सूर्यकांत निराला
प्रस्थान/ आरंभ
ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिंधु-तरण;
तनय, ली कर दृक्-पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह—“पितः, पूर्ण आलोक वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
'सरोज' का ज्योतिःशरण—तरण—
परिचय :
यह कविता का आरंभिक अंश है जिससे पता चलता है कि 'सरोज-स्मृति' निराला ने अपनी उस इकलौती पुत्री की स्मृति में लिखा जो 18 वर्ष पूरा कर उन्नीसवें वर्ष में प्रवेश करते ही दिवंगत हो गई । 'निराला' ईसा कविता में अपनी पुत्री सरोज केस आठ-साथ अपने जीवन की व्यथा कथा भी कहते हैं । यह भारतीय साहित्य की अद्वितीय शोक कविता है। इसमें निराला सरोज के विवाह उत्सव का मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रण किया है। इस अवसर पर एक पिता द्वारा एक पुत्री के सौंदर्य और अनुभूति का भाव-पूर्ण चित्रण हुआ है |
'सरोज-स्मृति' निराला की प्रसिद्ध शोक-काव्य रचना है, जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु पर अपनी गहन वेदना और करुण भावनाओं को व्यक्त किया है। यह कविता केवल एक पिता के शोक का चित्रण नहीं करती, बल्कि कवि के संघर्षपूर्ण जीवन, आर्थिक अभाव, सामाजिक रूढ़ियों और मानवीय संवेदनाओं का भी मार्मिक दस्तावेज है। इसमें सरोज के जन्म, बचपन, युवावस्था, विवाह और मृत्यु तक की घटनाओं का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
कवि का परिचय
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य के छायावाद युग के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जन्म बंगाल के महिषादल में हुआ था। वे अपनी मौलिकता, विद्रोही चेतना और मानवीय संवेदनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। निराला ने कविता, उपन्यास, कहानी, निबंध तथा रेखाचित्र आदि अनेक विधाओं में उत्कृष्ट रचनाएँ कीं। उनकी प्रमुख कृतियों में परिमल, अनामिका, गीतिका, राम की शक्तिपूजा तथा सरोज-स्मृति विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हिंदी साहित्य में उन्हें महाप्राण कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।
सारांश
प्रस्तुत अंश सरोज-स्मृति से लिया गया है। इसमें कवि निराला अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु के बाद उसके जीवन को स्मरण करते हुए अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं।
कवि कहते हैं कि सरोज ने जीवन के केवल उन्नीस वर्ष पूरे किए थे और फिर मृत्यु रूपी नौका पर सवार होकर अमर लोक की ओर चली गई। कवि को ऐसा प्रतीत होता है मानो सरोज उनसे कह रही हो कि यह मृत्यु नहीं, बल्कि प्रकाशमय जीवन की ओर प्रस्थान है। कवि अपनी पुत्री के वियोग से अत्यंत दुखी हैं और स्वयं को असफल पिता मानते हैं, क्योंकि आर्थिक अभाव के कारण वे उसके लिए वह सब नहीं कर सके जो करना चाहते थे।
निराला अपने संघर्षपूर्ण साहित्यिक जीवन का भी वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि आर्थिक कठिनाइयों और संपादकों की उपेक्षा के बावजूद उन्होंने अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। सरोज का बचपन, उसकी चंचलता, माँ के निधन के बाद नानी के घर उसका पालन-पोषण तथा उसके मधुर स्वभाव की स्मृतियाँ कवि के मन में बार-बार उभरती हैं।
सरोज के यौवन का वर्णन करते हुए कवि उसकी सुंदरता, मधुर कंठ और संगीत प्रतिभा की प्रशंसा करते हैं। जब उसके विवाह की बात आती है, तब कवि समाज में प्रचलित दहेज-प्रथा और जातिगत संकीर्णताओं का विरोध करते हैं। वे एक योग्य और शिक्षित युवक से बिना दहेज तथा बिना आडंबर के उसका विवाह कराते हैं।
विवाह के बाद भी सरोज अपने परिवारजनों के स्नेह में रहती है, किंतु दुर्भाग्यवश अल्पायु में ही उसका निधन हो जाता है। अंत में कवि अत्यंत करुण स्वर में स्वीकार करते हैं कि उनका जीवन दुखों से भरा रहा है। वे अपनी पुत्री को श्रद्धांजलि देते हुए अपने समस्त कर्मों का अर्पण करते हैं और उसका तर्पण करते हैं।
काव्य का मुख्य भाव
यह कविता एक पिता के हृदय की गहरी वेदना, पुत्री के प्रति प्रेम, आर्थिक संघर्ष, सामाजिक कुरीतियों के विरोध तथा जीवन की करुण सच्चाइयों का मार्मिक चित्रण करती है। सरोज-स्मृति हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ शोक-कविताओं में गिनी जाती है।
कविता का व्याख्येय अंश
देखा विवाह आमूल नवल;
तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल।
देखती मुझे तू, हँसी मंद,
होठों में बिजली फँसी, स्पंद
उर में भर झूली छबि सुंदर,
प्रिय की अशब्द शृंगार-मुखर
तू खुली एक उच्छ्वास-संग,
विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग,
नत नयनों से आलोक उतर
काँपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति
मेरे वसंत की प्रथम गीति—
शृंगार, रहा जो निराकार
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग
भरता प्राणों में राग-रंग
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदलकर बना मही।
हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन
कोई थे नहीं, न आमंत्रण
था भेजा गया, विवाह-राग
भर रहा न घर निशि-दिवस-जाग;
प्रिय मौन एक संगीत भरा
नव जीवन के स्वर पर उतरा।
माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में—'वह शकुंतला,
पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।'
कुछ दिन रह गृह, तू फिर समोद,
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यों अपार;
वे ही सुख-दु:ख में रहे न्यस्त,
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;
वह लता वहीं की, जहाँ कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली;
अंत भी उसी गोद में शरण
ली, मूँदे दृग वर महामरण!
मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दु:ख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!
प्रसंग
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की प्रसिद्ध शोक-काव्य रचना सरोज-स्मृति से ली गई हैं। इनमें कवि ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह, उसके सुखद जीवन-क्षणों तथा उसकी असामयिक मृत्यु से उत्पन्न गहन शोक का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।
भावार्थ
कवि स्मरण करते हैं कि सरोज का विवाह अत्यंत सादगीपूर्ण और नवीन ढंग से सम्पन्न हुआ था। विवाह के समय कलश का पवित्र जल उसके ऊपर डाला गया। उस समय सरोज अपने पिता की ओर देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। उसके होंठों पर लज्जा और हर्ष की झलक थी तथा उसका समूचा व्यक्तित्व सौंदर्य और शृंगार से भर उठा था।
सरोज के झुके हुए नेत्रों से प्रेम और विश्वास का प्रकाश झलक रहा था। उसे देखकर कवि को ऐसा अनुभव हुआ कि उनकी कविताओं में जो शृंगार-भाव अब तक केवल कल्पना के रूप में था, वह आज साकार रूप में उनके सामने उपस्थित हो गया है। उनकी दिवंगत पत्नी के साथ जो प्रेम और सौंदर्य का अनुभव था, वही मानो सरोज के वैवाहिक जीवन में मूर्त रूप धारण कर रहा था।
विवाह के बाद घर में कोई विशेष आडंबर या बड़ी बारात नहीं थी, फिर भी वातावरण प्रेम और मधुर संगीत से भरा हुआ था। कवि ने स्वयं अपनी पुत्री को पारिवारिक संस्कार दिए और उसके लिए पुष्पों की सेज सजाई। उन्हें लगा मानो कालिदास की शकुंतला की कथा पुनः जीवित हो उठी हो, यद्यपि यह एक नई परिस्थिति और नई कला का रूप था।
कुछ समय बाद सरोज पुनः अपनी नानी के घर चली गई, जहाँ उसे मामा-मामी का भरपूर स्नेह मिला। वहीं उसका पालन-पोषण हुआ और वहीं वह प्रेमपूर्वक विकसित हुई। अंततः उसी घर में उसने अपनी अंतिम शरण ली और मृत्यु को प्राप्त हुई।
कवि अत्यंत करुण स्वर में कहते हैं कि सरोज उनके जीवन का सहारा थी। उसके चले जाने के बाद जीवन केवल दुःख की कहानी बनकर रह गया। अंत में वे अपनी पुत्री को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने समस्त कर्मों का समर्पण उसके चरणों में करते हैं और उसका तर्पण करते हैं।
सारांश
इस अंश में कवि ने सरोज के विवाह का सौंदर्यपूर्ण चित्रण किया है। विवाह के समय उसकी लज्जा, मुस्कान और भावनात्मक अवस्था का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। विवाह के बाद उसे परिवार का स्नेह प्राप्त होता है, किंतु अल्पायु में ही उसकी मृत्यु हो जाती है। कवि अपनी पुत्री के वियोग से अत्यंत दुखी हैं और अंत में उसे श्रद्धापूर्वक तर्पण अर्पित करते हैं। यह अंश पिता-पुत्री के गहरे स्नेह, करुणा और मानवीय संवेदना का अत्यंत मार्मिक उदाहरण है।
काव्य-सौंदर्य
- रस – करुण रस (प्रधान), शृंगार रस (गौण)
- भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली
- शैली – आत्मकथात्मक एवं भावात्मक
- अलंकार – उपमा, रूपक, अनुप्रास
- भाव – वात्सल्य, करुणा, स्मृति और श्रद्धांजलि
विशेष :
इन पंक्तियों में निराला ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह की मधुर स्मृतियों और उसके वियोग की असहनीय पीड़ा को अत्यंत संवेदनशील ढंग से व्यक्त किया है। यही कारण है कि सरोज-स्मृति हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ शोक-कविताओं में गिनी जाती है।
सरोज-स्मृति (प्रस्तुत अंश) : महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. प्रस्तुत अंश के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: प्रस्तुत अंश के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हैं।
प्रश्न 2. यह अंश किस कविता से लिया गया है?
उत्तर: यह अंश सरोज-स्मृति कविता से लिया गया है।
प्रश्न 3. सरोज कौन थी?
उत्तर: सरोज कवि निराला की पुत्री थी।
प्रश्न 4. सरोज के विवाह का स्वरूप कैसा था?
उत्तर: सरोज का विवाह सादगीपूर्ण, नवीन और बिना आडंबर का था।
प्रश्न 5. सरोज का पालन-पोषण मुख्यतः कहाँ हुआ?
उत्तर: सरोज का पालन-पोषण अपनी नानी के घर हुआ।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 6. विवाह के समय सरोज की मनःस्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर: विवाह के समय सरोज लज्जा और प्रसन्नता से भरी हुई थी। वह अपने पिता की ओर देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। उसके झुके हुए नेत्रों और काँपते अधरों में नवजीवन के प्रति विश्वास और उत्साह झलक रहा था।
प्रश्न 7. कवि ने सरोज को 'शकुंतला' क्यों कहा है?
उत्तर: कवि ने सरोज की सुंदरता, कोमलता और आदर्श भारतीय नारी के गुणों के कारण उसकी तुलना शकुंतला से की है। उसे देखकर कवि को कालिदास की शकुंतला की याद आती है।
प्रश्न 8. विवाह के बाद सरोज को किसका स्नेह प्राप्त हुआ?
उत्तर: विवाह के बाद सरोज को अपनी नानी, मामा और मामी का भरपूर स्नेह और संरक्षण प्राप्त हुआ।
प्रश्न 9. 'प्रिय मौन एक संगीत भरा, नव जीवन के स्वर पर उतरा' का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि विवाह के बाद घर का वातावरण प्रेम, शांति और मधुर भावनाओं से भर गया था। बिना किसी शोर-शराबे के भी जीवन में एक नया आनंद और संगीत उतर आया था।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 10. प्रस्तुत अंश में कवि ने सरोज के विवाह का चित्रण किस प्रकार किया है?
उत्तर:
कवि ने सरोज के विवाह का अत्यंत भावपूर्ण और सौंदर्यपूर्ण चित्रण किया है। विवाह सादगीपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ। विवाह के समय सरोज की लज्जा, मंद मुस्कान और झुकी हुई आँखों में नवजीवन के सपने झलक रहे थे। कवि को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनकी कविताओं का शृंगार-रस साकार रूप में उनके सामने उपस्थित हो गया है। विवाह के बाद घर का वातावरण प्रेम और मधुरता से भर गया। कवि ने स्वयं अपनी पुत्री को संस्कार दिए और उसके सुखी जीवन की कामना की।
प्रश्न 11. प्रस्तुत अंश में कवि की करुणा किस प्रकार व्यक्त हुई है?
उत्तर:
प्रस्तुत अंश में कवि अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु को स्मरण करते हुए अत्यंत दुखी दिखाई देते हैं। वे बताते हैं कि सरोज उनके जीवन का सहारा थी। नानी के घर में पली-बढ़ी सरोज ने वहीं अंतिम साँस ली। उसकी मृत्यु के बाद कवि का जीवन शोक और पीड़ा से भर गया। अंत में वे अपनी पुत्री को श्रद्धापूर्वक तर्पण अर्पित करते हैं। इन भावों के माध्यम से कवि की गहन करुणा व्यक्त हुई है।
परीक्षोपयोगी वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
1. 'सरोज-स्मृति' किस विधा की रचना है?
(क) वीर काव्य
(ख) शोक काव्य
(ग) खंडकाव्य
(घ) गीतिकाव्य
उत्तर: (ख) शोक काव्य
2. सरोज का पालन-पोषण मुख्यतः किसके घर हुआ?
(क) पिता के घर
(ख) दादा के घर
(ग) नानी के घर
(घ) चाचा के घर
उत्तर: (ग) नानी के घर
3. सरोज के विवाह में कवि ने किसका विरोध किया?
(क) शिक्षा का
(ख) दहेज-प्रथा का
(ग) संगीत का
(घ) साहित्य का
उत्तर: (ख) दहेज-प्रथा का
4. प्रस्तुत अंश का प्रमुख रस कौन-सा है?
(क) वीर रस
(ख) हास्य रस
(ग) शृंगार रस
(घ) करुण रस
उत्तर: (घ) करुण रस
महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न
"दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
— इस पंक्ति के आधार पर कवि की मनःस्थिति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पंक्ति में कवि निराला अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु के बाद उत्पन्न गहन शोक और निराशा को व्यक्त करते हैं। उन्हें लगता है कि उनका पूरा जीवन संघर्षों और दुःखों से भरा रहा है। सरोज के वियोग ने उनके जीवन की पीड़ा को और अधिक बढ़ा दिया है। इसलिए वे कहते हैं कि उनके जीवन की कहानी केवल दुःख की कहानी है।

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