साथ बाँध दी गई।


श्रावस्ती का दुर्ग, कोशल राष्ट्र का केंद्र, इस रात्रि में अपने विगत वैभव का स्वप्न देख रहा था। भिन्न राजवंशों ने उसके प्रांतों पर अधिकार जमा लिया है। अब वह केवल कई गाँवों का अधिपति है। फिर भी उसके साथ कोशल के अतीत की स्वर्ण-गाथाएँ लिपटी हैं। वही लोगों की ईर्ष्या का कारण है। जब थोड़े से अश्वारोही बड़े वेग से आते हुए दुर्ग-द्वार पर रुके, तब दुर्ग के प्रहरी चौंक उठे। उल्का के आलोक में उन्होंने सेनापति को पहचाना, द्वार खुला। सेनापति घोड़े की पीठ से उतरे। उन्होंने कहा—अग्निसेन! दुर्ग में कितने सैनिक होंगे?

—सेनापति की जय हो! दो सौ।


—उन्हें शीघ्र ही एकत्र करो; परंतु बिना किसी शब्द के। सौ को लेकर तुम शीघ्र ही चुपचाप दुर्ग के दक्षिण की ओर चलो। आलोक और शब्द न हों।

सेनापति ने मधूलिका की ओर देखा। वह खोल दी गई। उसे अपने पीछे आने का संकेत कर सेनापति राजमंदिर की ओर बढ़े। प्रतिहारी ने सेनापति को देखते ही महाराज को सावधान किया। वह अपनी सुख-निद्रा के लिए प्रस्तुत हो रहे थे; किंतु सेनापति और साथ में मधूलिका को देखते ही चंचल हो उठे। सेनापति ने कहा—जय हो देव! इस स्त्री के कारण मुझे इस समय उपस्थित होना पड़ा है।


महाराज ने स्थिर नेत्रों से देखकर कहा—सिंहमित्र की कन्या! फिर यहाँ क्यों? क्या तुम्हारा क्षेत्र नहीं बन रहा है? कोई बाधा? सेनापति! मैंने दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की भूमि इसे दी है। क्या उसी संबंध में तुम कहना चाहते हो?

—देव! किसी गुप्त शत्रु ने उसी ओर से आज की रात में दुर्ग पर अधिकार कर लेने का प्रबंध किया है और इसी स्त्री ने मुझे पथ में यह संदेश दिया है।


राजा ने मधूलिका की ओर देखा। वह काँप उठी। घृणा और लज्जा से वह गड़ी जा रही थी। राजा ने पूछा—मधूलिका, यह सत्य है!

—हाँ, देव!



राजा ने सेनापति से कहा—सैनिकों को एकत्र करके तुम चलो मैं अभी आता हूँ। सेनापति के चले जाने पर राजा ने कहा—सिंहमित्र की कन्या! तुमने एक बार फिर कोशल का उपकार किया। यह सूचना देकर तुमने पुरस्कार का काम किया है। अच्छा, तुम यहीं ठहरो। पहले उन आतताईयों का प्रबंध कर लूँ।

अपने साहसिक अभियान में अरुण बंदी हुआ और दुर्ग उल्का के आलोक में अतिरंजित हो गया। भीड़ ने जयघोष किया। सबके मन में उल्लास था। श्रावस्ती-दुर्ग आज एक दस्यु के हाथ में जाने से बचा था। आबाल-वृद्ध-नारी आनंद से उन्मत्त हो उठे।


उषा के आलोक में सभा-मंडप दर्शकों से भर गया। बंदी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हुँकारते हुए कहा— ‘वध करो!’ राजा ने सबसे सहमत होकर आज्ञा दी— ‘प्राण दंड।’ मधूलिका बुलाई गई। वह पगली-सी आकर खड़ी हो गई। कोशल-नरेश ने पूछा—मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, माँग। वह चुप रही।

राजा ने कहा—मेरी निज की जितनी खेती है, मैं सब तुझे देता हूँ। मधूलिका ने एक बार बंदी अरुण की ओर देखा। उसने कहा—मुझे कुछ न चाहिए। अरुण हँस पड़ा। राजा ने कहा—नहीं, मैं तुझे अवश्य दूँगा। माँग ले।


—तो मुझे भी प्राणदंड मिले।—कहती हुई वह बंदी अरुण के पास जा खड़ी हुई।


स्रोत : प्रसाद की सम्पूर्ण कहानियाँ एवं निबंध

ग्राम

  जयशंकर प्रसाद 

यह कहानी हिन्दी की आरंभिक कहानियों मेन गिनी जाती है । इसका प्रकाशन 1910 ई. में इन्दु पत्रिका में हुआ था । यह 1912 में जयशंकर प्रसाद के 'छाया' कहानी-संग्रह में शामिल हुई। 

आकाशदीप

 


(एक)

“बंदी!”


“क्या है? सोने दो।”

“मुक्त होना चाहते हो?”


“अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।”

“फिर अवसर न मिलेगा।”


“बड़ा शीत है, कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।”

“आँधी की संभावना है। यही अवसर है। आज मेरे बंधन शिथिल हैं।”


“तो क्या तुम भी बंदी हो?”

“हाँ, धीरे बोलो, इस नाव पर केवल दस नाविक और प्रहरी हैं।”


“शस्त्र मिलेगा?”

“मिल जाएगा। पोत से संबद्ध रज्जु काट सकोगे?”


“हाँ।”

समुद्र में हिलोरें उठने लगीं। दोनों बंदी आपस में टकराने लगे। पहले बंदी ने अपने को स्वतंत्र कर लिया। दूसरे का बंधन खोलने का प्रयत्न करने लगा। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे। मुक्ति की आशा—


स्नेह का असंभावित आलिंगन। दोनों ही अंधकार में मुक्त हो गए। दूसरे बंदी ने हर्षातिरेक से उसको गले से लगा लिया। सहसा उस बंदी ने कहा- “यह क्या? तुम स्त्री हो?”

“क्या स्त्री होना कोई पाप है?”—अपने को अलग करते हुए स्त्री ने कहा।


“शस्त्र कहाँ है? तुम्हारा नाम?”

“चंपा।”


तारक-खचित नील अंबर और समुद्र के अवकाश में पवन ऊधम मचा रहा था। अंधकार से मिलकर पवन दुष्ट हो रहा था। समुद्र में आंदोलन था। नौका लहरों में विकल थी। स्त्री सतर्कता से लुढ़कने लगी। एक मतवाले नाविक के शरीर से टकराती हुई सावधानी से उसका कृपाण निकालकर, फिर लुढ़कते हुए, बंदी के समीप पहुँच गई। सहसा पोत से पथ-प्रदर्शक ने चिल्लाकर कहा- “आँधी!”

आपत्ति-सूचक तूर्य बजने लगा। सब सावधान होने लगे। बंदी युवक उसी तरह पड़ा रहा। किसी ने रस्सी पकड़ी, कोई पाल खोल रहा था। पर युवक बंदी ढुलककर उस रज्जु के पास पहुँचा, जो पोत से संलग्न थी। तारे ढँक गए। तरंगें उद्वेलित हुईं, समुद्र गरजने लगा। भीषण आँधी, पिशाचिनी के समान नाव को अपने हाथों में लेकर कंदुक-क्रीड़ा और अट्टहास करने लगी।


एक झटके के साथ ही नाव स्वतंत्र थी। उस संकट में भी दोनों बंदी खिलखिला कर हँस पड़े। आँधी के हाहाकार में उसे कोई न सुन सका।

(दो)


अनंत जलनिधि में ऊषा का मधुर आलोक फूट उठा। सुनहली किरणों और लहरों की कोमल सृष्टि मुस्कुराने लगी। सागर शांत था। नाविकों ने देखा, पोत का पता नहीं। बंदी मुक्त हैं।

नायक ने कहा- “बुधगुप्त! तुमको मुक्त किसने किया?”


कृपाण दिखाकर बुधगुप्त ने कहा- “इसने।”

नायक ने कहा- “तो तुम्हें फिर बंदी बनाऊँगा।”


“किसके लिए? पोताध्यक्ष मणिभद्र अतल जल में होगा, नायक! अब इस नौका का स्वामी मैं हूँ।”

“तुम? जलदस्यु बुधगुप्त? कदापि नहीं।”—चौंककर नायक ने कहा और अपना कृपाण टटोलने लगा! चंपा ने इसके पहले उस पर अधिकार कर लिया था। वह क्रोध से उछल पड़ा।


“तो तुम द्वंद्व युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाओ; जो विजयी होगा, वह स्वामी होगा।”—इतना कहकर बुधगुप्त ने कृपाण देने का संकेत किया। चंपा ने कृपाण नायक के हाथ में दे दिया।

भीषण घात-प्रतिघात आरंभ हुआ। दोनों कुशल, दोनों त्वरित गति वाले थे। बड़ी निपुणता से बुधगुप्त ने अपना कृपाण दाँतों से पकड़कर अपने दोनों हाथ स्वतंत्र कर लिए। चंपा भय और विस्मय से देखने लगी। नाविक प्रसन्न हो गए। परंतु बुधगुप्त ने लाघव से नायक का कृपाण वाला हाथ पकड़ लिया और विकट हुँकार से दूसरा हाथ कटि में डाल, उसे गिरा दिया। दूसरे ही क्षण प्रभात की किरणों में बुधगुप्त का विजयी कृपाण हाथों में चमक उठा। नायक की कातर आँखें प्राण-भिक्षा माँगने लगीं।


बुधगुप्त ने कहा- “बोलो, अब स्वीकार है कि नहीं?”

“मैं अनुचर हूँ, वरुणदेव की शपथ। मैं विश्वासघात नहीं करूँगा।” बुधगुप्त ने उसे छोड़ दिया।


चंपा ने युवक जलदस्यु के समीप आकर उसके क्षतों को अपनी स्निग्ध दृष्टि और कोमल करों से वेदना विहीन कर दिया। बुधगुप्त के सुगठित शरीर पर रक्त-बिंदु विजय-तिलक कर रहे थे।

विश्राम लेकर बुधगुप्त ने पूछा- “हम लोग कहाँ होंगे?”


“बालीद्वीप से बहुत दूर, संभवत: एक नवीन द्वीप के पास, जिसमें अभी हम लोगों का बहुत कम आना-जाना होता है। सिंहल के वणिकों का वहाँ प्राधान्य है।”

“कितने दिनों में हम लोग वहाँ पहुँचेंगे?”


“अनुकूल पवन मिलने पर दो दिन में। तब तक के लिए खाद्य का अभाव न होगा।”

सहसा नायक ने नाविकों को डाँड़ लगाने की आज्ञा दी, और स्वयं पतवार पकड़कर बैठ गया। बुधगुप्त के पूछने पर उसने कहा- “यहाँ एक जलमग्न शैलखंड है। सावधान न रहने से नाव टकराने का भय है।”


(तीन)

“तुम्हें इन लोगों ने बंदी क्यों बनाया?”


“वणिक मणिभद्र की पाप-वासना ने।”

“तुम्हारा घर कहाँ है?”


“जाह्नवी के तट पर। चंपा-नगरी की एक क्षत्रिय बालिका हूँ। पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे। माता का देहावसान हो जाने पर मैं भी पिता के साथ नाव पर ही रहने लगी। आठ बरस से समुद्र ही मेरा घर है। तुम्हारे आक्रमण के समय मेरे पिता ने ही सात दस्युओं को मारकर जल-समाधि ली। एक मास हुआ, मैं इस नील नभ के नीचे, नील जलनिधि के ऊपर, एक भयानक अनंतता में निस्सहाय हूँ, अनाथ हूँ। मणिभद्र ने मुझसे एक दिन घृणित प्रस्ताव किया। मैंने उसे गालियाँ सुनाईं। उसी दिन से बंदी बना दी गई।”—चंपा रोष से जल रही थी।

“मैं भी ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय हूँ, चंपा! परंतु दुर्भाग्य से जलदस्यु बन कर जीवन बिताता हूँ। अब तुम क्या करोगी?”


“मैं अपने अदृष्ट को अनिर्दिष्ट ही रहने दूँगी। वह जहाँ ले जाए।”—चंपा की आँखें निस्सीम प्रदेश में निरुद्देश्य थी। किसी आकांक्षा के लाल डोरे न थे। धवल अपांगों में बालकों के सदृश विश्वास था। हत्या-व्यवसायी दस्यु भी उसे देखकर काँप गया। उसके मन में एक सम्भ्रमपूर्ण श्रद्धा यौवन की पहली लहरों को जगाने लगी। समुद्र-वक्ष पर विलंबमयी राग-रंजित संध्या थिरकने लगी। चंपा के असंयत कुंतल उसकी पीठ पर बिखरे थे। दुर्दांत दस्यु ने देखा, अपनी महिमा में अलौकिक एक तरुण बालिका! वह विस्मय से अपने हृदय को टटोलने लगा। उसे एक नई वस्तु का पता चला। वह थी— कोमलता!

उसी समय नायक ने कहा- “हम लोग द्वीप के पास पहुँच गए।”


बेला से नाव टकराई। चंपा निर्भीकता से कूद पड़ी। माँझी भी उतरे। बुधगुप्त ने कहा- “जब इसका कोई नाम नहीं है, तो हम लोग इसे चंपा-द्वीप कहेंगे।”

चंपा हँस पड़ी।


(चार)

पाँच बरस बाद—


शरद के धवल नक्षत्र नील गगन में झलमला रहे थे। चंद्र की उज्ज्वल विजय पर अंतरिक्ष में शरदलक्ष्मी ने आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।

चंपा के एक उच्चसौध पर बैठी हुई तरुणी चंपा दीपक जला रही थी। बड़े यत्न से अभ्रक की मंजूषा में दीप धरकर उसने अपनी सुकुमार उँगलियों से डोरी खींची। वह दीपाधार ऊपर चढ़ने लगा। भोली-भोली आँखें उसे ऊपर चढ़ते बड़े हर्ष से देख रही थीं। डोरी धीरे-धीरे खींची गई। चंपा की कामना थी कि उसका आकाश-दीप नक्षत्रों से हिलमिल जाए; किंतु वैसा होना असंभव था। उसने आशाभरी आँखें फिरा लीं।


सामने जल-राशि का रजत शृंगार था। वरुण बालिकाओं के लिए लहरों से हीरे और नीलम की क्रीड़ा शैल-मालाएँ बन रही थीं और वे मायाविनी छलनाएँ अपनी हँसी का कलनाद छोड़कर छिप जाती थीं। दूर-दूर से धीवरों का वंशी-झनकार उनके संगीत-सा मुखरित होता था। चंपा ने देखा कि तरल संकुल जल-राशि में उसके कंडील का प्रतिबिंब अस्त-व्यस्त था! वह अपनी पूर्णता के लिए सैकड़ों चक्कर काटता था। वह अनमनी होकर उठ खड़ी हुई। किसी को पास न देखकर पुकारा—“जया!”

एक श्यामा युवती सामने आकर खड़ी हुई। वह जंगली थी। नील नभोमंडल के मुख में शुद्ध नक्षत्रों की पंक्ति के समान उसके दाँत हँसते ही रहते। वह चंपा को रानी कहती; बुधगुप्त की आज्ञा थी।


“महानाविक कब तक आवेंगे, बाहर पूछो तो।” चंपा ने कहा। जया चली गई।

दूरागत पवन चंपा के अँचल में विश्राम लेना चाहता था। उसके हृदय में गुदगुदी हो रही थी। आज न जाने क्यों वह बेसुध थी। वह दीर्घकाल दृढ़ पुरुष ने उसकी पीठ पर हाथ रख चमत्कृत कर दिया। उसने फिरकर कहा- “बुधगुप्त!”


“बावली हो क्या? यहाँ बैठी हुई अभी तक दीप जला रही हो, तुम्हें यह काम करना है?”

“क्षीरनिधिशायी अनंत की प्रसन्नता के लिए क्या दासियों से आकाश-दीप जलवाऊँ?”


“हँसी आती है। तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो? उसको, जिसको तुमने भगवान् मान लिया है?”

“हाँ, वह भी कभी भटकते हैं, भूलते हैं, नहीं तो, बुधगुप्त को इतना ऐश्वर्य क्यों देते?”


“तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चंपा रानी?”

“मुझे इस बंदी-गृह से मुक्त करो। अब तो बाली, जावा और सुमात्रा का वाणिज्य केवल तुम्हारे ही अधिकार में है महानाविक! परंतु मुझे उन दिनों की स्मृति सुहावनी लगती है, जब तुम्हारे पास एक ही नाव थी और चंपा के उपकूल में पण्य लादकर हम लोग सुखी जीवन बिताते थे, इस जल में अगणित बार हम लोगों की तरी आलोकमय प्रभात में तारिकाओं की मधुर ज्योति में थिरकती थी। बुधगुप्त! उस विजन अनंत में जब माँझी सो जाते थे, दीपक बुझ जाते थे, हम-तुम परिश्रम से थककर पालों में शरीर लपेटकर एक-दूसरे का मुँह क्यों देखते थे? वह नक्षत्रों की मधुर छाया...”


“तो चंपा! अब उससे भी अच्छे ढंग से हम लोग विचर सकते हैं। तुम मेरी प्राणदात्री हो, मेरी सर्वस्व हो।”

“नहीं-नहीं, तुमने दस्युवृत्ति छोड़ दी परंतु हृदय वैसा ही अकरुण, सतृष्ण और ज्वलनशील है। तुम भगवान के नाम पर हँसी उड़ाते हो। मेरे आकाश-दीप पर व्यंग कर रहे हो, नाविक! उस प्रचंड आँधी में प्रकाश की एक-एक किरण के लिए हम लोग कितने व्याकुल थे। मुझे स्मरण है, जब मैं छोटी थी, मेरे पिता नौकरी पर समुद्र में जाते थे—मेरी माता, मिट्टी का दीपक बाँस की पिटारी में भागीरथी के तट पर बाँस के साथ ऊँचे टाँग देती थी। उस समय वह प्रार्थना करती- ‘भगवान! मेरे पथ-भ्रष्ट नाविक को अंधकार में ठीक पथ पर ले चलना।’ और जब मेरे पिता बरसों पर लौटते तो कहते- ‘साध्वी! तेरी प्रार्थना से भगवान् ने संकटों में मेरी रक्षा की है।’ वह गद्गद हो जाती। मेरी माँ? आह नाविक! यह उसी की पुण्य-स्मृति है। मेरे पिता, वीर पिता की मृत्यु के निष्ठुर कारण, जलदस्यु! हट जाओ।”—सहसा चंपा का मुख क्रोध से भीषण होकर रंग बदलने लगा। महानाविक ने कभी यह रूप न देखा था। वह ठठाकर हँस पड़ा।


“यह क्या, चंपा? तुम अस्वस्थ हो जाओगी, सो रहो।”—कहता हुआ चला गया। चंपा मुठ्ठी बाँधे उन्मादिनी-सी घूमती रही।

(पाँच)


निर्जन समुद्र के उपकूल में वेला से टकराकर लहरें बिखर जाती थीं। पश्चिम का पथिक थक गया था। उसका मुख पीला पड़ गया। अपनी शांत गंभीर हलचल में जलनिधि विचार में निमग्न था। वह जैसे प्रकाश की उन्मलिन किरणों से विरक्त था।

चंपा और जया धीरे-धीरे उस तट पर आकर खड़ी हो गईं। तरंग से उठते हुए पवन ने उनके वसन को अस्त-व्यस्त कर दिया। जया के संकेत से एक छोटी-सी नौका आई। दोनों के उस पर बैठते ही नाविक उतर गया। जया नाव खेने लगी। चंपा मुग्ध-सी समुद्र के उदास वातावरण में अपने को मिश्रित कर देना चाहती थी।


“इतना जल! इतनी शीतलता! हृदय की प्यास न बुझी। पी सकूँगी? नहीं! तो जैसे वेला में चोट खाकर सिंधु चिल्ला उठता है, उसी के समान रोदन करूँ? या जलते हुए स्वर्ण-गोलक सदृश अनंत जल में डूबकर बुझ जाऊँ?”—चंपा के देखते-देखते पीड़ा और ज्वलन से आरक्त बिंब धीरे-धीरे सिंधु में चौथाई-आधा, फिर संपूर्ण विलीन हो गया। एक दीर्घ निश्वास लेकर चंपा ने मुँह फेर लिया। देखा, तो महानाविक का बजरा उसके पास है। बुधगुप्त ने झुककर हाथ बढ़ाया। चंपा उसके सहारे बजरे पर चढ़ गर्इ। दोनों पास-पास बैठ गए।

“इतनी छोटी नाव पर इधर घूमना ठीक नहीं। पास ही वह जलमग्न शैल खंड है। कहीं नाव टकरा जाती या ऊपर चढ़ जाती, चंपा तो?”


“अच्छा होता, बुधगुप्त! जल में बंदी होना कठोर प्राचीरों से तो अच्छा है।”

आह चंपा, तुम कितनी निर्दय हो! बुधगुप्त को आज्ञा देकर देखो तो, वह क्या नहीं कर सकता। जो तुम्हारे लिए नए द्वीप की सृष्टि कर सकता है, नई प्रजा खोज सकता है, नए राज्य बना सकता है, उसकी परीक्षा लेकर देखो तो...। कहो, चंपा! वह कृपाण से अपना हृदय-पिंड निकाल अपने हाथों अतल जल में विसर्जन कर दे।”—महानाविक—जिसके नाम से बाली, जावा और चंपा का आकाश गूँजता था, पवन थर्राता था, घुटनों के बल चंपा के सामने छलछलाई आँखों से बैठा था।


सामने शैलमाला की चोटी पर हरियाली में विस्तृत जल-देश में, नील पिंगल संध्या, प्रकृति की सहृदय कल्पना, विश्राम की शीतल छाया, स्वप्नलोक का सृजन करने लगी। उस मोहिनी के रहस्यपूर्ण नीलजाल का कुहक स्फुट हो उठा। जैसे मदिरा से सारा अंतरिक्ष सिक्त हो गया। सृष्टि नील कमलों में भर उठी। उस सौरभ से पागल चंपा ने बुधगुप्त के दोनों हाथ पकड़ लिए। वहाँ एक आलिंगन हुआ, जैसे क्षितिज में आकाश और सिंधु का। किंतु उस परिरंभ में सहसा चैतन्य होकर चंपा ने अपनी कंचुकी से एक कृपाण निकाल लिया।

“बुधगुप्त! आज मैं अपने प्रतिशोध का कृपाण अतल जल में डुबा देती हूँ। हृदय ने छल किया, बार-बार धोखा दिया!”—चमककर वह कृपाण समुद्र का हृदय बेधता हुआ विलीन हो गया।


“तो आज से मैं विश्वास करूँ, क्षमा कर दिया गया?”—आश्चर्यचकित कंपित कंठ से महानाविक ने पूछा।

'विश्वास? कदापि नहीं, बुधगुप्त! जब मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुम्हें घृणा करती हूँ, फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ। अँधेर है जलदस्यु। तुम्हें प्यार करती हूँ।” चंपा रो पड़ी।


वह स्वप्नों की रंगीन संध्या, तम से अपनी आँखें बंद करने लगी थी। दीर्घ निश्वास लेकर महानाविक ने कहा- “इस जीवन की पुण्यतम घड़ी की स्मृति में एक प्रकाश-गृह बनाऊँगा, चंपा! चंपा यहीं उस पहाड़ी पर। संभव है कि मेरे जीवन की धुँधली संध्या उससे आलोकपूर्ण हो जाए।”

(छः)


चंपा के दूसरे भाग में एक मनोरम शैलमाला थी। वह बहुत दूर तक सिंधु-जल में निमग्न थी। सागर का चंचल जल उस पर उछलता हुआ उसे छिपाए था। आज उसी शैलमाला पर चंपा के आदि-निवासियों का समारोह था। उन सबों ने चंपा को वनदेवी-सा सजाया था। ताम्रलिप्ति के बहुत से सैनिक नाविकों की श्रेणी में वन-कुसुम-विभूषिता चंपा शिविकारूढ़ होकर जा रही थी।

शैल के एक उँचे शिखर पर चंपा के नाविकों को सावधान करने के लिए सुदृढ़ दीप-स्तंभ बनवाया गया था। आज उसी का महोत्सव है। बुधगुप्त स्तंभ के द्वार पर खड़ा था। शिविका से सहायता देकर चंपा को उसने उतारा। दोनों ने भीतर पदार्पण किया था कि बाँसुरी और ढोल बजने लगे। पंक्तियों में कुसुम-भूषण से सजी वन-बालाएँ फूल उछालती हुई नाचने लगीं।


दीप-स्तंभ की ऊपरी खिड़की से यह देखती हुई चंपा ने जया से पूछा- “यह क्या है जया? इतनी बालिकाएँ कहाँ से बटोर लाईं?”

“आज रानी का ब्याह है न?”—कहकर जया ने हँस दिया।


बुधगुप्त विस्तृत जलनिधि की ओर देख रहा था। उसे झकझोरकर चंपा ने पूछा- “क्या यह सच है?”

“यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो यह सच भी हो सकता है, चंपा! कितने वर्षों से मैं ज्वालामुखी को अपनी छाती में दबाए हूँ।”


“चुप रहो, महानाविक! क्या मुझे निस्सहाय और कंगाल जानकर तुमने आज सब प्रतिशोध लेना चाहा?”

“मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ, चंपा! वह एक दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे।”


“मैं इसका विश्वास कर सकती। बुधगुप्त, वह दिन कितना सुंदर होता, वह क्षण कितना स्पृहणीय! आह! तुम इस निष्ठुरता में भी कितने महान होते।”

जया नीचे चली गई थी। स्तंभ के संकीर्ण प्रकोष्ठ में बुधगुप्त और चंपा एकांत में एक दूसरे के सामने बैठे थे।


बुधगुप्त ने चंपा के पैर पकड़ लिए। उच्छ्वसित शब्दों में वह कहने लगा- “चंपा, हम लोग जन्मभूमि-भारतवर्ष से कितनी दूर इन निरीह प्राणियों में इंद्र और शची के समान पूजित हैं। पर न जाने कौन अभिशाप हम लोगों को अभी तक अलग किए है। स्मरण होता है वह दार्शनिकों का देश! वह महिमा की प्रतिमा! मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है; परंतु मैं क्यों नहीं जाता? जानती हो, इतना महत्त्व प्राप्त करने पर भी मैं कंगाल हूँ! मेरा पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा तुम्हारे स्पर्श से चन्द्रकांतमणि की तरह द्रवित हुआ।

चंपा! मैं ईश्वर को नहीं मानता, मैं पाप को नहीं मानता, मैं दया को नहीं समझ सकता, मैं उस लोक में विश्वास नहीं करता। पर मुझे अपने हृदय के एक दुर्बल अंश पर श्रद्धा हो चली है। तुम न जाने कैसे एक बहकी हुई तारिका के समान मेरे शून्य में उदित हो गई हो। आलोक की एक कोमल रेखा इस निविड़तम में मुस्कुराने लगी। पशु-बल और धन के उपासक के मन में किसी शांत और एकांत कामना की हँसी खिलखिलाने लगी; पर मैं न हँस सका!


चलोगी चंपा? पोतवाहिनी पर असंख्य धनराशि लादकर राजरानी-सी जन्मभूमि के अंक में? आज हमारा परिणय हो, कल ही हम लोग भारत के लिए प्रस्थान करें। महानाविक बुधगुप्त की आज्ञा सिंधु की लहरें मानती हैं। वे स्वयं उस पोत-पुंज को दक्षिण पवन के समान भारत में पहुँचा देंगी। आह चंपा! चलो।”

चंपा ने उसके हाथ पकड़ लिए। किसी आकस्मिक झटके ने एक पलभर के लिए दोनों के अधरों को मिला दिया। सहसा चैतन्य होकर चंपा ने कहा- “बुधगुप्त! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है; सब जल तरल है; सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित नहीं। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है। प्रिय नाविक! तुम स्वदेश लौट जाओ, विभवों का सुख भोगने के लिए, और मुझे, छोड़ दो इन निरीह भोले-भाले प्राणियों के दु:ख की सहानुभूति और सेवा के लिए।”


“तब मैं अवश्य चला जाऊँगा, चंपा! यहाँ रहकर मैं अपने हृदय पर अधिकार रख सकूँ— इसमें संदेह है। आह! उन लहरों में मेरा विनाश हो जाए।”—महानाविक के उच्छ्वास में विकलता थी। फिर उसने पूछ- “तुम अकेली यहाँ क्या करोगी?”

“पहले विचार था कि कभी-कभी इस दीप-स्तंभ पर से आलोक जलाकर अपने पिता की समाधि का इस जल से अन्वेषण करूँगी। किंतु देखती हूँ, मुझे भी इसी में जलना होगा, जैसे आकाश-दीप।”


(सात)

एक दिन स्वर्ण-रहस्य के प्रभात में चंपा ने अपने दीप-स्तंभ पर से देखा—सामुद्रिक नावों की एक श्रेणी चंपा का उपकूल छोड़कर पश्चिम-उत्तर की ओर महा जल-व्याल के समान संतरण कर रही है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।


यह कितनी ही शताब्दियों पहले की कथा है। चंपा आजीवन उस दीप-स्तंभ में आलोक जलाती रही। किंतु उसके बाद भी बहुत दिन, दीपनिवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि-सदृश पूजा करते थे।

एक दिन काल के कठोर हाथों ने उसे भी अपनी चंचलता से गिरा दिया।


स्रोत :

पुस्तक : प्रतिनिधि कहानियाँ 


सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

भक्ति

https://youtu.be/sjsVd5_78Scभक्ति का स्वरूप भक्ति शब्द पर धातु से व्युत्पन्न है, जिससे भजन और भक्त शब्द बनते हैं । 'नारदीय भक्ति सूक्त' में इसे 'सा परानुरक्तिरिश्वरे' कहकर परिभाषित किया गया है। इसका अर्थ है ऐसी अनुरक्ति या प्रेम जो परम सत्ता के प्रति हो अथवा प्रेम का परम स्वरूप हो। इसीलिए भक्तजन प्रेम को पांचवा पुरुषार्थ भी मानते हैं। अन्य चार पुरुषार्थ अर्थ, धर्म काम और मोक्ष । पांचवां पुरुषार्थ इन चारों से ऊपर है। भक्त जन मोक्ष की कल्पना आयुज्य मुक्ति और साधर्म्य मुक्ति के रूप में करते हैं। साधर्म्य मुक्ति का अर्थ है ईष्ट का ही रूप धारण कर लेना। विद्यापति की ये पंक्तियां इसका प्रमाण हैं: अनुक्षण अनुक्षण माधव माधव सुमिरितेसुन्दरी भेल मधाई।ओ निज भाव सभवहि विसरलआपन गुण लुबुधाय।।"राधा का माधव के प्रेम में माधव का गुण धर्म धारण कर लेना ही साधर्म्य मुक्ति है। इसके उदाहरण सूरदास और रसखान में भी मिलते हैं। हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बार-बार 'प्रेमा पुमर्थो' महान की चर्चा की है। वे प्रेमको ही परम पुरुषार्थ मानते हैं। भक्ति साहित्य के आलोचनात्मक विवेक का उनका आधार भी यही है, बल्कि साहित्य मात्रा के आलोचनात्मक विवेक का आधार भी आचार्य द्विवेदी के लिए यही सूत्र है। शास्त्रीय दृष्टि से भक्ति के नवधा और एकादशधा रूपों की चर्चा की जाती है। 
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (श्रीमद्भा० 7 । 5। 23 )श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।इसी तरह एकादशधा भक्ति का भी वर्णन मिलता है। ये भक्ति के भेद नहीं भक्ति सोपान हैं। दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन क्रमशः भक्ति के उच्चतर सोपान माने जाते हैं। एकादशधा भक्ति में परम विरहसक्ति और तन्मयासत्ति चरम अवस्थाएं मानी जाती हैं। तुलसीदास की कविताएं दास्य भक्ति, सूरदास की साख्य भक्ति और कबीरदास की आत्मनिवेदन और तन्मयासत्ती का सुंदर उदाहरण हैं। कबीर आदि निराकार की चर्चा करने वाले साधक भक्ति को साधना मानते हैं, किंतु भक्ति का आधार भूत तत्व भाव है । इस दृष्टि से तुलसी दास का यह कथन ध्यातव्य है: 'भाव भगति हित बोहिया सदगुरू खेवनहार'। कबीर की कविता एम भी भाव तत्त्व और प्रेम तत्त्व की ही प्रधानता है, साधना उसका अनुषंगी है। आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने भक्ति आंदोलन की व्याख्यानकर्ते हुए भक्ति दो रूपों में विभाजित किया गया है निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति । फिर इन दोनों को भी दो-दो धाराओं में विभाजित किया। निर्गुण भक्ति परंपरा को ज्ञानमार्गी और प्रेम मार्ग की दो धाराओं में और सगुण भक्ति को कृष्ण भक्ति और राम भक्त के दो शाखों में विभाजित किया गया है। कबीर दास निर्गुण धरा की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं तो जायसी प्रेममार्गी या सूफी धारा के। सगुण घारा में सूरदास कृष्णभक्ति और तुलसी दास राम भक्ति के प्रतिमान हैं।इसलिए हिंदी साहित्य का भक्ति काल साहित्य में भक्ति के साहित्य सृजन का एक प्रतिदर्श है। यहां काव्य का केंद्रीय तत्व ही भक्ति है।हिंदी के साहित्य इतिहासकारों ने अध्ययन की सुविधा के लिए इसे पूर्व मध्यकाल भी कहा है । इसका समय संवत 1375 से लेकर संबंध 17 00 विक्रमी तक माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास नामक पुस्तक में इस काल का नामकरण भक्ति काल के रूप में किया है।कबीर तुलसी दादू नानक जायसी सूरदास मीराबाई रविदास रज्जब जैसे भक्तों की एक विस्तृत परंपरा इस युग में हमें दिखाई देती है।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

उल्टा पिरामिड


 उल्टा पिरामिड शैली समाचार लेखन की एक विधि है जिसमें सबसे महत्वपूर्ण जानकारी पहले दी जाती है, उसके बाद महत्व के घटते क्रम में कम महत्वपूर्ण जानकारी आती है. इस शैली को "न्यूज-गेदरिंग" या "लीड" भी कहते हैं, क्योंकि इसमें कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों और कैसे (5W और H) जैसे सवालों के जवाब तुरंत मिल जाते हैं. इस शैली का उपयोग सुनिश्चित करता है कि पाठक कम समय में भी मुख्य बिंदु जान जाए, भले ही वह पूरा लेख न पढ़े. 


शैली की संरचना:

1. इंट्रो (मुखड़ा/लीड):
यह लेख का पहला भाग होता है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक जानकारी दी जाती है. 
2. मुख्य भाग (बॉडी):
इस भाग में समाचार का विस्तार किया जाता है, जिसमें तथ्यों और संदर्भ का विवरण शामिल होता है. 
3. निष्कर्ष (टेल/पूंछ):
यह लेख का अंतिम भाग होता है, जिसमें कम महत्वपूर्ण जानकारी, जैसे अतिरिक्त पृष्ठभूमि या आंकड़े, दिए जाते हैं. 

छह ककार


किसी समाचार को लिखते हुए मुख्यतः छह सवालों का जवाब देने की कोशिश की जाती है क्या हुआ, किसके साथ हुआ, कहाँ हुआ, कब हुआ, कैसे और क्यों हुआ? 

इस-क्या, किसके (या कौन), कहाँ, कब, क्यों और कैसे को छह ककारों के रूप में भी जाना जाता है। किसी घटना, समस्या या विचार से संबंधित खबर लिखते हुए इन छह ककारों को ही ध्यान में रखा जाता है।


ककार

समाचार के मुखड़े (इंट्रो) यानी पहले पैराग्राफ़ या शुरुआती दो-तीन पंक्तियों में आमतौर पर तीन या चार ककारों को आधार बनाकर खबर लिखी जाती है।

 ये चार ककार हैं-क्या, कौन, कब और कहाँ? 

इसके बाद समाचार की बॉडी में और समापन के पहले बाकी दो ककारों-कैसे और क्यों का जवाब दिया जाता है। 

इस तरह छह ककारों के आधार पर समाचार तैयार होता है। 

इनमें से पहले चार ककार-क्या, कौन, कब और कहाँ सूचनात्मक और तथ्यों पर आधारित होते हैं जबकि बाकी दो ककारों-कैसे और क्यों में विवरणात्मक, व्याख्यात्मक और विश्लेषणात्मक पहलू पर जोर दिया जाता है।

मात्रिक छंद


चोपाई : यह एक सम मात्रिक छन्द है। इसमें बार चरण होते हैं। प्रायेक चरण में १६ मात्राएँ होती है तथा अन्त में जगण (151) या सगणः (551) न रखने का विधान है। चौपाई के चरणान्त में (51) गुरु लघु नहीं होना चाहिए। इस छंद के दो चरणों को मिलाकर एक अर्धाली बनती है ।

उदाहरण

SIISII SI।।।।।१६।।। 11=१६ कंकन-किकिनि नूपुर घुनि सुनि। कहुत लबन सन राम हृदय गुनि ।। SIIIII SI555 = १६। 15511111155-१६ मानह मदन बुंदुभी दीन्ही । मनसा विस्व-विजय कहें कीन्ही ।।


दोहा : यह एक अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसके सम चरणों (दूसरे व बौथे चरणों) में ११-११ मात्राएँ और विषम चरणों (प्रथम व तृतीय चरणों) में १३-१३ मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार १३+११, १३+११ मात्राओं के क्रम से इसके चार चरणों का संयोजन होता है। दोहा के विषम चरणों के प्रारंभ में जगण (1S1) नहीं होना चाहिए और अन्त में (SI) गुरु लघु मात्रा के साथ सम चरणों को समाप्त होना चाहिए। अन्त में (SI) गुरु लघु का क्रम आवश्यक होता है।

उदाहरण-


11111151।।।।१३।11111151=११

 रहिमन अंसुवा नयन करि, जिय दुख प्रगट करेइ ।

 SIISS S। 5-१३।।।5।।।51 ११

 जाहि निकारो गेह ते कस न भेद कहि देइ ।।


सोरठा : सोरठा को दोहा का उल्टा माना जाता है। दोहा के विषम बरणों (प्रथम व तृतीय) में ११-११ मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ) में १३-१३ मात्राएँ होती हैं। इस छंद में विषम चरणों के अन्त में तुक मिलता है।


उदाहरण-


111151151 = ११ ||5|| । ।। ऽ १३

 लिखकर लोहित लेख, हब गया दिनमणि अहा । 

SISITISI-११ 51111।ऽऽ १३ 

ब्योम-सिन्धु सखि देख, तारक बुद बुद दे रहा ।।