बुधवार, 22 जुलाई 2026

राघौ! एक बार फिरि आवौ

raghau ek bar firi

भावार्थ :
इस पद में माता कौशल्या के हृदय में उमड़ते वात्सल्य, पुत्र-वियोग की असहनीय वेदना तथा श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य ममता का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है। तुलसीदास ने करुण रस, स्वाभाविक संवाद, उपमा अलंकार तथा वात्सल्य-भाव के माध्यम से मातृ-हृदय की गहन संवेदना को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। 

शब्दार्थ

  • राघौ – हे राघव! (श्रीराम)
  • फिरि – फिर, पुनः
  • आवौ – आओ
  • ए बर – इस बार
  • बाजि – घोड़े
  • बिलोकि – देखकर
  • अपने – अपने
  • बहुरो – पुनः
  • बनहिं – वन को, वन में
  • सिधावौ – चले जाना
  • पय – दूध
  • प्याइ – पिलाकर
  • पोखि – सहलाकर, स्नेहपूर्वक स्पर्श करके
  • कर-पंकज – कमल के समान कोमल हाथ
  • वार-वार – बार-बार
  • चुचुकारे – दुलारते थे, प्यार करते थे
  • क्यों जीवहिं – कैसे जीवित रहेंगे
  • लाडिले – अत्यंत प्रिय, दुलारे
  • निपट – बिल्कुल, पूर्णतः
  • बिसरे – भुला दिए गए, विस्मृत
  • सौगुनी – सौ गुना
  • सार करत हैं – सेवा-संभाल करते हैं
  • अति प्रिय जानि – अत्यंत प्रिय समझकर
  • तिहारे – तुम्हारे
  • तदपि – फिर भी
  • दिनहिं दिन – दिन-प्रतिदिन
  • झाँवरे – दुबले, मुरझाए, क्षीण
  • मनहुँ – मानो
  • कमल हिममारे – पाले से मुरझाया हुआ कमल
  • पथिक – यात्री
  • मिलहिं – मिलें
  • कहियो – कह देना
  • संदेसो – संदेश
  • मोहि – मुझे
  • सबहिन तें – सबसे अधिक
  • अंदेसो – चिंता, आशंका
संदर्भ :

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य पुस्तक अंतरा भाग-2 से उद्धृत और  गोस्वामी तुलसीदास कृत द्वारा रचित  है। 

प्रसंग : इसमें भगवान श्रीराम के वनगमन के बाद माता कौशल्या के हृदय की करुण दशा का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है। पुत्र-वियोग से व्याकुल माता अपने मन की वेदना व्यक्त करती हैं और एक पथिक के माध्यम से श्रीराम तक अपना संदेश पहुँचाने की प्रार्थना करती हैं।

व्याख्या :

माता कौशल्या राम के द्वारा पिता के आदेश को पूरा करने मेन बाधक नहीं बनाना चाहतीं, किन्तु उनके हृदय में उमड़ते वात्सल्य और पुत्र-दर्शन की तीव्र आकांक्षा को रोक भी नहीं पातीं । इसलिए अत्यंत करुण स्वर में श्रीराम को संबोधित करते हुए कहती हैं— "हे राघव! एक बार फिर अयोध्या लौट आओ। अपने प्रिय घोड़ों को देखकर पुनः वन के लिए चले जाना।" यह कथन मां की ममता के साथ राम के पुत्र धर्म की मर्यादा और प्रजावत्सल भाव तीनों का निर्वाह करता है। वे स्मरण करती हैं कि जिन घोड़ों को श्रीराम स्वयं अपने कमल-समान हाथों से दूध पिलाते थे, उन्हें बार-बार सहलाते और प्रेमपूर्वक दुलारते थे, वे अब अपने प्रिय स्वामी के बिना कैसे जीवित रहेंगे? ऐसा प्रतीत होता है मानो वे भी राम-वियोग में दुखी होकर उन्हें भूलते जा रहे हों।

इसके बाद कौशल्या भरत के गुणों की प्रशंसा करते हुए कहती हैं कि भरत श्रीराम के घोड़ों की सौ गुना अधिक सेवा और देखभाल करते हैं, क्योंकि वे उन्हें श्रीराम की प्रिय वस्तु मानते हैं। फिर भी वे घोड़े दिन-प्रतिदिन दुर्बल और उदास होते जा रहे हैं, जैसे हिमपात से कमल का फूल मुरझा जाता है। इस उपमा के माध्यम से कवि ने वियोग की पीड़ा का अत्यंत सजीव चित्रण किया है।

अंत में माता कौशल्या किसी वन की ओर जाने वाले पथिक से विनम्र निवेदन करती हैं कि यदि वन में कहीं श्रीराम मिलें तो उनसे उनकी माता का संदेश अवश्य कह देना। तुलसीदास कहते हैं कि माता कौशल्या को अपने जीवन से अधिक श्रीराम की चिंता है। उन्हें यह भय सताता रहता है कि वन में उनका कोमल पुत्र किस प्रकार कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहा होगा। यही मातृस्नेह और वात्सल्य इस पद का प्राण है।

काव्य-सौन्दर्य

(1) भाव-सौन्दर्य :
प्रस्तुत पद में माता कौशल्या के निष्कलुष मातृ-प्रेम, श्रीराम के प्रति वात्सल्य तथा पुत्र-वियोग की करुण व्यथा का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है। राम के साथ-साथ उनके प्रिय घोड़ों की दशा का वर्णन करके कवि ने वियोग की पीड़ा को और भी अधिक हृदयस्पर्शी बना दिया है।

(2) कला-सौन्दर्य :

  • भाषा – साहित्यिक ब्रजभाषा, सरल, मधुर एवं भावानुकूल।
  • शैली – भावात्मक, चित्रात्मक तथा संवाद शैली का सुंदर समन्वय।
  • रस – प्रमुख रूप से करुण रस, साथ ही वियोग वात्सल्य रस की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति।
  • अलंकार
    • उत्प्रेक्षा अलंकार"मनहुँ कमल हिममारे" (घोड़ों की मुरझाई दशा की तुलना पाले से

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