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बुधवार, 17 जून 2026

देवसेना का गीत

 

कविता का परिचय


"आह! वेदना मिली विदाई!"
जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक स्कंदगुप्त का एक अत्यंत मार्मिक गीत है। यह गीत नाटक की प्रमुख पात्र देवसेना द्वारा गाया गया है। इसमें देवसेना के हृदय की गहरी वेदना, निराशा, असफल प्रेम और जीवन के प्रति मोहभंग की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं।

गीत में देवसेना अपने जीवन के संघर्षों और टूटे हुए स्वप्नों को स्मरण करते हुए कहती है कि उसने प्रेम, त्याग और समर्पण के रूप में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, किंतु बदले में उसे केवल दुःख और वेदना प्राप्त हुई। उसकी आशाएँ विफल हो गईं और जीवन की संचित पूँजी व्यर्थ चली गई। इस प्रकार यह गीत मानवीय संवेदनाओं, करुणा, विरह तथा जीवन की नश्वरता का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण प्रस्तुत करता है।

इस गीत में करुण रस की प्रधानता है तथा भाषा भावपूर्ण, काव्यात्मक और संगीतात्मक है। यह गीत छायावादी काव्य की संवेदनशीलता और भावुकता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

आह! वेदना मिली विदाई!

मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,


मधुकरियों की भीख लुटाई।

छलछल थे संध्या के श्रमकण,


आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।

मेरी यात्रा पर लेती थी—


नीरवता अनंत अँगड़ाई।

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,


गहन-विपिन की तरु-छाया में,

पथिक उनींदी श्रुति में किसने—


यह विहाग की तान उठाई।

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,


रही बचाए फिरती कबकी।

मेरी आशा आह! बावली,


तूने खो दी सकल कमाई।

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,


प्रलय चल रहा अपने पथ पर।

मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,


उससे हारी-होड़ लगाई।

लौटा लो यह अपनी थाती


मेरी करुणा हा-हा खाती

विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे


इससे मन की लाज गँवाई।

प्रसंग

प्रस्तुत गीत जयशंकर प्रसाद रचित नाटक स्कंदगुप्त से लिया गया है। इस गीत में देवसेना अपने जीवन की असफलताओं, टूटे हुए स्वप्नों और प्रेम-वियोग की पीड़ा को व्यक्त करती है। उसे लगता है कि जीवनभर त्याग और प्रेम करने के बाद भी उसे केवल वेदना ही प्राप्त हुई है।

पाठ-परिचय

इस गीत में देवसेना के अंतर्मन की करुण वेदना व्यक्त हुई है। उसने अपने जीवन की सारी भावनाएँ और प्रेम दूसरों के लिए समर्पित कर दिए, किंतु बदले में उसे निराशा और दुःख मिला। उसकी आशाएँ टूट चुकी हैं और वह जीवन के संघर्ष से थककर अपनी करुणा तथा संवेदनाओं को संसार को लौटाना चाहती है।

सारांश

देवसेना कहती है कि उसे जीवन में सुख नहीं, बल्कि वेदना ही मिली है। उसने अपने जीवन की संचित भावनाओं को दूसरों पर न्योछावर कर दिया, किंतु बदले में केवल दुःख प्राप्त हुआ। जीवन-यात्रा के दौरान उसकी आशाएँ और सपने धीरे-धीरे नष्ट हो गए।

वह अनुभव करती है कि जीवन रूपी रथ पर विनाश और प्रलय आगे बढ़ रहे हैं तथा वह अपनी कमजोर शक्ति से उनका सामना नहीं कर पा रही है। अंततः वह संसार से कहती है कि अपनी यह धरोहर वापस ले ले, क्योंकि अब वह इसे सँभालने में असमर्थ है। गीत में गहरी निराशा, करुणा और विरह की भावना व्यक्त हुई है।

'आह! वेदना मिली विदाई!' : विस्तृत सारांश

प्रस्तुत गीत जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक स्कंदगुप्त से लिया गया है। यह गीत देवसेना के हृदय की गहन पीड़ा, निराशा और जीवन के प्रति मोहभंग को व्यक्त करता है। इसमें करुण रस की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।

गीत के आरंभ में देवसेना कहती है कि जीवन की विदाई बेला में उसे सुख नहीं, बल्कि वेदना प्राप्त हुई है। उसने जीवन भर अनेक आशाएँ और सपने संजोए थे तथा अपने प्रेम, त्याग और भावनाओं की संचित पूँजी दूसरों पर न्योछावर कर दी थी। किंतु उसके बदले में उसे केवल निराशा और दुःख ही प्राप्त हुआ। उसे लगता है कि उसने भ्रमवश अपने जीवन की सारी कमाई लुटा दी है।

देवसेना अपने जीवन की संध्या का चित्र प्रस्तुत करती है। वह कहती है कि जैसे संध्या के समय श्रम की बूँदें आँसुओं के समान टपकती हैं, उसी प्रकार उसके जीवन में भी निरंतर पीड़ा और विषाद का प्रवाह बना हुआ है। चारों ओर गहरा सन्नाटा छाया हुआ है और उसकी जीवन-यात्रा अकेलेपन में आगे बढ़ रही है। इसी बीच उसे ऐसा अनुभव होता है जैसे किसी पक्षी का मधुर गीत उसके कानों में गूँज रहा हो, जो उसके बीते हुए सुखद स्वप्नों की स्मृति जगा देता है।

कवयित्री अपनी आशाओं को संबोधित करते हुए उन्हें 'बावली' कहती है। उसका मानना है कि उसकी अवास्तविक आशाओं और कल्पनाओं ने उसे केवल दुःख दिया है। जिन सपनों को उसने बड़े प्रेम से संजोया था, वे सब नष्ट हो गए और उसके जीवन की सारी कमाई व्यर्थ चली गई। उसकी आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं और उसके हृदय में केवल निराशा शेष रह गई।

आगे देवसेना जीवन को एक रथ के रूप में देखती है, जिस पर प्रलय और विनाश निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। वह स्वयं को दुर्बल और असहाय अनुभव करती है। उसने अपनी सीमित शक्ति से भाग्य और परिस्थितियों का सामना करने का प्रयास किया, किंतु अंततः हार गई। जीवन की कठोर वास्तविकताओं के सामने उसकी सारी शक्ति और साहस निष्फल सिद्ध हुए।

गीत के अंतिम भाग में देवसेना संसार को संबोधित करते हुए कहती है कि वह अपनी करुणा, संवेदनशीलता और भावनाओं को अब और नहीं सँभाल सकती। ये भावनाएँ उसके लिए वरदान के स्थान पर बोझ बन गई हैं। इसलिए वह संसार से अपनी यह धरोहर वापस लेने का आग्रह करती है। उसे लगता है कि अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण ही उसे इतना दुःख सहना पड़ा है और उसकी आत्मिक शांति नष्ट हो गई है।

इस प्रकार यह गीत जीवन की असफलताओं, टूटे हुए स्वप्नों, प्रेम-वियोग, निराशा तथा मानवीय संवेदनाओं की करुण अभिव्यक्ति है। देवसेना के माध्यम से कवि ने मानव-जीवन की उस स्थिति को चित्रित किया है, जब व्यक्ति संघर्ष करते-करते थक जाता है और उसे अपने चारों ओर केवल पीड़ा और शून्यता दिखाई देती है। यही इस गीत का मूल भाव है।

व्याख्या

**"आह! वेदना मिली विदाई!


मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई।"**


संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक स्कंदगुप्त के गीत "आह! वेदना मिली विदाई!" से ली गई हैं। यह गीत देवसेना द्वारा गाया गया है।


व्याख्या :

देवसेना अपने जीवन की असफलताओं और पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहती है कि जीवन के अंत में उसे सुख नहीं, बल्कि वेदना ही प्राप्त हुई। उसने भ्रमवश अपने प्रेम, त्याग और भावनाओं की संचित पूँजी दूसरों पर न्योछावर कर दी। जिस प्रकार भिक्षुक अपनी भीख बाँट देता है, उसी प्रकार उसने अपना सर्वस्व लुटा दिया, किंतु बदले में उसे केवल निराशा मिली।


**"छलछल थे संध्या के श्रमकण,


आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।

मेरी यात्रा पर लेती थी—

नीरवता अनंत अँगड़ाई।"**


व्याख्या :

देवसेना अपने जीवन की संध्या अर्थात् दुःखमय अवस्था का वर्णन करती है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि संध्या की ओस-बूँदें आँसुओं की तरह झर रही हैं। उसके जीवन में चारों ओर सन्नाटा और अकेलापन छाया हुआ है। उसकी जीवन-यात्रा निराशा और उदासी से भरी हुई है।


**"श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,


गहन-विपिन की तरु-छाया में,

पथिक उनींदी श्रुति में किसने—

यह विहाग की तान उठाई।"**


व्याख्या :

कवयित्री कहती है कि जीवन के थके हुए सपनों और कल्पनाओं के बीच, घने वन की छाया में विश्राम करते पथिक की तरह उसे कहीं से मधुर पक्षी-गान सुनाई देता है। यह स्वर उसके हृदय में सोई हुई आशाओं और स्मृतियों को जागृत कर देता है।


**"लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,


रही बचाए फिरती कबकी।

मेरी आशा आह! बावली,

तूने खो दी सकल कमाई।"**


व्याख्या :

देवसेना कहती है कि उसकी आशाएँ और इच्छाएँ सदैव किसी प्रिय वस्तु को पाने और बचाए रखने का प्रयास करती रहीं। परंतु उसकी आशाएँ व्यर्थ सिद्ध हुईं। वह अपनी आशा को 'बावली' कहकर संबोधित करती है और कहती है कि उसी के कारण जीवन की सारी उपलब्धियाँ और खुशियाँ नष्ट हो गईं।


**"चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,


प्रलय चल रहा अपने पथ पर।

मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,

उससे हारी-होड़ लगाई।"**


व्याख्या :

देवसेना जीवन को एक रथ मानती है, जिस पर विनाश और विपत्तियाँ सवार हैं। उसने अपनी सीमित शक्ति के बल पर भाग्य और परिस्थितियों से संघर्ष करने का प्रयास किया, लेकिन अंततः वह हार गई। यह मनुष्य की असहायता और जीवन की कठोर सच्चाइयों का प्रतीक है।


**"लौटा लो यह अपनी थाती,


मेरी करुणा हा-हा खाती।

विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे,

इससे मन की लाज गँवाई।"**


व्याख्या :

अंत में देवसेना संसार से कहती है कि वह अपनी करुणा, संवेदनशीलता और प्रेम रूपी धरोहर को वापस ले ले। अत्यधिक भावुकता और करुणा ने उसे केवल दुःख ही दिया है। अब वह इन भावनाओं का भार सहन नहीं कर सकती। उसकी संवेदनशीलता ही उसके लिए पीड़ा का कारण बन गई है।

काव्य-सौंदर्य

रस – करुण रस (प्रधान)

भाव – निराशा, विरह, मोहभंग और आत्मवेदना

अलंकार – रूपक, मानवीकरण, अनुप्रास

भाषा – साहित्यिक एवं संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली

शैली – गीतात्मक एवं भावात्मक

केंद्रीय भाव

यह गीत देवसेना के हृदय की गहन पीड़ा, टूटे हुए सपनों, असफल प्रेम और जीवन के प्रति मोहभंग की मार्मिक अभिव्यक्ति है। इसमें मानवीय संवेदनाओं और करुणा का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण हुआ है।

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

1. 'आह! वेदना मिली विदाई!' गीत किस नाटक से लिया गया है?

उत्तर: यह गीत स्कंदगुप्त नाटक से लिया गया है।

2. इस गीत की वक्ता कौन है?

उत्तर: इस गीत की वक्ता देवसेना है।

3. देवसेना को विदाई में क्या प्राप्त हुआ?

उत्तर: उसे विदाई में वेदना और दुःख प्राप्त हुआ।

4. 'मधुकरियों की भीख लुटाई' का क्या आशय है?

उत्तर: इसका आशय है कि देवसेना ने अपना प्रेम, त्याग और जीवन की संचित भावनाएँ दूसरों पर न्योछावर कर दीं।

5. 'मेरी आशा आह! बावली' में आशा को बावली क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि उसकी अव्यावहारिक आशाओं के कारण जीवन की सारी उपलब्धियाँ नष्ट हो गईं।

6. गीत का प्रमुख रस कौन-सा है?

उत्तर: करुण रस।

7. 'प्रलय चल रहा अपने पथ पर' का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इसका अर्थ है कि जीवन में दुःख, विनाश और विपत्तियाँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं और मनुष्य उन्हें रोकने में असमर्थ है।

परीक्षा हेतु दीर्घ प्रश्न

प्रश्न: 'आह! वेदना मिली विदाई!' गीत में व्यक्त देवसेना की मनःस्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
इस गीत में देवसेना अत्यंत दुखी और निराश दिखाई देती है। उसे लगता है कि जीवनभर प्रेम, त्याग और समर्पण करने के बाद भी उसे केवल पीड़ा और वियोग मिला है। उसकी आशाएँ टूट चुकी हैं और जीवन के संघर्षों ने उसे थका दिया है। वह अपनी करुणा और संवेदनाओं को भी बोझ मानने लगी है। इस प्रकार गीत में उसकी गहरी आत्म-वेदना, निराशा और करुण भावनाएँ व्यक्त हुई हैं।

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