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शनिवार, 28 जून 2025

साहित्य समाज का प्रतिबिंब




धर्म और समाज की दृष्टि से साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है।
एक ओर साहित्य समाज का अभिरुचि-विकास करता है और दूसरी ओर सामाजिक नैतिक मूल्यों की रक्षा करता है।
किसी भी देश की सभ्यता, संस्कृति का मूल्यांकन वहाँ के साहित्य से किया जाता है। जिस देश का साहित्य समृद्ध नहीं होता, वह देश अशक्त रहता है।

हर युग में साहित्य ने उस युग की प्रवृत्तियों को प्रकट किया है। साहित्यकार अपने युग का प्रवक्ता होता है।
उसका चिंतन एवं संवेदना समाज की परिस्थितियों पर आधारित होती है।
प्रसाद, दिनकर, बच्चन आदि की रचनाओं में विचार, भाव और शिल्प का परिमार्जन उनके युग की चेतना के अनुसार हुआ।

भारतीय कला में मानव-जीवन के भौतिक पक्ष में भी अध्यात्म अंतर्निहित है।
आज का वैज्ञानिक युग मानव को तकनीक से जोड़ तो रहा है, पर मानवता से दूर भी कर रहा है।
ईर्ष्या-द्वेष, स्वार्थ, हिंसा और वैमनस्य का वातावरण फैल रहा है।
ऐसे में साहित्य ही है जो मनुष्य को फिर से मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है।

रामराज्य की अवधारणा, संवेदना-प्रधान आदर्शों की पुनः स्थापना साहित्य कर सकता है।
आज साहित्य को उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका दी गई है— मानवीय मूल्यों की पुनः स्थापना करना।


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साहित्य

  काव्य या साहित्य का माध्यम शब्द है। शब्द में अर्थ छिपा रहता है, इसी से भावनाओं का संचार होता है।

साहित्य मनुष्य के अनुभूत सत्य को सहृदय तक पहुँचाता है।


भारत तथा मानव समाज की सभ्यता या संस्कृति, मानवीय भावनाओं को परिष्कृत करने तथा उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम वेद, संहिता, काव्य, नाटक आदि के विकास में रही है।


संस्कृत साहित्य ने मानव-जीवन को महत्व दिया, जातीयता से दिव्यता तक ले गया।


गीतों की मर्मस्पर्श प्रस्तुति ने जन-जन की संवेदना को उद्वेलित किया।


यह स्पष्ट है कि बहुत कुछ साहित्य के द्वारा ही हुआ है।

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गुंडा

जयशंकर प्रसाद