बुधवार, 22 जुलाई 2026

भूपति मरनु पेम


भूपति मरनु पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।
देखिन जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिऊँ सब सूला।
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि वेष लखनु सिय साथा।
बिन पानहिन्ह पयादे हि पाएँ। संकरु साखि रहेऊँ साखि रहेऊँ ऐहि घाएँ।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भएक न बेहू।
अब सबु आँखिन देखेडँ आई। जिअत जीव जड़ सबड सहाई।
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछीं। तजहिं विषम बिषु तापस तीछं।।
तेई रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुःख दैव सहावड काहि।।

शब्दार्थ

  • भूपति – राजा (महाराज दशरथ)
  • मरनु – मृत्यु
  • पेम पनु – प्रेमपूर्वक लिया हुआ प्रण (वचन)
  • राखी – निभाया, पूरा किया
  • जननी – माता (कैकेयी)
  • कुमति – बुरी बुद्धि
  • जगतु – संसार
  • साखी – साक्षी
  • देखिन – देखकर
  • जाहिं – जो
  • बिकल – व्याकुल
  • महतारीं – माताएँ (कौशल्या, सुमित्रा आदि)
  • जरहिं – जलती हैं
  • दुसह – असहनीय
  • जर – विरह की ज्वाला, संताप
  • पुर – नगर (अयोध्या)
  • नर-नारी – स्त्री-पुरुष
  • महीं – मैं ही
  • सकल – समस्त
  • अनरथ – अनर्थ, विपत्ति
  • मूला – मूल कारण
  • समुझि – समझकर
  • सहिऊँ – सहा
  • सूला – शूल के समान पीड़ा, कष्ट
  • बन गवनु – वन को प्रस्थान
  • कीन्ह – किया
  • रघुनाथा – श्रीराम
  • मुनि वेष – तपस्वी का वेश
  • लखनु – लक्ष्मण
  • सिय – सीता
  • साथा – साथ
  • बिनु – बिना
  • पानहिन्ह – जूतों, खड़ाऊँ
  • पयादे हि – पैदल ही
  • पाएँ – पैरों से चले
  • संकरु – भगवान शंकर
  • ऐहि घाएँ – इस बात के साक्षी
  • बहुरि – फिर
  • निहारि – देखकर
  • निषाद – निषादराज गुह
  • सनेहू – प्रेम
  • कुलिस – वज्र
  • कठिन उर – कठोर हृदय
  • भएक – हुआ
  • बेहू – विदीर्ण, फट गया
  • आँखिन – आँखों से
  • देखेँ आई – स्वयं देखकर आया
  • जिअत – जीवित
  • जीव – प्राणी
  • जड़ – संवेदनाशून्य
  • सहाई – सहन करने वाला
  • निरखि – देखकर
  • मग – मार्ग में
  • साँपिनि – साँप
  • बीछीं – बिच्छू
  • तजहिं – छोड़ देते हैं
  • विषम बिषु – भयंकर विष
  • तापस – तपस्वी
  • तीछं – वेश, स्वरूप
  • तेई – वही
  • रघुनंदनु – श्रीराम
  • अनहित – अहित, शत्रु
  • लागे – मानता है
  • तासु – उसका
  • तनय – पुत्र
  • तजि – छोड़कर
  • दैव – भाग्य, विधाता
  • सहावड – सहने योग्य बनाया
  • काहि – किसे
  • भावार्थ :

    इस पद में भरत के हृदय की गहन आत्मग्लानि, श्रीराम के प्रति अनन्य भ्रातृ-प्रेम तथा कैकेयी के कर्मों के कारण उत्पन्न दुःख का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है। भरत स्वयं को समस्त अनर्थ का कारण मानते हैं। उनके चरित्र की विनम्रता, त्याग, करुणा और धर्मनिष्ठा इस पद में अत्यंत प्रभावशाली रूप से व्यक्त हुई है।

सप्रसंग व्याख्या

संदर्भ : 

प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' के अयोध्याकाण्ड के चित्रकूट-प्रसंग से उद्धृत है। 

प्रसंग :

चित्रकूट की सभा में भरत अत्यंत करुण भाव से श्रीराम के वनगमन का स्मरण करते हुए अपने हृदय की पीड़ा व्यक्त करते हैं। वे राम के वनवास के कारण उत्पन्न परिस्थितियों का वर्णन करते हुए कभी अपनी माता कैकेयी को दोष देते हैं, तो कभी स्वयं को उनके पुत्र होने के कारण इस अनर्थ का कारण मानते हैं।

व्याख्या :

चित्रकूट की सभा में भरत अत्यंत व्यथित और भाव-विह्वल होकर श्रीराम के वनवास से उत्पन्न दुःखद घटनाओं का स्मरण करते हैं। उनके हृदय में एक ओर अपने बड़े भाई श्रीराम के प्रति असीम प्रेम है, तो दूसरी ओर अपने कारण घटित हुए अनर्थों की गहरी आत्मग्लानि भी है। वे अपने हृदय की पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि महाराज दशरथ ने अपने वचन की मर्यादा और प्रेम की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए। उन्होंने कैकेयी को दिए गए दो वरदानों का पालन किया और पुत्र-वियोग का असहनीय दुःख सहते हुए संसार से विदा हो गए। भरत कहते हैं कि माता कैकेयी की कुमति का साक्षी पूरा संसार है। उनके अनुचित आग्रह के कारण ही श्रीराम को वन जाना पड़ा और अयोध्या पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा।

भरत आगे कहते हैं कि श्रीराम के वन जाने के बाद माताएँ अत्यंत व्याकुल हो गईं। माता कौशल्या, सुमित्रा और यहाँ तक कि स्वयं कैकेयी भी अंततः पश्चाताप की अग्नि में जलने लगीं। अयोध्या के स्त्री-पुरुष भी विरह की असहनीय ज्वाला से तड़पने लगे। पूरे नगर में शोक का वातावरण छा गया। इन सब घटनाओं को देखकर भरत का हृदय अपराध-बोध से भर उठता है। वे कहते हैं कि इन समस्त अनर्थों का मूल कारण मैं ही हूँ। यदि मैं कैकेयी का पुत्र न होता, तो शायद यह विपत्ति कभी न आती। यह सोचकर उन्होंने अपने हृदय में शूल के समान चुभने वाली असहनीय पीड़ा को सहन किया।

भरत कहते हैं कि जब उन्हें यह समाचार मिला कि श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण मुनियों का वेश धारण करके नंगे पाँव वन की ओर चले गए, तब उनके हृदय पर ऐसा आघात लगा जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं कि प्रभु ने पैरों में खड़ाऊँ तक नहीं पहनी। इस बात के साक्षी स्वयं भगवान शिव हैं। तुलसीदास यहाँ यह संकेत करते हैं कि श्रीराम ने राजसी सुखों का पूर्ण त्याग करके तपस्वी का जीवन स्वीकार कर लिया था। यह स्मरण मात्र भरत के हृदय को बार-बार विदीर्ण कर देता है।

इसके बाद भरत निषादराज गुह का स्मरण करते हैं। वे कहते हैं कि जब उन्होंने निषादराज का श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम देखा, तब उन्हें अपने ऊपर और भी अधिक लज्जा आई। निषादराज, जो सामाजिक दृष्टि से एक वनवासी थे, वे भी श्रीराम के प्रति इतना निष्कपट प्रेम रखते थे; परन्तु मैं, जो उनका अपना छोटा भाई हूँ, अपने ही कारण उन्हें वन जाने से न रोक सका। भरत कहते हैं कि उस समय मेरा हृदय वज्र के समान कठोर होकर भी क्यों नहीं फट गया? यह प्रश्न उनकी गहन आत्मग्लानि और आत्मभर्त्सना का प्रमाण है।

भरत आगे कहते हैं कि अब चित्रकूट में आकर उन्होंने अपनी आँखों से श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की तपस्वी अवस्था देख ली है। उन्होंने देखा कि राजमहलों में रहने वाले प्रभु अब वृक्षों के नीचे निवास कर रहे हैं, वल्कल वस्त्र धारण किए हुए हैं और तपस्वियों के समान जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यह दृश्य देखकर भी यदि मैं जीवित हूँ, तो निश्चय ही मेरा हृदय जड़ और अत्यंत कठोर है। कोई संवेदनशील व्यक्ति इतना दुःख देखकर जीवित नहीं रह सकता।

इसके बाद भरत श्रीराम की दिव्यता का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि जिन श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को देखकर मार्ग के विषैले साँप और बिच्छू भी अपना विष छोड़ देते हैं, अर्थात जिनके दर्शन मात्र से हिंसक और क्रूर जीव भी शांत और अहिंसक हो जाते हैं, यदि कोई ऐसा व्यक्ति उन्हें अपना शत्रु या अहितकारी समझे, तो उससे अधिक अज्ञानी और दुर्भाग्यशाली कोई नहीं हो सकता। यहाँ भरत का संकेत अपनी माता कैकेयी की ओर है, जिन्होंने श्रीराम जैसे करुणामूर्ति और लोकमंगलकारी पुरुष को वन भेज दिया।

अंत में भरत अत्यंत करुण स्वर में कहते हैं कि यदि ऐसे महान, दयालु और निष्पाप श्रीराम को कोई अपना अहितकारी समझता है, तो उसका पुत्र होने के कारण मुझसे अधिक दुर्भाग्यशाली संसार में कौन हो सकता है? विधाता ने शायद मुझे इतने बड़े दुःख सहने के लिए ही जीवित रखा है। मैं अपने जीवन को किसी सौभाग्य का नहीं, बल्कि अपने दुर्भाग्य का प्रमाण मानता हूँ।

इस प्रकार इस पद में तुलसीदास ने भरत के चरित्र का अत्यंत स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। भरत का मन निरंतर आत्मग्लानि, करुणा और भ्रातृ-प्रेम से व्याकुल रहता है। वे कभी माता कैकेयी को दोष देते हैं, कभी अपने जन्म को, कभी अपने भाग्य को और अंततः स्वयं को ही समस्त अनर्थ का कारण मानते हैं। यही भाव-परिवर्तन उनके चरित्र को अत्यंत मानवीय और विश्वसनीय बनाता है। साथ ही, इस प्रसंग के माध्यम से तुलसीदास ने भरत के निष्काम प्रेम, त्याग, धर्मपालन, विनम्रता और आत्मसमर्पण को भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित किया है।


काव्य-सौन्दर्य

भाव-सौन्दर्य

  • भरत के निष्कलुष भ्रातृ-प्रेम, आत्मग्लानि, करुणा और विनम्रता का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
  • वे श्रीराम के वनगमन से उत्पन्न समस्त दुःखों के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानते हैं।
  • उनके हृदय में माता कैकेयी के प्रति क्षोभ और अपने भाग्य के प्रति गहरा दुःख स्पष्ट दिखाई देता है।

कला-सौन्दर्य

  • भाषा – साहित्यिक अवधी; सरल, मधुर एवं भावानुकूल।
  • शैली – भावात्मक, संवादात्मक तथा वर्णनात्मक।
  • रस – प्रमुखतः करुण रस, सहायक रूप में भक्ति एवं वात्सल्य
  • अलंकार
    • अतिशयोक्ति"जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछीं, तजहिं विषम बिषु" में।
    • उपमा"कुलिस कठिन उर" (हृदय की तुलना वज्र से)।
    • अनुप्रास"बिकल महतारीं", "दुसह दुःख" आदि।
  • गुण – प्रसाद एवं माधुर्य।
  • छंद – चौपाई तथा दोहा।

विशेष/टिप्पणी

इस पद में भरत का चरित्र अत्यंत मानवीय रूप में उभरकर सामने आता है। वे एक ही समय में कैकेयी को दोष देते हैं, अपने दुर्भाग्य को कोसते हैं और स्वयं को कैकेयी का पुत्र होने के कारण इस अनर्थ का उत्तरदायी मानते हैं। यही मनोवैज्ञानिक द्वंद्व इस प्रसंग की सबसे बड़ी विशेषता है और तुलसीदास की चरित्र-चित्रण कला का उत्कृष्ट उदाहरण भी है।

'भूपति मरनु पेम पनु राखी'

महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (विद्यार्थी-अनुकूल)

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (1–2 अंक)

प्रश्न 1. 'भूपति' शब्द से किसका बोध होता है?

उत्तर: महाराज दशरथ का।

प्रश्न 2. महाराज दशरथ ने किसकी रक्षा करते हुए प्राण त्यागे?

उत्तर: अपने प्रेमपूर्वक दिए गए वचन (प्रण) की रक्षा करते हुए।

प्रश्न 3. भरत के अनुसार संसार किस बात का साक्षी है?

उत्तर: माता कैकेयी की कुमति (दुष्ट बुद्धि) का।

प्रश्न 4. भरत स्वयं को किसका मूल कारण मानते हैं?

उत्तर: समस्त अनर्थों और विपत्तियों का मूल कारण।

प्रश्न 5. श्रीराम वन में किस वेश में गए थे?

उत्तर: मुनि (तपस्वी) के वेश में।

प्रश्न 6. श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन कैसे गए?

उत्तर: नंगे पाँव पैदल ही वन गए।

प्रश्न 7. भरत ने किसका प्रेम देखकर अपने हृदय को और अधिक व्यथित पाया?

उत्तर: निषादराज गुह का श्रीराम के प्रति प्रेम देखकर।

प्रश्न 8. 'कुलिस कठिन उर' का क्या अर्थ है?

उत्तर: वज्र के समान कठोर हृदय।

प्रश्न 9. भरत अपने जीवित रहने का क्या कारण बताते हैं?

उत्तर: वे अपने हृदय को जड़ और कठोर मानते हैं; इसलिए इतने दुःख सहकर भी जीवित हैं।

प्रश्न 10. इस पद का प्रमुख रस कौन-सा है?

उत्तर: करुण रस।


लघु उत्तरीय प्रश्न (3–4 अंक)

प्रश्न 1. भरत स्वयं को समस्त अनर्थों का कारण क्यों मानते हैं?

उत्तर:
भरत मानते हैं कि यदि वे कैकेयी के पुत्र न होते तो राम का वनवास, दशरथ की मृत्यु और अयोध्या का दुःख नहीं होता। इसलिए वे अपने जन्म को ही इस समस्त अनर्थ का कारण मानते हैं और गहरी आत्मग्लानि से भर उठते हैं।


प्रश्न 2. निषादराज गुह का प्रेम देखकर भरत के मन में क्या भाव उत्पन्न हुए?

उत्तर:
जब भरत ने निषादराज गुह का श्रीराम के प्रति निष्काम और गहरा प्रेम देखा तो उन्हें लगा कि उनका अपना हृदय वज्र से भी अधिक कठोर है, जो इतना सब देखकर भी फट नहीं गया। इससे उनकी आत्मग्लानि और भी बढ़ गई।


प्रश्न 3. 'जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछीं, तजहिं विषम बिषु' का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
भरत कहते हैं कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण इतने पवित्र और करुणामय हैं कि उन्हें देखकर मार्ग के विषैले साँप और बिच्छू भी अपना विष छोड़ देते हैं। ऐसे प्रभु को यदि कोई अपना अहितकारी समझे, तो वह अत्यंत दुर्भाग्यशाली है। यहाँ श्रीराम की दिव्यता और करुणा का चित्रण किया गया है।


प्रश्न 4. भरत के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
भरत अत्यंत विनम्र, त्यागी, धर्मनिष्ठ, निष्काम, आत्मग्लानि से युक्त तथा आदर्श भ्राता हैं। वे श्रीराम के प्रति अनन्य प्रेम रखते हैं और समस्त दोष अपने ऊपर लेकर अपने उच्च चरित्र का परिचय देते हैं।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5–6 अंक)

प्रश्न 1. 'भूपति मरनु पेम पनु राखी' पद के आधार पर भरत के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर:
प्रस्तुत पद में भरत का चरित्र अत्यंत उदात्त और मानवीय रूप में चित्रित हुआ है। वे श्रीराम के वनवास, महाराज दशरथ की मृत्यु तथा अयोध्या के दुःख के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानते हैं। वे अपनी माता कैकेयी के कर्मों से दुःखी हैं, परन्तु अंततः स्वयं को ही दोषी ठहराते हैं। निषादराज के प्रेम को देखकर उनकी आत्मग्लानि और भी बढ़ जाती है। वे अपने हृदय को वज्र के समान कठोर कहते हैं। उनके चरित्र में भ्रातृ-प्रेम, त्याग, विनम्रता, करुणा, धर्मनिष्ठा तथा आत्मबलिदान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। तुलसीदास ने भरत को आदर्श भाई और आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया है।


प्रश्न 2. प्रस्तुत पद की मनोवैज्ञानिक विशेषता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
इस पद में भरत के मन का अत्यंत स्वाभाविक मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। वे गहरे शोक और आत्मग्लानि से व्याकुल हैं। कभी वे कैकेयी को दोष देते हैं, कभी अपने जन्म को और कभी अपने कठोर हृदय को कोसते हैं। वे स्वयं को समस्त अनर्थ का कारण मानते हैं। उनका यह मानसिक द्वंद्व अत्यंत स्वाभाविक और हृदयस्पर्शी है। यही इस पद की सबसे बड़ी विशेषता है।


प्रश्न 3. प्रस्तुत पद का केंद्रीय भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
इस पद का केंद्रीय भाव भरत की आत्मग्लानि, निष्काम भ्रातृ-प्रेम और धर्मनिष्ठा है। वे राम-वियोग से उत्पन्न प्रत्येक दुःख के लिए स्वयं को दोषी मानते हैं। उनके मन में श्रीराम के प्रति असीम प्रेम, माता कैकेयी के प्रति क्षोभ तथा अपने दुर्भाग्य के प्रति गहरी पीड़ा है। तुलसीदास ने भरत के माध्यम से आदर्श भ्रातृत्व और आत्मत्याग की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की है।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. 'भूपति' शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(क) जनक
(ख) दशरथ ✅
(ग) भरत
(घ) श्रीराम

2. भरत के अनुसार समस्त अनर्थों का मूल कारण कौन है?
(क) कैकेयी
(ख) मंथरा
(ग) स्वयं भरत ✅
(घ) भाग्य

3. श्रीराम वन में किस वेश में गए?
(क) राजा के वेश में
(ख) सैनिक के वेश में
(ग) मुनि (तपस्वी) के वेश में ✅
(घ) साधारण गृहस्थ के वेश में

4. 'कुलिस कठिन उर' में 'कुलिस' का अर्थ है—
(क) पर्वत
(ख) वज्र ✅
(ग) पत्थर
(घ) तलवार

5. निषादराज का प्रेम देखकर भरत क्या सोचते हैं?
(क) उन्हें प्रसन्नता होती है।
(ख) वे स्वयं को भाग्यशाली मानते हैं।
(ग) वे अपने हृदय को वज्र से भी कठोर मानते हैं। ✅
(घ) वे निषादराज की प्रशंसा करते हैं।

6. इस पद का प्रमुख रस है—
(क) वीर रस
(ख) करुण रस ✅
(ग) हास्य रस
(घ) रौद्र रस


परीक्षा हेतु विशेष बिंदु

  • कवि – गोस्वामी तुलसीदास

  • ग्रंथरामचरितमानस

  • काण्ड – अयोध्याकाण्ड

  • प्रसंग – चित्रकूट-सभा

  • वक्ता – भरत

  • प्रमुख भाव – आत्मग्लानि, भ्रातृ-प्रेम, करुणा और धर्मनिष्ठा

  • प्रमुख रस – करुण रस (सहायक रूप में भक्ति)

  • प्रमुख अलंकार – उपमा, अतिशयोक्ति, अनुप्रास

  • मुख्य विशेषता – भरत स्वयं को राम-वनवास, दशरथ की मृत्यु तथा अयोध्या के समस्त दुःखों का कारण मानते हैं। उनके चरित्र में त्याग, विनम्रता और निष्काम भ्रातृ-प्रेम का उत्कृष्ट चित्रण हुआ है।

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