बुधवार, 22 जुलाई 2026

भरत राम का प्रेम

 

पुलकि सरीर सभा

 पुलकि सरीर सभा भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े।

कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।
मैं जानऊँ निज नाथ सुभाऊा अपराधिढ़ पर कोह न काऊ।
मो पर कृपा सनेह बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।
सिसुपन तें परिहरेजँ न संगू। कबहुँ न कीन मोर मन भंगू।
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेंहु खेल जितावहिं मोही।
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
दरसन तुपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।

शब्दार्थ

  • पुलकि – पुलकित होकर, रोमांचित होकर
  • समीर – हनुमान (समीर = पवन; समीरसुत = हनुमान)
  • सभाँ भए ठाढ़े – सभा में खड़े हो गए
  • नीरज नयन – कमल के समान नेत्र
  • नेह जल – प्रेम के आँसू
  • बाढ़े – भर गए
  • कहब – कहना
  • मोर – मेरा
  • मुनिनाथ – हे मुनियों के स्वामी! (श्रीराम)
  • निबाहा – निर्वाह, पालन
  • एहि तें अधिक – इससे अधिक
  • नाथ – स्वामी
  • सुभाऊ – स्वभाव
  • अपराधिहु – अपराधी पर भी
  • कोह – क्रोध
  • काऊ – कभी
  • मो पर – मुझ पर
  • सनेह बिसेखी – विशेष स्नेह
  • खेलत – खेलते समय
  • खुनिस – रुष्ट होना, नाराज़ होना
  • सिसुपन – बचपन
  • परिहरेउँ – छोड़ा
  • संगू – साथ
  • मन भंगू – मन दुखाना
  • रीति – स्वभाव, व्यवहार
  • जियँ जोही – हृदय से देखा, अनुभव किया
  • हारेंहु – हार जाने पर भी
  • जितावहिं – जिता देते थे
  • सकोच – संकोच
  • सनमुख – सामने
  • बैन – वचन
  • दरसन तुपित – दर्शन से तृप्त
  • आजु लगि – आज तक
  • पेम पिआसे – प्रेम के प्यासे


सप्रसंग व्याख्या

संदर्भ : 

प्रस्तुत कड़वक हमारी पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग दो में संकलित है। यह गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' के अयोध्याकाण्ड के चित्रकूट प्रसंग से लिया गया है। 

प्रसंग : 

यह अंश  उस समय का है जब भारत ननहाल से लौट कर आते हैं और उन्हें राम-वनवास की सूचना मिलती है । वे उन्हें मनाने के लिए वन की ओर चल पड़ते हैं । उनके साथ, राम के प्रेम और स्नेह को स्मरण करके वे भाव-विह्वल होकर अपने हृदय के उद्गार व्यक्त करते हैं।

व्याख्या :

भरत  प्रेम और आनंद से पुलकित होकर सभा में खड़े हो जाते हैं। उनके कमल के समान सुंदर नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर जाते हैं। वे अत्यंत विनम्रता से श्रीराम से कहते हैं— "हे प्रभु! मैं आपके सामने क्या कहूँ? आपके उपकारों का वर्णन करना मेरे लिए संभव नहीं है। इससे अधिक मैं और क्या कह सकता हूँ?"

वे आगे कहते हैं कि वे अपने स्वामी श्रीराम के स्वभाव को भली-भाँति जानते हैं। श्रीराम कभी किसी अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते। उन्होंने सदैव भरत पर विशेष कृपा और स्नेह बरसाया है। बचपन से लेकर आज तक उन्होंने कभी उन्हें अपने से अलग नहीं किया और न ही कभी उनका मन दुखाया।

वे कहते हैं कि खेलते समय भी जब वे हार जाते थे, तब भी श्रीराम उन्हें ही जिता देते थे। यह श्रीराम के सहज प्रेम, उदारता और मित्रवत व्यवहार का परिचायक है।

अंत में तुलसीदास के अनुसार भरत कहते हैं कि अत्यधिक प्रेम और संकोच के कारण श्रीराम के सामने अधिक कुछ बोल नहीं सके। वे केवल उन्हें निहारते ही रहे, क्योंकि उनके नेत्र आज तक श्रीराम के दर्शन के लिए प्रेम-प्यासे थे और अब भी उनके दर्शन से पूर्णतः तृप्त नहीं हुए थे।


काव्य-सौन्दर्य

1. भाव-सौन्दर्य

  • इस पद में सखा-भाव, भक्ति, विनय तथा प्रेम का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
  • निषादराज की विनम्रता, कृतज्ञता और श्रीराम के प्रति अनन्य प्रेम पाठक के हृदय को स्पर्श करता है।
  • श्रीराम के उदार, क्षमाशील और समदर्शी स्वभाव का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण हुआ है।

2. कला-सौन्दर्य

  • भाषा – अवधी; सरल, मधुर एवं भावप्रधान।
  • शैली – भावात्मक, संवादात्मक एवं चित्रात्मक।
  • प्रमुख रसभक्ति रस; सहायक रूप में करुण एवं वात्सल्य की छाया।
  • अलंकार
    • रूपक अलंकार"नीरज नयन" (नेत्रों को कमल के समान माना गया है।)
    • अनुप्रास अलंकार"पुलकि समीर सभाँ भए ठाढ़े", "पेम पिआसे" आदि में वर्णों की आवृत्ति।
    • पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार"कबहुँ", "मो पर" आदि के प्रयोग से भावों की पुनरुक्ति।
  • गुण – प्रसाद एवं माधुर्य गुण।
  • छंद – चौपाई एवं दोहा।

3. बिंब-विधान

  • "नीरज नयन नेह जल बाढ़े" में प्रेमाश्रुओं से भरे नेत्रों का अत्यंत सजीव चित्र उपस्थित हुआ है।
  • "पेम पिआसे नैन" में दर्शन की तीव्र उत्कंठा का भावात्मक बिंब अत्यंत प्रभावशाली है।

विशेष :

इस पद में तुलसीदास ने भरत  के माध्यम से आदर्श भ्रातृत्व, निष्काम भक्ति और श्रीराम के करुणामय एवं उदार चरित्र का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। सरल भाषा, स्वाभाविक संवाद, प्रभावशाली बिंब और भक्ति-रस की सरस अभिव्यक्ति इस पद को अत्यंत उत्कृष्ट बना देती है।


 

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नींच बीचु जननी मिसु पारा।

यहड कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि कोभा।
मातु मंदि भइँ साथु सुचाली। उर सन आनत कोटि कुचाली।
फर कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।
बिनु समझें निज अघ परिपाकू। जारिडँ जायँ जननि कहि काकू।
ह्वदयँँ हेरि हारेउँ सब ओराँ। एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा।
गुरु गोसाँइ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥

साधु सभाँ गुरु प्रभु निकट कहउँ सुथल सतिभाउ।
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहि मुनि रघुराउ।

शब्दार्थ

  • बिधि – विधाता, भाग्य
  • सकेउ – सका
  • सहि – सहना
  • दुलारा – प्रिय पुत्र (राम)
  • नींच बीचु – नीचता का बीज
  • जननी मिसु – माता का बहाना बनाकर
  • पारा – डाल दिया
  • सोभा – शोभा देना, उचित लगना
  • साधु – सज्जन
  • सुचि – पवित्र
  • कोभा – क्रोध
  • मंदि – मंदबुद्धि
  • साथु सुचाली – साथ में अनेक बुरी चालें
  • उर – हृदय
  • कुचाली – कुटिल चालें
  • कोदव – कोदो (एक साधारण अन्न)
  • बालि – बाली, बालियाँ
  • सुसाली – उत्तम धान
  • मुकुता – मोती
  • संबुक – सीपी
  • काली – काली सीपी
  • दोस – दोष
  • लेसु – लेशमात्र
  • अभाग – दुर्भाग्य
  • उदधि – समुद्र
  • अवगाहू – डूबा हुआ
  • अघ – पाप
  • परिपाकू – फल
  • जारिड़ँ – जल जाए
  • काकू – व्यर्थ विनय, दीन प्रार्थना
  • ह्वदयँ हेरि – हृदय से विचार करके
  • भलेंहि – भलाई में
  • परिनामू – परिणाम
  • सतिभाउ – सच्चे हृदय से
  • प्रेम प्रपंचु – प्रेम का छल या दिखावा
  • फुर – सत्य
  • रघुराउ – श्रीराम

सप्रसंग व्याख्या

संदर्भ : 

प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' के अयोध्याकाण्ड के चित्रकूट-प्रसंग से उद्धृत है।

प्रसंग

 चित्रकूट में गुरु वशिष्ठ, मुनियों, माताओं, निषादराज गुह तथा अयोध्या की प्रजा की उपस्थिति में सभा आयोजित है। भरत श्रीराम से अयोध्या लौटकर राज्य स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। अपनी बात कहते हुए वे अत्यंत भाव-विह्वल हो उठते हैं। उनके हृदय में माता कैकेयी के प्रति क्षोभ, अपने भाग्य के प्रति रोष और स्वयं के प्रति आत्मग्लानि—तीनों भाव एक साथ उमड़ पड़ते हैं।

व्याख्या

भरत कहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता मेरे प्रिय बड़े भाई श्रीराम का मेरे प्रति दुलार सहन नहीं कर सका। उसी ने मेरी माता कैकेयी को माध्यम बनाकर यह अनर्थ करा दिया। फिर वे सोचते हैं कि माता को दोष देना भी उचित नहीं है, क्योंकि सज्जन लोग बिना कारण किसी पर क्रोध नहीं करते। किंतु अगले ही क्षण उनका शोक और वेदना फिर उभर आती है और वे माता कैकेयी को कठोर शब्दों में धिक्कारते हैं। वे कहते हैं कि यदि उनके हृदय में इतनी कुटिलता न होती, तो वे ऐसा अन्यायपूर्ण कार्य कैसे करतीं?

भरत अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उदाहरण देते हैं कि क्या कोदो के पौधे में उत्तम धान की बालियाँ लग सकती हैं अथवा क्या काली सीपी से मोती उत्पन्न हो सकते हैं? अर्थात् जिस कारण से यह अनर्थ हुआ है, वह स्वाभाविक नहीं प्रतीत होता। परंतु थोड़ी ही देर बाद उनका विवेक जाग्रत हो जाता है और वे स्वीकार करते हैं कि वास्तव में किसी का भी दोष नहीं है। यह सब उनके अपने दुर्भाग्य और पूर्वजन्म के कर्मों का फल है। वे कहते हैं कि बिना अपने पापों का विचार किए माता को दोष देना अनुचित होगा।

अंत में भरत अत्यंत विनम्र होकर कहते हैं कि उन्होंने चारों ओर से विचार कर लिया है। उन्हें विश्वास है कि गुरु वशिष्ठ, प्रभु श्रीराम और माता सीता जो निर्णय करेंगे, वही सबके हित में होगा। वे सभा में उपस्थित सभी लोगों से कहते हैं कि उनके ये वचन किसी प्रकार का दिखावा नहीं, बल्कि उनके हृदय के सच्चे और निष्कपट भाव हैं। उनके प्रेम की सत्यता को मुनिजन और स्वयं श्रीराम भली-भाँति जानते हैं।


काव्य-सौन्दर्य

1. भाव-सौन्दर्य

  • भरत की आत्मग्लानि, विनम्रता, भ्रातृ-प्रेम, गुरु-भक्ति और धर्मनिष्ठा का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
  • वे अपनी माता पर आरोप लगाने के स्थान पर स्वयं को दोषी मानते हैं, जिससे उनके उच्च चरित्र का परिचय मिलता है।
  • श्रीराम के प्रति भरत का निष्काम प्रेम और समर्पण इस पद का प्रमुख भाव है।

2. कला-सौन्दर्य

  • भाषा – साहित्यिक अवधी; सरल, प्रवाहपूर्ण और भावानुकूल।
  • शैली – संवादात्मक, भावात्मक तथा तर्कपूर्ण।
  • प्रमुख रस – भक्ति रस तथा करुण रस।
  • अलंकार
    • दृष्टान्त अलंकार"फर कि कोदव बालि सुसाली, मुकुता प्रसव कि संबुक काली" में उदाहरण देकर बात स्पष्ट की गई है।
    • अनुप्रास अलंकार"प्रेम प्रपंचु", "भलेंहि भल" आदि में वर्णों की आवृत्ति।
    • प्रश्नालंकार – "फर कि कोदव...", "मुकुता प्रसव..." में प्रश्न के माध्यम से कथन को प्रभावशाली बनाया गया है।
  • गुण – प्रसाद एवं माधुर्य गुण।
  • छंद – चौपाई तथा दोहा।

विशेष: 

यह पद भरत के निष्कलुष चरित्र, विनय, आत्मत्याग और श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा का उत्कृष्ट चित्रण है। तुलसीदास ने भरत को आदर्श भ्राता और धर्मनिष्ठ पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे यह प्रसंग रामचरितमानस के सर्वाधिक मार्मिक प्रसंगों में गिना जाता है।


भूपति मरनु पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।
देखिन जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिऊँ सब सूला।
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि वेष लखनु सिय साथा।
बिन पानहिन्ह पयादे हि पाएँ। संकरु साखि रहेऊँ साखि रहेऊँ ऐहि घाएँ।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भएक न बेहू।
अब सबु आँखिन देखेडँ आई। जिअत जीव जड़ सबड सहाई।
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछीं। तजहिं विषम बिषु तापस तीछं।।
तेई रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुःख दैव सहावड काहि।।

शब्दार्थ

  • भूपति – राजा (महाराज दशरथ)
  • मरनु – मृत्यु
  • पेम पनु – प्रेमपूर्वक लिया हुआ प्रण (वचन)
  • राखी – निभाया, पूरा किया
  • जननी – माता (कैकेयी)
  • कुमति – बुरी बुद्धि
  • जगतु – संसार
  • साखी – साक्षी
  • देखिन – देखकर
  • जाहिं – जो
  • बिकल – व्याकुल
  • महतारीं – माताएँ (कौशल्या, सुमित्रा आदि)
  • जरहिं – जलती हैं
  • दुसह – असहनीय
  • जर – विरह की ज्वाला, संताप
  • पुर – नगर (अयोध्या)
  • नर-नारी – स्त्री-पुरुष
  • महीं – मैं ही
  • सकल – समस्त
  • अनरथ – अनर्थ, विपत्ति
  • मूला – मूल कारण
  • समुझि – समझकर
  • सहिऊँ – सहा
  • सूला – शूल के समान पीड़ा, कष्ट
  • बन गवनु – वन को प्रस्थान
  • कीन्ह – किया
  • रघुनाथा – श्रीराम
  • मुनि वेष – तपस्वी का वेश
  • लखनु – लक्ष्मण
  • सिय – सीता
  • साथा – साथ
  • बिनु – बिना
  • पानहिन्ह – जूतों, खड़ाऊँ
  • पयादे हि – पैदल ही
  • पाएँ – पैरों से चले
  • संकरु – भगवान शंकर
  • ऐहि घाएँ – इस बात के साक्षी
  • बहुरि – फिर
  • निहारि – देखकर
  • निषाद – निषादराज गुह
  • सनेहू – प्रेम
  • कुलिस – वज्र
  • कठिन उर – कठोर हृदय
  • भएक – हुआ
  • बेहू – विदीर्ण, फट गया
  • आँखिन – आँखों से
  • देखेँ आई – स्वयं देखकर आया
  • जिअत – जीवित
  • जीव – प्राणी
  • जड़ – संवेदनाशून्य
  • सहाई – सहन करने वाला
  • निरखि – देखकर
  • मग – मार्ग में
  • साँपिनि – साँप
  • बीछीं – बिच्छू
  • तजहिं – छोड़ देते हैं
  • विषम बिषु – भयंकर विष
  • तापस – तपस्वी
  • तीछं – वेश, स्वरूप
  • तेई – वही
  • रघुनंदनु – श्रीराम
  • अनहित – अहित, शत्रु
  • लागे – मानता है
  • तासु – उसका
  • तनय – पुत्र
  • तजि – छोड़कर
  • दैव – भाग्य, विधाता
  • सहावड – सहने योग्य बनाया
  • काहि – किसे
  • भावार्थ :

    इस पद में भरत के हृदय की गहन आत्मग्लानि, श्रीराम के प्रति अनन्य भ्रातृ-प्रेम तथा कैकेयी के कर्मों के कारण उत्पन्न दुःख का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है। भरत स्वयं को समस्त अनर्थ का कारण मानते हैं। उनके चरित्र की विनम्रता, त्याग, करुणा और धर्मनिष्ठा इस पद में अत्यंत प्रभावशाली रूप से व्यक्त हुई है।

सप्रसंग व्याख्या

संदर्भ : 

प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' के अयोध्याकाण्ड के चित्रकूट-प्रसंग से उद्धृत है। 

प्रसंग :

चित्रकूट की सभा में भरत अत्यंत करुण भाव से श्रीराम के वनगमन का स्मरण करते हुए अपने हृदय की पीड़ा व्यक्त करते हैं। वे राम के वनवास के कारण उत्पन्न परिस्थितियों का वर्णन करते हुए कभी अपनी माता कैकेयी को दोष देते हैं, तो कभी स्वयं को उनके पुत्र होने के कारण इस अनर्थ का कारण मानते हैं।

व्याख्या :

भरत कहते हैं कि पिता महाराज दशरथ ने अपने वचन की रक्षा करते हुए प्राण त्याग दिए और मेरी माता कैकेयी की कुटिल बुद्धि की साक्षी पूरा संसार है। श्रीराम के वन चले जाने से माताएँ अत्यंत व्याकुल हो गईं तथा अयोध्या के स्त्री-पुरुष असहनीय विरहाग्नि में जलने लगे। इन समस्त अनर्थों का मूल कारण मैं ही हूँ। यह सोचकर मैंने अपने हृदय में असहनीय पीड़ा सहन की है।

जब मुझे यह समाचार मिला कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण मुनि का वेश धारण कर पैदल ही वन को चले गए हैं, तब मेरे हृदय पर गहरा आघात पहुँचा। उन्होंने पैरों में खड़ाऊँ तक नहीं पहनी थी। इस बात का साक्षी स्वयं भगवान शंकर हैं। बाद में जब मैंने निषादराज गुह का श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम देखा, तब भी मेरा हृदय वज्र के समान कठोर होकर फट क्यों नहीं गया, यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय है।

अब चित्रकूट में आकर मैंने अपनी आँखों से श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की तपस्वी अवस्था देख ली है। यह सब देखकर भी यदि मैं जीवित हूँ, तो यह मेरे जड़ और कठोर हृदय का ही प्रमाण है। जिन तपस्वी रूपधारी श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को देखकर मार्ग के विषैले सर्प और बिच्छू भी अपना विष छोड़ देते हैं, उन्हीं परम करुणामय प्रभु को यदि कोई अपना अहितकारी समझे, तो उस व्यक्ति के पुत्र होने के कारण मुझसे बढ़कर दुर्भाग्यशाली और कौन हो सकता है? मेरे समान व्यक्ति को इतने बड़े दुःख सहने के लिए विधाता ने ही जीवित रखा है।


काव्य-सौन्दर्य

भाव-सौन्दर्य

  • भरत के निष्कलुष भ्रातृ-प्रेम, आत्मग्लानि, करुणा और विनम्रता का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
  • वे श्रीराम के वनगमन से उत्पन्न समस्त दुःखों के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानते हैं।
  • उनके हृदय में माता कैकेयी के प्रति क्षोभ और अपने भाग्य के प्रति गहरा दुःख स्पष्ट दिखाई देता है।

कला-सौन्दर्य

  • भाषा – साहित्यिक अवधी; सरल, मधुर एवं भावानुकूल।
  • शैली – भावात्मक, संवादात्मक तथा वर्णनात्मक।
  • रस – प्रमुखतः करुण रस, सहायक रूप में भक्ति एवं वात्सल्य
  • अलंकार
    • अतिशयोक्ति"जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछीं, तजहिं विषम बिषु" में।
    • उपमा"कुलिस कठिन उर" (हृदय की तुलना वज्र से)।
    • अनुप्रास"बिकल महतारीं", "दुसह दुःख" आदि।
  • गुण – प्रसाद एवं माधुर्य।
  • छंद – चौपाई तथा दोहा।

विशेष/टिप्पणी

इस पद में भरत का चरित्र अत्यंत मानवीय रूप में उभरकर सामने आता है। वे एक ही समय में कैकेयी को दोष देते हैं, अपने दुर्भाग्य को कोसते हैं और स्वयं को कैकेयी का पुत्र होने के कारण इस अनर्थ का उत्तरदायी मानते हैं। यही मनोवैज्ञानिक द्वंद्व इस प्रसंग की सबसे बड़ी विशेषता है और तुलसीदास की चरित्र-चित्रण कला का उत्कृष्ट उदाहरण भी है।

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