'कुटज' निबंध का सारांश
'कुटज' हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रसिद्ध ललित निबंध है। इसमें लेखक ने शिवालिक पर्वत-श्रेणी के बीच उगे कुटज वृक्ष के माध्यम से जीवन के गहरे दर्शन और मानवीय मूल्यों को प्रस्तुत किया है।
लेखक शिवालिक की सूखी, पथरीली और कठोर पहाड़ियों का वर्णन करते हुए एक छोटे किंतु फूलों से लदे कुटज वृक्ष को देखता है। यह वृक्ष विपरीत परिस्थितियों में भी हरा-भरा और प्रसन्न दिखाई देता है। लेखक उसके नाम और रूप पर विचार करता है तथा उसके भाषाई और सांस्कृतिक महत्त्व की चर्चा करता है। वह बताता है कि कुटज का उल्लेख संस्कृत साहित्य में भी मिलता है और कालिदास ने भी अपनी कृति मेघदूत में कुटज पुष्पों का उल्लेख किया है।
लेखक कुटज की अदम्य जीवनी-शक्ति से अत्यंत प्रभावित है। वह देखता है कि यह वृक्ष कठोर चट्टानों को चीरकर, जल के दुर्लभ स्रोतों से रस ग्रहण कर जीवित रहता है। इससे लेखक को जीवन का संदेश मिलता है कि मनुष्य को भी कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि साहस, परिश्रम और आत्मविश्वास के बल पर आगे बढ़ना चाहिए।
निबंध में लेखक स्वार्थ और परमार्थ, सुख और दुःख, तथा जीवन के उद्देश्य पर भी विचार करता है। उसके अनुसार कुटज किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता, चाटुकारिता नहीं करता और स्वाभिमान के साथ जीवन जीता है। वह मनुष्य को सिखाता है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हृदय से पराजित नहीं होना चाहिए।
अंततः लेखक कुटज को संघर्ष, आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान, धैर्य और अपराजेय जीवन-शक्ति का प्रतीक मानता है। यह निबंध केवल एक वृक्ष का वर्णन नहीं है, बल्कि जीवन को साहस और गरिमा के साथ जीने की प्रेरणा देने वाला गहन जीवन-दर्शन है।

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