Subscribe Us

लेबल

सोमवार, 15 जून 2026

बादल को घिरते देखा है

  •  नागार्जुन

यह कविता नागार्जुन की प्रसिद्ध प्रकृति-वर्णनात्मक कविता है। इसमें कवि ने हिमालय की अद्भुत प्राकृतिक छटा और वहाँ के मनोहारी दृश्यों का सजीव चित्रण किया है। कवि बार-बार "बादल को घिरते देखा है" कहकर अपने प्रत्यक्ष अनुभवों को व्यक्त करता है।

कवि बताता है कि उसने हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों पर बादलों को घिरते देखा है। मानसरोवर झील के स्वर्णिम कमलों पर ओस की बूँदों को मोतियों की तरह गिरते देखा है। हिमालय की झीलों में वर्षा ऋतु की उमस से व्याकुल हंसों को तैरते हुए देखा है।

वसंत ऋतु के सुंदर वातावरण में कवि ने चकवा-चकवी के प्रेम और उनके प्रणय-कलह का दृश्य भी देखा है। दुर्गम बर्फीली घाटियों में कस्तूरी मृग को अपनी ही सुगंध के पीछे भटकते हुए देखा है। आगे कवि पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए कुबेर की अलकापुरी और कालिदास के मेघदूत की स्मृति करता है, परंतु वह बताता है कि उसने स्वयं कैलाश पर्वत पर विशाल बादलों को प्रचंड हवाओं से टकराते देखा है।

अंतिम भाग में कवि हिमालय के देवदारु वनों, झरनों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच रहने वाले किन्नर-किन्नरियों के संगीत, नृत्य और आनंदमय जीवन का चित्र प्रस्तुत करता है। इस प्रकार कविता हिमालय की भव्यता, प्रकृति की सुंदरता और कवि के प्रत्यक्ष अनुभवों का अत्यंत जीवंत वर्णन करती है।

मुख्य भाव

यह कविता हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता, रहस्य, वैभव और प्रकृति के प्रति कवि के गहरे आकर्षण तथा अनुभूतियों को व्यक्त करती है। कवि ने प्रकृति के विविध रूपों का अत्यंत सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है।


कविता 

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,

बादल को घिरते देखा है।


छोटे-छोटे मोती जैसे

उसके शीतल तुहिन कणों को


मानसरोवर के उन स्वर्णिम

कमलों पर गिरते देखा है,


बादल को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर


छोटी बड़ी कई झीलें हैं,

उनके श्यामल नील सलिल में


समतल देशों से आ-आकर

पावस की ऊमस से आकुल


तिक्त-मधुर बिषतंतु खोजते

हंसों को तिरते देखा है।


बादल को घिरते देखा है।

ऋतु वसंत का सुप्रभात था


मंद-मंद था अनिल बह रहा

बालारुण की मृदु किरणें थीं


अगल-बग़ल स्वर्णाभ शिखर थे

एक-दूसरे से विरहित हो


अलग-अलग रहकर ही जिनको

सारी रात बितानी होती,


निशा-काल से चिर-अभिशापित

बेबस उस चकवा-चकई का


बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें

उस महान सरवर के तीरे


शैवालों की हरी दरी पर

प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।


बादल को घिरते देखा है।

दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में


शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर

अलख नाभि से उठने वाले


निज के ही उन्मादक परिमल—

के पीछे धावित हो-होकर


तरल-तरुण कस्तूरी मृग को

अपने पर चिढ़ते देखा है,


बादल को घिरते देखा है।

कहाँ गए धनपति कुबेर वह


कहाँ गई उसकी वह अलका

नहीं ठिकाना कालिदास के


व्योम-प्रवाही गंगाजल का,

ढूँढ़ा बहुत किंतु लगा क्या


मेघदूत का पता कहीं पर,

कौन बताए वह छायामय


बरस पड़ा होगा न यहीं पर,

जाने दो, वह कवि-कल्पित था,


मैंने तो भीषण जाड़ों में

नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,


महामेघ को झंझानिल से

गरज-गरज भिड़ते देखा है,


बादल को घिरते देखा है।

शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल


मुखरित देवदारु-कानन में,

शोणित धवल भोज पत्रों से


छाई हुई कुटी के भीतर

रंग-बिरंगे और सुगंधित


फूलों से कुंतल को साजे,

इंद्रनील की माला डाले


शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,

कानों में कुवलय लटकाए,


शतदल लाल कमल वेणी में,

रजत-रचित मणि-खचित कलामय


पान पात्र द्राक्षासव पूरित

रखे सामने अपने-अपने


लोहित चंदन की त्रिपटी पर,

नरम निदाग बाल-कस्तूरी


मृगछालों पर पलथी मारे

मदिरारुण आँखों वाले उन


उन्मद किन्नर-किन्नरियों की

मृदुल मनोरम अँगुलियों को


वंशी पर फिरते देखा है,

बादल को घिरते देखा है।



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Pinned Post

घर में वापसी

 धूमिल कविता : (मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं...) विस्तृत सारांश यह कविता एक गरीब परिवार के जीवन, संघर्ष, रिश्तों और भावनात्मक स्थितिय...