सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

भक्ति

https://youtu.be/sjsVd5_78Scभक्ति का स्वरूप भक्ति शब्द पर धातु से व्युत्पन्न है, जिससे भजन और भक्त शब्द बनते हैं । 'नारदीय भक्ति सूक्त' में इसे 'सा परानुरक्तिरिश्वरे' कहकर परिभाषित किया गया है। इसका अर्थ है ऐसी अनुरक्ति या प्रेम जो परम सत्ता के प्रति हो अथवा प्रेम का परम स्वरूप हो। इसीलिए भक्तजन प्रेम को पांचवा पुरुषार्थ भी मानते हैं। अन्य चार पुरुषार्थ अर्थ, धर्म काम और मोक्ष । पांचवां पुरुषार्थ इन चारों से ऊपर है। भक्त जन मोक्ष की कल्पना आयुज्य मुक्ति और साधर्म्य मुक्ति के रूप में करते हैं। साधर्म्य मुक्ति का अर्थ है ईष्ट का ही रूप धारण कर लेना। विद्यापति की ये पंक्तियां इसका प्रमाण हैं: अनुक्षण अनुक्षण माधव माधव सुमिरितेसुन्दरी भेल मधाई।ओ निज भाव सभवहि विसरलआपन गुण लुबुधाय।।"राधा का माधव के प्रेम में माधव का गुण धर्म धारण कर लेना ही साधर्म्य मुक्ति है। इसके उदाहरण सूरदास और रसखान में भी मिलते हैं। हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बार-बार 'प्रेमा पुमर्थो' महान की चर्चा की है। वे प्रेमको ही परम पुरुषार्थ मानते हैं। भक्ति साहित्य के आलोचनात्मक विवेक का उनका आधार भी यही है, बल्कि साहित्य मात्रा के आलोचनात्मक विवेक का आधार भी आचार्य द्विवेदी के लिए यही सूत्र है। शास्त्रीय दृष्टि से भक्ति के नवधा और एकादशधा रूपों की चर्चा की जाती है। 
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (श्रीमद्भा० 7 । 5। 23 )श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।इसी तरह एकादशधा भक्ति का भी वर्णन मिलता है। ये भक्ति के भेद नहीं भक्ति सोपान हैं। दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन क्रमशः भक्ति के उच्चतर सोपान माने जाते हैं। एकादशधा भक्ति में परम विरहसक्ति और तन्मयासत्ति चरम अवस्थाएं मानी जाती हैं। तुलसीदास की कविताएं दास्य भक्ति, सूरदास की साख्य भक्ति और कबीरदास की आत्मनिवेदन और तन्मयासत्ती का सुंदर उदाहरण हैं। कबीर आदि निराकार की चर्चा करने वाले साधक भक्ति को साधना मानते हैं, किंतु भक्ति का आधार भूत तत्व भाव है । इस दृष्टि से तुलसी दास का यह कथन ध्यातव्य है: 'भाव भगति हित बोहिया सदगुरू खेवनहार'। कबीर की कविता एम भी भाव तत्त्व और प्रेम तत्त्व की ही प्रधानता है, साधना उसका अनुषंगी है। आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने भक्ति आंदोलन की व्याख्यानकर्ते हुए भक्ति दो रूपों में विभाजित किया गया है निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति । फिर इन दोनों को भी दो-दो धाराओं में विभाजित किया। निर्गुण भक्ति परंपरा को ज्ञानमार्गी और प्रेम मार्ग की दो धाराओं में और सगुण भक्ति को कृष्ण भक्ति और राम भक्त के दो शाखों में विभाजित किया गया है। कबीर दास निर्गुण धरा की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं तो जायसी प्रेममार्गी या सूफी धारा के। सगुण घारा में सूरदास कृष्णभक्ति और तुलसी दास राम भक्ति के प्रतिमान हैं।इसलिए हिंदी साहित्य का भक्ति काल साहित्य में भक्ति के साहित्य सृजन का एक प्रतिदर्श है। यहां काव्य का केंद्रीय तत्व ही भक्ति है।हिंदी के साहित्य इतिहासकारों ने अध्ययन की सुविधा के लिए इसे पूर्व मध्यकाल भी कहा है । इसका समय संवत 1375 से लेकर संबंध 17 00 विक्रमी तक माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास नामक पुस्तक में इस काल का नामकरण भक्ति काल के रूप में किया है।कबीर तुलसी दादू नानक जायसी सूरदास मीराबाई रविदास रज्जब जैसे भक्तों की एक विस्तृत परंपरा इस युग में हमें दिखाई देती है।

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