सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
"घर में वापसी" कविता के कवि सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' हैं। यह कविता एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन-संघर्ष, पारिवारिक संबंधों और भावनात्मक स्थितियों का मार्मिक चित्रण करती है। कवि ने परिवार के सदस्यों की आँखों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व, दुख, आशाओं और संवेदनाओं को व्यक्त किया है।
कविता में गरीबी के कारण उत्पन्न संवादहीनता और रिश्तों की संकोचपूर्ण स्थिति को दर्शाया गया है। परिवार के सदस्य एक-दूसरे से प्रेम तो करते हैं, परंतु अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते। कवि चाहता है कि परिवार के लोग आपसी प्रेम, विश्वास और आत्मीयता को खुलकर स्वीकार करें और अपने घर तथा रिश्तों पर गर्व कर सकें।
पारिवारिक संबंध, गरीबी, संवेदनशीलता, आत्मीयता, संवादहीनता और घर का भावनात्मक महत्व।
मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं
माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही
तीर्थ-यात्रा की बस के
दो पंचर पहिए हैं।
पिता की आँखें—
लोहसाँय की ठंडी सलाख़ें हैं
बेटी की आँखें मंदिर में दीवट पर
जलते घी के
दो दिए हैं।
पत्नी की आँखें आँखें नहीं
हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं
वैसे हम स्वजन हैं, क़रीब हैं
बीच की दीवार के दोनों ओर
क्योंकि हम पेशेवर ग़रीब हैं।
रिश्ते हैं; लेकिन खुलते नहीं हैं
और हम अपने ख़ून में इतना भी लोहा
नहीं पाते,
कि हम उससे एक ताली बनवाते
और भाषा के भुन्ना-सी ताले को खोलते
रिश्तों को सोचते हुए
आपस में प्यार से बोलते,
कहते कि ये पिता हैं,
यह प्यारी माँ है, यह मेरी बेटी है
पत्नी को थोड़ा अलग
करते—तू मेरी
हमसफ़र है,
हम थोड़ा जोखिम उठाते
दीवार पर हाथ रखते और कहते
यह मेरा घर है।

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