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| janani nirakhati |
शब्दार्थ
- जननी – माता (कौशल्या)
- निरखति – देखती है
- बान – बाण (तीर)
- धनुहियाँ – धनुष
- उर – हृदय, छाती
- नैननि – नेत्रों से
- लावति – लगाती है
- प्रभुजू – प्रभु श्रीराम
- ललित – सुंदर, मनोहर
- पनहियाँ – खड़ाऊँ
- कबहुँ – कभी
- प्रथम ज्यों – पहले की भाँति
- जाइ – जाकर
- जगावति – जगाती है
- प्रिय बचन – स्नेहपूर्ण वचन
- सवारे – सुसज्जित, मधुर
- उठहु – उठो
- तात – पुत्र
- बलि – न्यौछावर
- अनुज – छोटा भाई (लक्ष्मण)
- सखा – मित्र
- द्वारे – द्वार पर
- भूप पहँ – राजा (दशरथ) के पास
- भैया – हे भाई
- बंधु बोलि – भाई कहकर
- जेंइय – जैसे
- भावै – अच्छा लगे
- निछावरि – न्यौछावर
- समुझि – स्मरण करके
- वनगमन – वन को जाना
- रहि चकि – स्तब्ध रह जाती है
- चित्रलिखी सी – चित्र के समान निश्चल
- प्रीति सिखी सी – प्रेम की प्रतिमूर्ति के समान
संदर्भ :
प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य पुस्तक अंतरा भाग-2 से उद्धृत और गोस्वामी तुलसीदास कृत द्वारा रचित है।
प्रसंग :
प्रस्तुत पद में श्रीराम के वनवास के बाद माता कौशल्या की विरह-वेदना तथा वात्सल्य-भाव का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है।
व्याख्या :
माता कौशल्या श्रीराम के वनवास के बाद उनके वियोग में अत्यंत दुःखी हैं। वे श्रीराम के धनुष, बाण और सुंदर खड़ाऊँ को बार-बार निहारती हैं। ये वस्तुएँ उन्हें अपने प्रिय पुत्र की स्मृति दिलाती हैं। वे कभी उन्हें अपने हृदय से लगाकर ऐसा अनुभव करती हैं मानो श्रीराम को ही हृदय से लगा रही हों और कभी उन्हें अपनी आँखों से लगाकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से निहारती रहती हैं। पुत्र-वियोग में ये वस्तुएँ ही उनके लिए श्रीराम का सजीव स्वरूप बन गई हैं।
श्रीराम की स्मृतियों में खोई हुई माता कौशल्या कभी अतीत की सुखद यादों में पहुँच जाती हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे श्रीराम आज भी महल में विश्राम कर रहे हैं। वे पहले की भाँति उनके कक्ष में जाकर बड़े स्नेह से उन्हें जगाती हैं और मधुर स्वर में कहती हैं— "उठो बेटा! मैं तुम्हारे सुंदर मुख पर बलिहारी जाती हूँ। तुम्हारा छोटा भाई लक्ष्मण तथा तुम्हारे मित्र बाहर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब उठो और उनसे मिलो।" यह दृश्य उनके मातृस्नेह और वात्सल्य का अत्यंत स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत करता है।
कभी वे कल्पना करती हैं कि श्रीराम राजमहल में ही हैं और उनसे कह रही हैं— "बेटा! आज बहुत देर हो गई है। अब अपने पिता महाराज दशरथ के पास जाओ। अपने छोटे भाई और परिवार के अन्य सदस्यों से प्रेमपूर्वक मिलो। तुम्हारी माँ तुम्हारे ऊपर अपना सर्वस्व न्योछावर करती है।" इन कल्पनाओं में माता का हृदय क्षणभर के लिए अपने दुःख को भूल जाता है और वे पुराने सुखद दिनों को फिर से जीने लगती हैं।
किन्तु यह सुखद कल्पना अधिक देर तक नहीं टिकती। अगले ही क्षण उन्हें स्मरण हो आता है कि श्रीराम तो वन को चले गए हैं। यह कठोर सत्य उनके हृदय को झकझोर देता है। वे शोक और विरह से इतनी अभिभूत हो जाती हैं कि उनके शरीर की सारी चेष्टाएँ रुक जाती हैं। वे चित्र के समान निश्चल और स्तब्ध होकर खड़ी रह जाती हैं। उनके मन में न कोई विचार आता है और न ही वे कुछ बोल पाती हैं।
तुलसीदास कहते हैं कि उस समय माता कौशल्या की दशा ऐसी प्रतीत होती है मानो वे प्रेम और वात्सल्य की साक्षात् प्रतिमा हों। उनके मन में न कोई शिकायत है और न किसी के प्रति क्रोध; केवल अपने प्रिय पुत्र के वियोग की असहनीय पीड़ा और उसके दर्शन की तीव्र आकांक्षा है। कवि ने माता के मन की इस स्थिति का अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। कभी स्मृतियों में खो जाना, कभी कल्पना में पुत्र से बातें करना और फिर यथार्थ का स्मरण होते ही स्तब्ध रह जाना—ये सभी भाव प्रत्येक माँ के स्वाभाविक वात्सल्य का सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं।
इस प्रकार यह पद केवल माता कौशल्या के दुःख का वर्णन नहीं करता, बल्कि मातृ-हृदय की करुणा, वात्सल्य, स्मृति, कल्पना और विरह की उन सार्वभौमिक भावनाओं को व्यक्त करता है, जिन्हें प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति सहज ही अनुभव कर सकता है। इसी कारण यह पद हिन्दी साहित्य में वात्सल्य और करुण रस की उत्कृष्ट अभिव्यक्तियों में गिना जाता है।
काव्य-सौन्दर्य
1. भाव-सौन्दर्य
- इस पद में माता कौशल्या के वात्सल्य, करुणा और पुत्र-वियोग का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
- श्रीराम की वस्तुओं को देखकर माता का अतीत में खो जाना और फिर वनवास का स्मरण होते ही स्तब्ध हो जाना अत्यंत हृदयस्पर्शी है।
- कवि ने मातृ-हृदय की सहज संवेदनाओं का स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है।
2. कला-सौन्दर्य
- भाषा – साहित्यिक ब्रजभाषा; सरल, मधुर और भावपूर्ण।
- शैली – भावात्मक, चित्रात्मक तथा संवाद शैली।
- प्रमुख रस – करुण रस; सहायक रूप में वात्सल्य रस।
- अलंकार –
- उपमा अलंकार – "चित्रलिखी सी" (माता की स्तब्ध अवस्था की तुलना चित्र से की गई है।)
- अनुप्रास अलंकार – "बार-बार", "प्रभुजू की ललित पनहियाँ" आदि में वर्णों की आवृत्ति।
- पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार – "बार-बार" में शब्द की पुनरावृत्ति से भाव की तीव्रता व्यक्त हुई है।
- छंद – कवित्त।
- गुण – माधुर्य एवं प्रसाद गुण।
3. बिंब-विधान
धनुष, बाण, खड़ाऊँ तथा माता की स्मृतियों के माध्यम से कवि ने ऐसा सजीव दृश्य उपस्थित किया है कि पाठक स्वयं कौशल्या के करुण हृदय का अनुभव करने लगता है। "चित्रलिखी सी" बिंब माता की जड़वत् अवस्था का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करता है।
विशेष :
यह पद मातृ-वात्सल्य और पुत्र-वियोग की अमर अभिव्यक्ति है। तुलसीदास ने सरल भाषा, स्वाभाविक संवाद, सशक्त बिंबों तथा करुण रस के माध्यम से माता कौशल्या के हृदय की पीड़ा को अत्यंत प्रभावशाली और मार्मिक रूप में चित्रित किया है।
'जननी निरखति बान धनुहियाँ' — महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (1–2 अंक)
प्रश्न 1. 'जननी' शब्द से किसका बोध होता है?
उत्तर: 'जननी' शब्द से माता कौशल्या का बोध होता है।
प्रश्न 2. माता कौशल्या बार-बार किन वस्तुओं को देखती हैं?
उत्तर: वे श्रीराम के धनुष, बाण और सुंदर खड़ाऊँ को बार-बार देखती हैं।
प्रश्न 3. माता कौशल्या श्रीराम की खड़ाऊँ के साथ क्या करती हैं?
उत्तर: वे उन्हें कभी हृदय से लगाती हैं और कभी नेत्रों से लगाकर अश्रुपूरित हो जाती हैं।
प्रश्न 4. माता कौशल्या श्रीराम को जगाते समय क्या कहती हैं?
उत्तर: वे कहती हैं—"उठो बेटा! तुम्हारा छोटा भाई लक्ष्मण और तुम्हारे सखा द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।"
प्रश्न 5. 'चित्रलिखी सी' का क्या अर्थ है?
उत्तर: चित्र के समान निश्चल और स्तब्ध हो जाना।
प्रश्न 6. माता कौशल्या किस बात का स्मरण करते ही स्तब्ध हो जाती हैं?
उत्तर: श्रीराम के वनगमन का स्मरण होते ही वे स्तब्ध हो जाती हैं।
प्रश्न 7. इस पद में कौन-सा रस प्रमुख है?
उत्तर: करुण रस तथा सहायक रूप में वात्सल्य रस।
प्रश्न 8. 'चित्रलिखी सी' में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर: उपमा अलंकार।
लघु उत्तरीय प्रश्न (3–4 अंक)
प्रश्न 1. माता कौशल्या के वात्सल्य का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
माता कौशल्या श्रीराम के वनवास के बाद उनके धनुष, बाण और खड़ाऊँ को देखकर उन्हें अपने पुत्र का स्वरूप मानती हैं। वे उन्हें हृदय से लगाती हैं, नेत्रों से लगाती हैं और अतीत की स्मृतियों में खो जाती हैं। कभी वे कल्पना करती हैं कि श्रीराम महल में सो रहे हैं और उन्हें प्रेम से जगाती हैं। उनका यह स्वाभाविक मातृस्नेह वात्सल्य रस की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति है।
प्रश्न 2. 'चित्रलिखी सी' पदबंध का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब माता कौशल्या को स्मरण आता है कि श्रीराम वन को चले गए हैं, तब वे गहरे शोक में डूब जाती हैं। वे न बोल पाती हैं, न हिल-डुल पाती हैं। उनकी यही जड़वत् अवस्था 'चित्रलिखी सी' कहलाती है। इस उपमा से उनकी करुण मनःस्थिति का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण हुआ है।
प्रश्न 3. इस पद में करुण रस की अभिव्यक्ति कैसे हुई है?
उत्तर:
श्रीराम के वियोग में माता कौशल्या का बार-बार रोना, उनकी वस्तुओं को हृदय से लगाना, अतीत की स्मृतियों में खो जाना और वनवास का स्मरण होते ही स्तब्ध हो जाना—इन सभी प्रसंगों के माध्यम से करुण रस की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5–6 अंक)
प्रश्न 1. 'जननी निरखति बान धनुहियाँ' पद के आधार पर माता कौशल्या के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद में माता कौशल्या का चरित्र आदर्श भारतीय माता के रूप में चित्रित हुआ है। वे श्रीराम के प्रति अपार वात्सल्य रखती हैं। पुत्र-वियोग में वे उनके धनुष, बाण और खड़ाऊँ को अपने हृदय से लगाकर संतोष प्राप्त करती हैं। वे अतीत की स्मृतियों में खोकर श्रीराम को जगाने और उनसे बातें करने की कल्पना करती हैं। यथार्थ का स्मरण होते ही वे गहरे शोक में डूब जाती हैं। उनका प्रेम निःस्वार्थ, निष्कलुष और त्यागमय है। तुलसीदास ने उनके माध्यम से मातृ-हृदय की करुणा, ममता और वात्सल्य का अत्यंत मनोवैज्ञानिक एवं मार्मिक चित्रण किया है।
प्रश्न 2. 'जननी निरखति बान धनुहियाँ' पद की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
इस पद में करुण एवं वात्सल्य रस की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है, जो सरल, मधुर और भावानुकूल है। शैली भावात्मक, चित्रात्मक तथा संवादात्मक है। 'चित्रलिखी सी' में उपमा अलंकार, 'बार-बार' में पुनरुक्ति-प्रकाश तथा अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है। धनुष, बाण और खड़ाऊँ के माध्यम से स्मृति और विरह का सजीव बिंब उपस्थित किया गया है। कवि ने माता कौशल्या की मनःस्थिति का अत्यंत स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)
1. 'जननी' से किसका बोध होता है?
(क) कैकेयी
(ख) कौशल्या ✅
(ग) सुमित्रा
(घ) सीता
2. माता कौशल्या किसकी खड़ाऊँ को हृदय से लगाती हैं?
(क) भरत
(ख) लक्ष्मण
(ग) श्रीराम ✅
(घ) शत्रुघ्न
3. 'चित्रलिखी सी' में कौन-सा अलंकार है?
(क) रूपक
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) उपमा ✅
(घ) यमक
4. इस पद में प्रमुख रस कौन-सा है?
(क) वीर
(ख) हास्य
(ग) करुण ✅
(घ) रौद्र
5. यह पद किस काव्य से लिया गया है?
(क) रामचरितमानस
(ख) विनयपत्रिका
(ग) कवितावली ✅
(घ) गीतावली
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु
कवि – गोस्वामी तुलसीदास
कृति – कवितावली (उत्तरकाण्ड)
भाषा – ब्रजभाषा
प्रमुख रस – करुण एवं वात्सल्य
छंद – कवित्त
प्रमुख अलंकार – उपमा, अनुप्रास, पुनरुक्ति-प्रकाश
मुख्य भाव – माता कौशल्या का वात्सल्य, पुत्र-वियोग और स्मृतियों का मनोवैज्ञानिक चित्रण।

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