सोमवार, 25 अगस्त 2025

कैदी और कोकिला

 

कविता का सार -

प्रस्तुत कविता अंग्रेज़ी सरकार द्वारा भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के साथ जेल में किए गए दुर्व्यवहारों (बुरे व्यवहार) और यंत्रणाओं (अत्याचारों) का दुखद चित्र प्रस्तुत करती है। अंग्रेज़ी सरकार जेल में कैद स्वतंत्रता सेनानियों का मनोबल तोड़ने के लिए, उनके इरादों को कमज़ोर करने के लिए उन पर तरह-तरह के अत्याचार करती है। कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी ने, जिन्होंने स्वयं स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना योगदान दिया और उसके लिए जेल भी गए, इस कविता में अपने मन के दुख, असंतोष और ब्रिटिश शासन के प्रति अपने आक्रोश (गुस्से) को कोयल के साथ अपने संवाद के रूप में व्यक्त किया है। कवि आधी रात को जेल की ऊँची - ऊँची दीवारों से बनी छोटी - सी कोठरी में कैद है। वह अकेला और उदास है। ऐसे में कोयल की आवाज़ सुनकर कवि अपनी मनोदशा के अनुरूप उसकी इस पुकार के अपने अनुमान द्वारा अनेक अर्थ निकलता है। कभी उसे कोयल की आवाज़ में दर्द सुनाई देता है तो कभी विद्रोह के स्वर। कवि को लगता है कि कोयल भी पूरे देश को एक कारागार (जेल) के रूप में देखने लगी है, देश की गुलामी को महसूस कर रही है इसलिए वह आधी रात में चीख उठी है।


kaidi aur kokilaa

कविता का संदेश /उद्देश्य -

प्रस्तुत कविता कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा उस समय लिखी गई थी जब भारत ब्रिटिश शासन का गुलाम था। देश की आज़ादी के लिए लड़ने वालों को अंग्रेजी सरकार जेल में कैद कर देती थी और उन्हें तरह-तरह की यातनाएँ दी जाती थी जिससे उन स्वतंत्रता सेनानियों के इरादे कमजोर पड़ जाएँ और वह आज़ादी का सपना देखना और उसे पाने के प्रयास बंद कर दें। यह कविता विद्यार्थियों को उसे समय की स्थिति से अवगत कराती है। कवि ने कोयल को संबोधित करते हुए (कोयल से बात करते हुए) एक कैदी के रूप में स्वयं पर होने वाले अत्याचारों और दुर्व्यवहारों के बारे में कविता में बताया है जिसे पढ़कर पता चलता है कि हमें कैदी की तरह और न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों, उनके बलिदानों के बाद यह आज़ादी मिली है इसीलिए अपने देश का सम्मान करना और इसकी आज़ादी की रक्षा करना हमारा परम कर्त्तव्य है। 



कैदी और कोकिला 

 

 

क्या गाती हो?

क्यों रह-रह जाती हो?

कोकिल बोलो तो!

क्या लाती हो?

संदेशा किसका है

कोकिल बोलो तो !




व्याख्या -

कवि माखनलाल चतुर्वेदी कोयल को संबोधित करते हुए प्रश्न पूछते हैं कि तुम क्या गा रही हो क्यों रह - रह जाती हो अर्थात् तुम गाते - गाते बीच में चुप क्यों हो जाती हो? कवि को ऐसा लगता है कि कोयल शायद डर-डर कर गा रही है। डर के कारण वह गाते - गाते चुप हो जाती है और फिर हिम्मत जुटाकर फिर से गाने लगती है। कवि को ऐसा लगता है कि कोयल शायद किसी का संदेश लेकर उसके पास आई है इसलिए वह बड़ी सजग (alert) होकर, बड़ी सावधानी से अपनी बात कहना चाहती है। अपने इस अनुमान की पुष्टि के लिए कवि कोयल से प्रश्न पूछ रहा है। 





ऊँची काली दीवारों के घेरे में

डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,

जीने को देते नहीं पेट-भर खाना

मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना!

जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है

शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?

हिमकर निराश कर चला रात भी काली,

इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली ?




 व्याख्या - कवि कोयल को अपने बारे में बताते हुए कहता है कि मैं यहां जेल में ऊँची दीवारों से बनी कोठरी में कैद हूँ जहाँ रोशनी भी नहीं आती इसीलिए यहाँ हर समय अँधेरा ही रहता है और दीवारों का रंग भी कल लगता है। हम स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेज़ी सरकार ने डाकू, चोरो और यात्रियों को लूटने वालों के साथ कैद करके रखा हुआ है। ये हमें न तो पेट - भरकर खाना देते हैं जिससे हम जीवित रह सके और न ही ये हमें मरने देते हैं इसलिए हम तड़प तड़प कर जी रहे हैं। हमारे जीवन पर दिन-रात ब्रिटिश शासन का कड़ा पहरा है अर्थात् हमारी हर गतिविधि पर नज़र रखी जाती है। कवि सरकार के इस दुर्व्यवहार के प्रति अपना क्रोध व्यक्त करते हुए कहता है कि यह कैसा शासन है जिसमें लोगों के जीवन को अपने वश में कर रखा है। हम पर अत्याचार करके ये हमें स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की कठोर सजा देना चाहते हैं हम पर किए जाने वाले इनके ये अत्याचार किसी अन्याय से कम नहीं। ऐसा लगता है कि हर तरफ़ तम का गहरा प्रभाव है अर्थात् हर तरफ़ बुराई फैली हुई है। कवि ने यहाँ ब्रिटिश शासन द्वारा किए जाने वाले शोषण, अत्याचार और उनके आचरण का संकेत दिया है। कवि कोयल से कहता है कि इस समय चंद्रमा भी जा चुका है ऐसा लगता है कि वह भी ब्रिटिश शासन के अत्याचारों से निराश होकर चला गया है और उसके जाने से रात और भी काली प्रतीत हो रही है। इस समय में हे सखी! काले रंग से युक्त तुम क्यों जगी हुई हो




क्यों हूक पड़ी?

वेदना बोझ वाली सी

कोकिल बोलो तो !

क्या लूटा ?

मृदुल वैभव की

रखवाली - सी,

कोकिल बोलो तो!




व्याख्या - कवि कोयल की आवाज़ में दुख का अनुभव करते हुए उससे पूछता है कि तुम्हें क्या दुख है? तुम्हारी आवाज़ से ऐसा लगता है कि तुम पीड़ा से भरी हुई हो। कोयल की दुख भरी आवाज़ सुनकर कवि चिंता व्यक्त करते हुए कहता है कि कोयल बताओ इस दुख का क्या कारण है ? फिर वह अनुमान लगाते हुए पूछता है कि क्या तुम्हारा कुछ लुट गया है? तुम तो मीठी आवाज़ की रखवाली करती हो, फिर दुख से भरी आवाज़ में क्यों गा रही हो




क्या हुई बावली

अर्द्धरात्रि को चीखी

कोकिल बोलो तो! 

किस दावानल की 

ज्वालाएँ हैं दीखीं

कोकिल बोलो तो!




व्याख्या - कोयल से कोई उत्तर या संकेत न मिलने पर कवि अन्य अनुमान लगाता है कि क्या तुम पागल हो गई हो जो आधी रात के समय चीख रही हो ? सामान्य रूप से कोई भी पक्षी आधी रात के समय नहीं बोलता लेकिन कोयल का इस तरह चीख कर बोलना असामान्य है इसीलिए कवि उसे पागल कह रहा है कि कोयल बताओ तुम्हारे दुख भरे स्वर का क्या कारण है ? क्या तुमने किसी जंगल को जलते हुए देख लिया है और कहीं उस जंगल की आग की लपटों से तुम डर कर अपनी मधुर आवाज़ को छोड़कर दुख भरे स्वर में आधी रात के समय चीख रही हो? कोयल बोलो तो ? कवि को यह अंदेशा (शंका) हो रहा है कि कहीं कोयल ने भारतीयों के मन में ब्रिटिश सरकार के प्रति आक्रोश (गुस्से) और असंतोष की ज्वाला तो नहीं देख ली और कहीं वह इस क्रांति रूपी ज्वाला की सूचना देने तो जेल में नहीं आई है। 



क्या? - देख न सकती ज़ंजीरों का गहना

हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना

कोल्हू का चर्रक चूँ?-जीवन की तान

गिट्टी पर अँगुलियों ने लिखे गान ! 

हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जुआ

खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कुँआ । 

दिन में करुणा क्यों जगे, रुलानेवाली

इसलिए रात में गज़ब ढा रही आली ?




व्याख्या - अब कवि अंदाज़ा लगता है कि उसके हाथों पैरों पर जो बेड़ियाँ (हथकड़ियाँ) बँधी हुई हैं, उन्हें देखकर कोयल का मन दुख से भर गया है और शायद इसलिए वह चीख रही है। कवि कोयल को समझाते हुए कहता है कि क्या तुम मेरी इन व हथकड़ियों को देखकर दुखी हो रही हो ? अरे! यह तो ब्रिटिश शासन द्वारा हम स्वतंत्रता सेनानियों को पहनाया जाने वाला गहना है। इन पंक्तियों में कवि का अपने देश के लिए प्रेम दिखाई देता है। देश की आज़ादी के लिए उसका दीवानापन स्पष्ट झलकता है। ब्रिटिश सरकार की कैद में पहनाई जाने वाली हथकड़ियों को वह अपना सम्मान समझता है। वह कोयल को अपनी दिनचर्या (दिन-भर के कामों) के बारे में बताते हुए कहता है कि जेल में हमसे कोल्हू चलवाया जाता है। उसे चलाते समय उसमें से चर्रक - चूँ की जो आवाज़ निकलती है, वह अब हमारे जीवन का संगीत बन गया है। हमसे जो पत्थर तुड़वाए जाते हैं उन पत्थरों को तोड़ने वाली गिट्टी पर हमारी उँगलियों के निशान इस तरह पड़ गए हैं जैसे कि किसी ने उन पर गानों को उकेर (लिख) दिया हो। बैल के कंधे पर जुआ अर्थात् जो लकड़ी बाँधी जाती है उसे कवि अपने पेट पर बाँधकर कुएँ से पानी निकालने के लिए मोट (चमड़े की थैली, जिससे कुएँ से पानी निकाला जाता है) खींचता है और कुएँ से पानी निकालता है। कवि कोयल से कहता है कि हम सब कुछ सहज भाव से करते हैं। उनके द्वारा दिए गए सारे काम चुपचाप करके हम ब्रिटिश अकड़ का कुआँ खाली करते हैं। इसका अर्थ यह है कि हम उनके अत्याचारों को सहन करते हैं, हम किसी भी प्रकार का दुख या तकलीफ़ अपने चेहरे पर नहीं आने देते जिससे ब्रिटिश सरकार के अहम् (अकड़) को चोट पहुँचती है। हम अंग्रेज़ी सरकार को यह दिखाना चाहते हैं कि वे चाहे जितने भी अत्याचार कर लें लेकिन हमारे मन से अपने देश के लिए प्रेम को वे किसी भी प्रकार कम नहीं कर सकते। 

कवि को ऐसा लगता है कि उसे जेल में जो शारीरिक और मानसिक दुख मिल रहा है, कोयल उससे दुखी है। कवि कोयल से कहता है कि शायद दिन में तुम इसलिए नहीं कूकती कि हम तुम्हारी वेदना भरी आवाज़ सुनकर दुखी हो जाएँगे और कमज़ोर पड़ जाएँगे। इसलिए तुम रात में हमारे लिए अपना दुख प्रदर्शित कर रही हो। हे सखी! तुमसे हमारा दुख नहीं देखा जाता इसलिए दिन में तुम किसी तरह अपने दुख पर काबू पा लेती हो परंतु रात के समय तुम अपने आप को रोक नहीं पा रही हो। 

उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने अंग्रेज़ी शासन की जेल में कैद स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाने वाली यंत्रणाओं का वर्णन किया है उन्हें ऊँची - ऊँची दीवारों से बनी अंधेरी कोठरी में रखा जाता है, उन्हें भरपेट खाने को नहीं मिलता, उनके साथ पशुओं - सा व्यवहार किया जाता है, यदि वे दुख से कराहते हैं तो उन्हें गालियाँ दी जाती हैं और उन पर हर समय ब्रिटिश सरकार अपनी नज़र रखे हुए है। 




इस शांत समय में

अंधकार को बेध, रो रही क्यों हो

कोकिल बोलो तो! 

चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज 

इस भाँति बो रही क्यों हो

कोकिल बोलो तो!



व्याख्या - कवि कोयल से प्रश्न करता है कि रात के समय में जब घना अँधेरा छाया हुआ है और चारों ओर शांति है, तब कोयल अपने दुखद स्वर में क्यों गा रही है ? कवि अनुमान लगाता है कि कोयल चुपचाप से उसके मन में विद्रोह के बीज बोने आई है अर्थात् ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ उसके मन में विद्रोह जगाने आई है। कवि की हिम्मत बढ़ाने आई है। कवि सोच रहा है कि कोयल को लगता है कि कहीं ब्रिटिश शासन द्वारा दी जाने वाली यातनाओं से दुखी होकर हम जेल में कैद स्वतंत्रता सेनानी, उनके आगे घुटने न टेक दें इसलिए वह रात के समय, चुपके - से उसे ढांढस बँधाने आई है, हिम्मत देने आई है। 





काली तू, रजनी भी काली

शासन की करनी भी काली

काली लहर कल्पना काली

मेरी काल कोठरी काली

टोपी काली, कमली काली

मेरी लौह-श्रृंखला काली

पहरे की हुंकृति की ब्याली

तिस पर है गाली, ऐ आली!





व्याख्या - कवि कोयल से कहता है कि तेरा रंग काला है, रात भी काली है। ब्रिटिश शासन की करतूतें भी काली हैं।  इस समय हमारे आसपास जो माहौल बना हुआ है, वह भी काला है अर्थात् निराशाजनक है, सब कुछ नष्ट करने वाला बना हुआ है, जिसके कारण मेरी कल्पना, मेरे सपने भी इस कालेपन से प्रभावित हो रहे हैं अर्थात् हर समय कुछ भी गलत होने का डर बना रहता है। मैं जिस कोठरी में बंद हूँ वह भी रोशनी के अभाव में काली है, मेरी टोपी भी काली है और मेरा कंबल भी काला है। मेरी लोहे की बेड़ियाँ भी काली हैं जिनसे मुझे बाँधा गया है। हे सखी! इस अँधेरे में काली सर्पिणी की फुफकार जैसी पहरेदारों की हुंकार मुझे गाली की तरह लगती है। उनकी यह हुँकार, उनकी डाँट मुझे याद दिलाती है कि मैं अपने ही देश में गुलाम हूँ, कैद में हूँ और मुझे अंग्रेज़ी सरकार के सिपाहियों द्वारा अपमानित किया जा रहा है। 

काला रंग सामान्य रूप से निराशा का प्रतीक है। कवि ने इन पंक्तियों में बार-बार 'काली' शब्द की आवृत्ति करके अपने आसपास फैले अन्याय, डर और निराशा की ओर संकेत किया है। कोयल के काले रंग को देखकर कवि को इन सभी  नकारात्मक बातों की याद आ गई है। 




इस काले संकट-सागर पर 

मरने की, मदमाती ! 

कोकिल बोलो तो ! 

अपने चमकीले गीतों को 

क्योंकर हो तैराती ! 

कोकिल बोलो तो !




व्याख्या - कवि कोयल से पूछता है, हे मस्ती  से भरी कोयल! तुम इस काले संकट रूपी सागर में मरने के लिए क्यों आई होकोयल बोल तो? तुम क्यों इस संकट से भरे वातावरण में अपने चमकीले गीतों को गा रही हो अर्थात् क्यों तुम स्वयं ही संकट को निमंत्रण दे रही हो ? यहाँ तुम्हारी जान को खतरा है क्योंकि यहाँ पर हर जगह अंग्रेज़ी सिपाहियों का पहरा है। 




तुझे मिली हरियाली डाली

मुझे नसीब कोठरी काली ! 

तेरा नभ- भर में संचार 

मेरा दस फुट का संसार ! 

तेरे गीत कहावें वाह

रोना भी है मुझे गुनाह ! 

देख विषमता तेरी-मेरी

बजा रही तिस पर रणभेरी !




व्याख्या - अपनी पराधीनता से दुखी होकर कवि को कोयल से ईर्ष्या हो रही है। कवि कोयल और कैदी के रूप में अपनी स्थिति का अंतर बताते हुए कोयल से कहता है कि तुम्हें तो हरी-भरी डाली पर रहने का सौभाग्य मिला है और मुझे रहने के लिए यह काली कोठरी मिली है। तुम स्वतंत्र हो और मैं पराधीन (कैद) हूँ। तुम तो सारे आकाश में घूम सकती हो लेकिन मेरा जीवन तो इस 10 फुट की कोठरी में सीमित होकर रह गया है। तुम जब गीत गाती हो तो लोग वाह! वाह! करके तुम्हारी प्रशंसा करते हैं परंतु मुझे तो अपना दुख व्यक्त करना भी माना है, उसे अंग्रेज़ी सिपाही अपराध मान लेंगे। अपनी और मेरी स्थिति में इस अंतर को देखो। हम दोनों की स्थितियों में बहुत अधिक असमानताएँ हैं। यह जानते हुए कि अभी मैं बेड़ियों में बँधा हुआ हूँ और कैद हूँ, इसके बावजूद भी तुम मुझे ब्रिटिश शासन से युद्ध के लिए उकसा रही हो। 





इस हुंकृति पर,

अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?

कोकिल बोलो तो !

मोहन के व्रत पर,

प्राणों का आसव किसमें भर दूँ ! 

कोकिल बोलो तो।




व्याख्या - अंत में कवि कोयल के जोश से भरे स्वर से प्रेरित होकर कहता है कि तुम्हारे इस जोश भरे स्वर, इस हुँकार पर मैं अपनी रचना से क्या सहयोग दे सकता हूँ? कोयल बताओ? क्या मैं गाँधी जी की देश को आज़ाद कराने की प्रतिज्ञा को पूरा करने में अपनी कविताओं, अपनी रचनाओं से देशवासियों के मन में देश के लिए प्रेम भर दूँ? जिससे सभी भारतवासी जागरूक हों और देश को आज़ादी दिलाने के लिए आगे आएँ। 

इन पंक्तियों में कवि ने अपनी रचनाओं की शक्ति के बारे में बताते हुए कोयल से पूछता है कि मैं अपनी रचनाओं से ऐसा क्या लिखूँ, जिससे सभी भारतवासी अपने सम्मान के लिए देश की आज़ादी की लड़ाई में भाग लें? कोयल तुम बताओ, मैं उन्हें किस प्रकार प्रोत्साहित करूँ

 

सोमवार, 21 जुलाई 2025

बालम आवो हमारे गेह रे

 


बालम, आवो हमारे गेह रे। तुम बिन दुखिया देह रे।

सब कोई कहे तुम्हारी नारी, मोकों लागत लाज रे।

दिल से नहीं दिल लगाया, तब लग कैसा सनेह रे।

अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे।

कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे।

है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिव सों कहै सुनाय रे।

अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे॥

अरे इन दोहुन राह न पाई...


अरे इन दोहुन...

अरे इन दोहुन राह न पाई।
हिंदू अपनी करै बड़ाई गागर छुवन न देई। बेस्या के पायन-तर सोवै यह देखो हिंदुआई।
मुसलमान के पीर-औलिया मुर्गी मुर्गा खाई। खाला केरी बेटी ब्याहै घरहिं में करै सगाई।
बाहर से इक मुर्दा लाए धोय-धाय चढ़वाई। सब सखियाँ मिलि जेंवन बैठीं घर-भर करै बड़ाई।
हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई। कहैं कबीर सुनो भाई साधो कौन राह ह्वै जाई॥

रविवार, 29 जून 2025

कथा-साहित्य

 


कथा साहित्य की दो प्रमुख विधाएं हैं – उपन्यास और कहानी। उपन्यास में साहित्य के तीनों तत्त्वों – भाव, कल्पना और बोध का सम्यक्‌ नियोजन होता है। हिन्दी में उपन्यास-सेवन बहुत कुछ अंग्रेज़ी के प्रभावस्वरूप आरंभ हुआ। किन्तु धीरे-धीरे हिन्दी उपन्यास का अपना स्वतन्त्र रूप विकसित हुआ।


(क) उपन्यास : परिभाषा और परिचय

उपन्यास शब्द 'उप' + 'न्यास' से बना है। 'उप' का अर्थ समीप तथा 'न्यास' का अर्थ धारण है। अर्थात् उपन्यास शब्द का अर्थ हुआ – मानवनियत के पास रखी हुई कथा। यह वस्तु स्पष्टतः दीर्घ, कथात्मक, ऐसी कथा है जो विस्तृत होती है, जिसमें हमारे जीवन की प्रतिकृति हो, जिसमें संसार की कथा हमारी भाषा में कही गई हो। उपन्यास का सारांश यह है : बहुत आस्वाद्य तथा उपयोगी यह बृहत् गद्यवृत्तात्मक आख्यान, जिसमें किसी विशिष्ट सामाजिक प्रसंग में पात्रों और घटनाओं को मनोवैज्ञानिक चिन्तन द्वारा निर्मित किया गया हो। पाठ्यक्रम इस विद्या के संबंध में कथाओं को अपने विचार निरूपित रूप में प्रस्तुत किए हैं :


1. उपन्यास प्रमुखतः यथार्थवादी जीवन की काल्पनिक कथा है।

2. मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मात्र समझता हूँ। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है। .......चरित्र संरचना की समानता और भिन्नता-धर्मानुसार से भिन्नता और विभिन्न से अभिन्नता दिखाना उपन्यास का मुख्य कर्तव्य है। – मुंशी प्रेमचंद


3. उपन्यास कथाओं-घटनाओं में बंधा हुआ एक विस्तृत जीवन है, जिनमें अत्यन्त गंभीर विचार चित्रित किए जाते हैं। यह जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। साहित्यिक व शास्त्रीय रचनाओं द्वारा मानव-चरित्र व जीवन का अध्ययन किया जाता है।


4. उपन्यास का रचनात्मक पहलू बहुत व्यापक होता है – चरित्र-निर्माण, वातावरण-चित्रण और घटनाक्रम-क्रम भी आवश्यक हैं।


5. उपन्यास में लेखक अनुभवों को अपनी कल्पना से प्रस्तुत करता है।


6. संवाद की सजीवता उपन्यास में आवश्यक होती है। संवाद का सार्थक होना चाहिए।


7. उपन्यास में चरित्र, वातावरण और घटनाएं सजीव होनी चाहिए।


8. उपन्यास का संबंध जन-जीवन से होना चाहिए।


9. भाषा, शैली, स्वाभाविकता, बोधगम्यता और रोचकता का ध्यान रखना आवश्यक होता है।


10. उपन्यास का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक यथार्थ को चित्रित करना है।


11. उपन्यास के प्रकार – ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक, चरित्र-प्रधान, घटना-प्रधान, वातावरण-प्रधान।


(ख) कहानी : परिभाषा और परिचय

कथा-साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा कहानी है। कहानी में कौतूहल तत्त्व की प्रधानता होती है। मनुष्य में कौतूहल की वृत्ति जन्मजात होती है, इसलिए वह कुछ जानने की दिशा में सक्रिय रहता है।


1. कहानी छोटी होती है और उसका उद्देश्य विशेष घटनाओं को केन्द्र बनाकर गूढ़ भावनाओं को प्रकट करना होता है।


2. कहानी में पात्र सीमित होते हैं और उसका स्वरूप एक घटना पर केन्द्रित रहता है।


3. कहानी की विशेषताएं – संक्षिप्तता, कौतूहल, प्रभाव, गम्भीरता, सजीवता, चरित्र-चित्रण, वातावरण-चित्रण, उद्देश्यमूलकता।


4. कहानी का मूल तत्व – एकल प्रभाव, एकता, स्पष्ट उद्देश्य।


5. कहानियों के भेद : चरित्र-प्रधान, घटना-प्रधान, वातावरण-प्रधान।


6. कहानीकारों का दृष्टिकोण – प्रेमचंद, राय कृष्णदास, जैनेन्द्र, यशपाल आदि ने विविध मत दिए हैं।


7. कहानी में मनोवैज्ञानिक सत्य और चरित्रगत विविधता को चित्रित करने की शक्ति होती है।


8. कहानी को प्रभावशाली बनाने के लिए संवाद, भाषा और शैली का ध्यान रखना आवश्यक होता है।

शनिवार, 28 जून 2025

साहित्य का स्वरूप

मानव में सौंदर्य-भावना या विकास करने और उसे कल्याण की ओर अग्रसर करने वाली कला को साहित्य कहते हैं। ‘साहित्य’ शब्द 'सहित' में प्रयुक्त ‘सहित’ का अर्थ है – 'हित के साथ'।

साहित्य के तीन भेद विद्वानों ने किए हैं –

(1) श्रव्य साहित्य

(2) दृश्य साहित्य

(3) चित्र साहित्य

इन इन्द्रियों और भाषिक रूपों के तीनों रूपों को विवेचन करने के समाधान हेतु स्वीकार किया गया है।

साहित्य में शब्द और अर्थ, भाव और शैली भाव-साधन रहते हैं। उन सबमें हित-अर्थ अथवा कल्याण का भाव निहित रहता है।

साहित्य समाज का प्रतिबिंब




धर्म और समाज की दृष्टि से साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है।
एक ओर साहित्य समाज का अभिरुचि-विकास करता है और दूसरी ओर सामाजिक नैतिक मूल्यों की रक्षा करता है।
किसी भी देश की सभ्यता, संस्कृति का मूल्यांकन वहाँ के साहित्य से किया जाता है। जिस देश का साहित्य समृद्ध नहीं होता, वह देश अशक्त रहता है।

हर युग में साहित्य ने उस युग की प्रवृत्तियों को प्रकट किया है। साहित्यकार अपने युग का प्रवक्ता होता है।
उसका चिंतन एवं संवेदना समाज की परिस्थितियों पर आधारित होती है।
प्रसाद, दिनकर, बच्चन आदि की रचनाओं में विचार, भाव और शिल्प का परिमार्जन उनके युग की चेतना के अनुसार हुआ।

भारतीय कला में मानव-जीवन के भौतिक पक्ष में भी अध्यात्म अंतर्निहित है।
आज का वैज्ञानिक युग मानव को तकनीक से जोड़ तो रहा है, पर मानवता से दूर भी कर रहा है।
ईर्ष्या-द्वेष, स्वार्थ, हिंसा और वैमनस्य का वातावरण फैल रहा है।
ऐसे में साहित्य ही है जो मनुष्य को फिर से मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है।

रामराज्य की अवधारणा, संवेदना-प्रधान आदर्शों की पुनः स्थापना साहित्य कर सकता है।
आज साहित्य को उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका दी गई है— मानवीय मूल्यों की पुनः स्थापना करना।


---


साहित्य

  काव्य या साहित्य का माध्यम शब्द है। शब्द में अर्थ छिपा रहता है, इसी से भावनाओं का संचार होता है।

साहित्य मनुष्य के अनुभूत सत्य को सहृदय तक पहुँचाता है।


भारत तथा मानव समाज की सभ्यता या संस्कृति, मानवीय भावनाओं को परिष्कृत करने तथा उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम वेद, संहिता, काव्य, नाटक आदि के विकास में रही है।


संस्कृत साहित्य ने मानव-जीवन को महत्व दिया, जातीयता से दिव्यता तक ले गया।


गीतों की मर्मस्पर्श प्रस्तुति ने जन-जन की संवेदना को उद्वेलित किया।


यह स्पष्ट है कि बहुत कुछ साहित्य के द्वारा ही हुआ है।

कला और साहित्य

 


किसी वस्तु में निहित उपयोगिता और सौंदर्य को प्रकाशित करने का प्रयत्न ही 'कला' है। उपयोगिता और सौंदर्य के आधार पर कला के दो भेद किए गए हैं:

(1) उपयोगी कला

(2) ललित कला।


उपयोगिता तथा सौंदर्य की उपयोगिता का एक प्रकार होता है। भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में उपयोगी कला सहायक होती है, जैसे कपड़े, बर्तन आदि। इसके विपरीत ललित कला में सौंदर्य तत्त्व की प्रधानता रहती है। नाना प्रकार के अलंकरणों द्वारा यह मनुष्य को मानसिक आनंद प्रदान करती है। नृत्य, संगीत, चित्र आदि ललित कलाओं की परिभाषा इस प्रकार दी जाती है—


ललित कला वह वस्तु या चरित्रार्थ है जिसका अनुभव इंद्रियों के माध्यम द्वारा प्राप्त होता है और जिससे मन को संतोष या तृप्ति मिले।


इसका उद्देश्य केवल तृप्ति प्राप्त करना है, इसलिए ललित कला का कार्य मानसिक दृष्टि से सौंदर्य का प्रस्फुटनकरण है।


मनुष्य की भावनाओं को समझने, उद्दीप्त और परिष्कृत करने में साहित्य तथाकथित समस्त कलाओं का अङ्गीभूत होता है। ललित कलाएँ पाँच प्रकार की मानी गई हैं:

(1) काव्य

(2) संगीत

(3) चित्र

(4) मूर्ति

(5) वास्तु


इनमें साहित्य को सर्वोत्तम माना गया है। मानव के प्रबुद्ध मन की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति शब्द-कला में ही है।


कला की दृष्टि से कलाकार की नैसर्गिक प्रतिभा का परिणाम है। प्रतिभा का कोई कलाकार बनाया नहीं जाता है, वह पैदा होता है। कला-प्रयत्न का मूल आधार होता है – चिंतन। चित्र, नृत्य, नाट्य आदि सब संगीत से जुड़े होते हैं। चित्रकला, संगीत का आधार 'नाद' है, जो कानों से ग्रहण किया जाता है। ‘नाद’ शब्द, संगीत का पदार्थ है, ईंट-बालू की अपेक्षा कहीं अधिक भौतिक रूप में शक्तिशाली तत्त्व है। स्थापत्य कला और वास्तुकला की उत्कृष्टता को भी सौंदर्य के रूप में स्वीकार किया गया है।



---



रविवार, 22 जून 2025

कुबेरनाथ राय: ललित निबंधकार

भारतीय साहित्य में ललित निबंध की परंपरा को समृद्ध करने वाले कुछ ऐसे नाम हैं, जिनकी गहराई और दृष्टि आज भी पाठकों को मुग्ध करती है। इन्हीं में से एक हैं कुबेरनाथ राय। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र जैसे दिग्गजों के साथ ललित निबंध के शीर्ष पुरुषों में शुमार कुबेरनाथ राय का व्यक्तित्व और कृतित्व जितना सहज था, उनकी चिंतन यात्रा उतनी ही व्यापक और गहन।


"मेरे जीवन में कुछ भी ऐसा विशिष्ट नहीं..." - एक विनम्र शुरुआत

जब कुबेरनाथ राय से उनके जीवन के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब उनकी सादगी का प्रमाण था। उन्होंने कहा, "मेरे जीवन में कुछ भी ऐसा उग्र, उत्तेजक, रोमांटिक, अद्भुत या विशिष्ट नहीं जो कहने लायक हो।" पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के मतसाँ गाँव में 26 मार्च 1933 को जन्मे, एक साधारण किसान परिवार से आने वाले कुबेरनाथ राय ने अपने जीवन को एक शिक्षित और दायित्व-चेतनासम्पन्न युवक की सामान्य नियति बताया। उन्होंने पढ़ा, नौकरी की, घर का खर्चा चलाया और अगर कुछ अलग किया तो वे ललित निबंध थे। उनका मानना था कि उनके 'अन्तर्यामी पुरुष' ने उनसे लिखवाया, अन्यथा एक "भोजपुरी देहाती" से लिखना संभव नहीं था। यह कथन केवल उनकी विनम्रता नहीं, बल्कि उनके लेखन के पीछे की गहरी प्रेरणा और सहजता को भी दर्शाता है।


संघर्षों से तराशा गया एक चिंतनशील मन

कुबेरनाथ राय की प्रारंभिक शिक्षा उनके गाँव में हुई। मिडिल के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। बनारस के क्विंस कॉलेज और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से गणित, दर्शन और अंग्रेजी विषयों में स्नातक करने के बाद, उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1958 में अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की। कलकत्ता में उनका प्रवास आर्थिक कठिनाइयों से भरा रहा, जहाँ उन्हें अपने खर्चों के लिए ट्यूशन पढ़ाना पड़ा। पीएच.डी. का विचार छोड़कर, 1959 में वे नलबारी कॉलेज, असम में अध्यापक बन गए, जहाँ उन्होंने लगभग तीन दशक तक सेवा दी। असम से उनका जुड़ाव इतना गहरा था कि वे उसे अपनी "सत्ता का अद्वैत" कहते थे। बाद में वे गाजीपुर लौट आए और स्वामी सहजानंद महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुए।


साहित्यिक संस्कारों की उर्वर भूमि

कुबेरनाथ राय के साहित्यिक संस्कारों की नींव उनके परिवार और परिवेश में पड़ी। उनका परिवार वैष्णव रामानुज संप्रदाय से जुड़ा था, और घर में प्रतिदिन धार्मिक ग्रंथों का पारायण होता था। उनके बाबा के भाई, पंडित बटुकदेव शर्मा, एक उच्च शिक्षित स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने 'कामधेनु', 'तरुणभारत' जैसे राष्ट्रवादी पत्र निकाले। इन पत्रों और घर में मौजूद 'आनंदमठ', 'देशेर कथा', 'भारत भारती' जैसी जब्तशुदा किताबों ने उनके 'भारत-बोध' और साहित्यिक चेतना को गहरा आकार दिया। तुलसीदास का 'रामचरित मानस' और लोक जीवन की कहानियाँ उनके मानस में रच-बस गई थीं, जिसकी झलक उनके लेखन में स्पष्ट दिखती है।


लेखन का उदय: जब धनुष-बाण हाथ में आया

कुबेरनाथ राय ने औपचारिक रूप से लेखन की शुरुआत 1962 में की। भारत के शिक्षामंत्री प्रो. हुमायूं कबीर के इतिहास लेखन संबंधी वक्तव्य से असहमत होकर, उन्होंने 'इतिहास और शुक-सारिका कथा' नामक एक तर्कपूर्ण निबंध 'सरस्वती' पत्रिका में भेजा। संपादक श्रीनारायण चतुर्वेदी ने इसे प्रकाशित किया और उन्हें लगातार लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। इस घटना को कुबेरनाथ राय ने अपने साहित्यिक दायित्व के प्रति सजग होने का क्षण बताया, "पं. श्री नारायण चतुर्वेदी ने मुझे घसीटकर मैदान में खड़ा कर दिया और हाथ में धनुष-बाण पकड़ा दिया।"

उनका पहला ललित निबंध 'हेमंत की संध्या' 15 मार्च 1964 को 'धर्मयुग' में छपा, जो उनकी पहली कृति 'प्रिया नीलकंठी' का पहला निबंध भी है। 'संपाती के बेटे' जैसे निबंधों से उन्हें व्यापक प्रसिद्धि मिली, जहाँ उन्होंने ग्रामीण परिवेश के बहाने आधुनिक मनुष्य की स्थिति पर विचार किया।


चिंतन की पाँच दिशाएँ: भारतीयता की समग्र अभिव्यक्ति

अपने देहावसान (5 जून 1996) तक कुबेरनाथ राय ने लगभग सवा दो-ढाई सौ निबंध लिखे, जो उनके बीस से अधिक निबंध-संग्रहों में संकलित हैं, जिनमें 'कामधेनु', 'मराल', 'उत्तरकुरु', 'निषाद बाँसुरी', 'रामायण महातीर्थम्' आदि प्रमुख हैं। उनके निबंधों में शैली और शिल्प की विविधता मिलती है – रिपोर्ताज, संस्मरण, एकालाप, लघुकथा, संवाद, सब ललित निबंध के रूप में ढल गए हैं।

उन्होंने अपने लेखन की पाँच प्रमुख दिशाएँ बताईं:

  1. भारतीय साहित्य: रस और भूमा के समन्वय से श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण।
  2. गंगातीरी लोक जीवन और आर्येतर भारत: भारत की नृजातीय संरचना का अन्वेषण, यह स्थापित करना कि भारत एक 'मुस्तर्का मिल्कियत' (साझा विरासत) है जहाँ कोई भी जाति विशुद्ध नहीं।
  3. रामकथा: राम को भारतीय राष्ट्रीय शील का प्रतीक और रामायण को 'जिजीविसा-करुणा-अभय' का महाकाव्य माना।
  4. गांधी दर्शन: सत्य और अहिंसा को भारतीय जीवन-दृष्टि का सार-तत्व माना।
  5. आधुनिक विश्व-चिंतन: भारतीय मानस को पश्चिमी चिंतन (समाजवाद, अस्तित्ववाद) से जोड़ना।

विरासत: परंपरा और आधुनिकता का संगम

कुबेरनाथ राय एक मूलसंश्लिष्ट लेखक थे, जिनकी चेतना ग्रामीण जीवन की आस्तिक भाव-भूमि और भारतीय आर्ष-चिंतन के गहन अनुशीलन से बनी थी। वे केवल वेद, उपनिषद् या शंकराचार्य की बात नहीं करते थे, बल्कि फागुन डोम, चंदर माझी जैसे लोक-जीवन के पात्रों का भी हवाला देते थे। उन्होंने भारतीयता को उसकी समग्रता में व्यक्त किया, जहाँ मूल्यबोध और नृजातीयता दोनों एक साथ समाहित थे।

रघुवीर सहाय ने उनके लेखन पर एक अत्यंत सटीक टिप्पणी की थी: "यदि संस्कार परम्परावादी हों तो क्या दृष्टि आधुनिक हो सकती है... इस प्रश्न का जितना साफ उत्तर कुबेरनाथ राय के निबन्ध पढ़कर मिलता है, उतना हिन्दी में लिखी गयी किसी कृति को पढ़कर नहीं मिलता। इन निबन्धों का पढ़ना एक नया अनुभव है।"

कुबेरनाथ राय का साहित्य आज भी हमें अपनी जड़ों से जुड़ने, भारतीयता के विभिन्न आयामों को समझने और आधुनिक विश्व-चिंतन के साथ उसका समन्वय स्थापित करने की प्रेरणा देता है। उनकी सादगी में छिपा यह गहन चिंतन ही उन्हें ललित निबंध परंपरा का एक अप्रतिम हस्ताक्षर बनाता है।


शनिवार, 17 मई 2025

त्रासदी : अरस्तू

त्रासदी : अरस्तू



रूपरेखा :
o   प्रस्तावना
o   त्रासदी की परिभाषा
o   त्रासदी के अंग
1.        कथानक
2.        चरित्र
3.        पदावली
4.        विचार
5.        दृश्य-विधान
6.        गीत
o   त्रासदी और विरेचन
o   सारांश
·        प्रस्तावना :
            अरस्तू यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक थे । उन्होंने दर्शन के साथ-साथ ज्ञान के अन्य अनुशासनों में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । साहित्य-चिंतन उनमें से एक है। उन्होंने इस क्षेत्र में अपने गुरू प्लेटो की मान्यताओं में संशोधन करते हुए प्रसिद्ध अनुकरण सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसका संबंध मुख्यतः साहित्य या काव्य की  रचना-प्रक्रिया से है । प्लेटो ने अनुकरणमूलक होने के साथ-साथ लोगों के भीतर स्थित मानो विकारों को प्रेरित करने के कारण काव्य का विरोध किया था। उनकी इस दूसरी मान्यता का आधार मुख्य रूप से ट्रेजडी थी, जो उस समय यूनानी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा थी। प्लेटो यूनानी ट्रेजडी-परंपरा के महत्त्वपूर्ण कवि होमर के बारे में लिखा है— “यद्यपि अपने यौवन के आरंभ से ही होमर के लिए मुझे संभ्रम तथा प्रेम रहा है, जिससे अब भी मेरे शब्द होठों पर लड़खड़ाने लगते हैं क्योंकि होमर मोहक दुःखांतकीय पूरे समुदाय के महान नेता और गुरु हैं, किंतु सत्य की अपेक्षा व्यक्ति को अधिक महत्त्व नहीं दिया जा सकता।” उन्होंने यह भी लिखा है कि काव्य मनोवेगों का पोषण करता है और उन्हें सींचता है तथा दुःखांतक रोने धोने को बढ़ावा देकर समाज को कमजोर बनाता है। काव्य और विशेषतः ट्रेजडी के बारे मैं प्लेटो की ये दोनों मान्यताएँ ही अरस्तू के ट्रेजडी संबंधी विवेचन और विरेचन सिद्धांत का आधार है । उन्होंने इन दोनों के संबंध में एक साथ विचार किया है।
त्रासदी की परिभाषा :
            भारतीय साहित्य-चिंतन की तरह ही पश्चिमी साहित्य-चिंतन का आरंभ भी मंचीय विधा  से हुआ । जैसे भारत में नाट्यशास्त्र मुख्यतः नाटक-केन्द्रित ग्रंथ है, वैसे ही प्लेटो और अरस्तू का साहित्य-चिंतन त्रासदी को केंद्र में रखकर विकसित हुआ है । ट्रेजडी और नाटक दोनों ही मंचीय विधाएँ हैं । उन्हें मानव की अनुकरणमूलक आदिम प्रवृत्ति से जोड़कर आदिम विधा कहा जा सकता है । इस अनुकरणमूलकता और उसके कार्यव्यापार रूप होने को अरस्तू ने अपनी परिभाषा में विशेष रूप से रेखांकित भी किया है— “त्रासदी स्वतः पूर्ण, निश्चित आयाम से युक्त कार्य की अनुकृति का नाम है । यह समाख्यान के रूप में न होकर कार्य-व्यापार-रूप में होती है । इसका माध्यम नाटक के विभिन्न भागों में तदनुरूप प्रयुक्त सभी प्रकार के आभरणों से अलंकृत भाषा होती है ।  उसमें करुणा तथा त्रास के उद्रेक के द्वारा इन मनोविकारों का उचित विरेचन किया जाता है ।”
            अरस्तू की इस परिभाषा में जो विंदु विशेष रूप से रेखांकित किए जा सकते हैं, वे इसप्रकार हैं—
  • 1.       यह अनुकरण मूलक है ।
  • 2.       यह स्वतःपूर्ण और निश्चित आयामों से युक्त होती है ।
  • 3.       यह समाख्यान न होकर कार्य-व्यापार के रूप में होती है ।
  • 4.       यह भाषा के माध्यम से व्यक्त होती है, जो त्रासदी के विभिन्न भागों के अनुरूप होनी चाहिए ।
  • 5.       त्रासदी का उद्देश्य करुणा या त्रास द्वारा मनोविकारों का उचित विरेचन होता है ।



बुधवार, 15 अगस्त 2018

अनुकरण सिद्धांत : अरस्तू



रूपरेखा :
·        प्रस्तावना
·        प्लेटो की अनुकरण संबंधी मान्यताएँ
·        अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत
·        अरस्तू के अनुकरण की व्याख्याएँ
(i)                 नवक्लासिकी व्याख्या
(ii)               स्वच्छंदतावादी व्याख्या
(iii)             रूपवादी या संरचनावादी व्याख्या
·        प्लेटो और अरस्तू के सिद्धांतों में अंतर
·        सारांश
1.       प्रस्तावना :
यूनान पश्चिमी दुनिया की प्राचीन संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है । ज्ञान-विज्ञान, कला, इतिहास, साहित्य और चिंतन में पश्चिम का समूचा आधुनिक संसार उसी की विरासत पर टीका है । पुनर्जागरण काल में जिस साहित्य और चिंतन ने पूरे यूरोप में चेतना की नई किरण फैलाई, उसमें बड़ा हिस्सा यूनानी साहित्य और चिंतन का था, जो अंधकार युग के दौरान विस्मृत-सा हो गया था  । यूनान प्लेटो, अरस्तू, होमर, हेरोडोटस (इतिहास का जनक), हिकैटियस (भूगोल का पिता) आदि तमाम दार्शनिकों, चिंतकों, कवियों और बहुविद्याविदों की प्रतिभाओं से संवलित एक समृद्ध सभ्यता रही है । तमाम विद्याओं, साहित्य-विधाओं और कला-रूपों की तरह ही यूरोपीय साहित्य-चिंतन की आधार-भूमि भी यूनान ही है । इसका बीज हमें प्लेटो की इओन से रिपब्लिक तक और विकास अरस्तू की पेरीपोइतिकस में दिखाई देता है । सुकरात-प्लेटो-अरस्तू परस्पर गुरु-शिष्य संबंध से जुड़े थे । इसका निदर्शन हमें उनके काव्य-चिंतन विशेषतः अनुकरण सिद्धांत के संबंध में भी दिखाई देता है । यहाँ प्लेटो की मान्यताएँ जहाँ सिद्धांत के प्रस्तावना का काम करती हैं, वहीं अरस्तू के विचार उसकी सीमाओं का विस्तार करते हुए उसे एक नए स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं । यह प्लेटो द्वारा प्रस्तावित संकल्पना अनुकरण से जुड़ी होकर भी उससे बहुत अलग है । इसके महत्त्व का पता इससे चलता है सिद्धांत के प्रस्तावित होने के कई हजार वर्ष बाद अस्तित्व में आने वाली चिंतन धाराएँ नवशास्त्रीयतावाद, स्वच्छंदतावाद और रूपवाद या संरचनावाद को अपनी जड़ों की तलाश के क्रम में इसकी पुनर्व्याख्या की जरूरत महसूस होती है । वे अपनी-अपनी तरह से इसकी व्याख्याएँ करते भी हैं ।
2.       प्लेटो की अनुकरण संबंधी मान्यताएँ :
            प्लेटो का जन्म यूनान के नगर राज्यों में से एक महत्त्वपूर्ण और वैभवशाली राज्य एथेंस में हुआ था । उनके बचपन से यौवन तक के दिन स्पार्टा और एथेंस के युद्ध की छाया में ही बीते थे और अपनी उदात्त सांस्कृतिक उपलब्धियों के बावजूद इस युद्ध में एथेंस की हार हुई थी । इस अनुभव ने प्लेटो के चिंतन पर गहरा प्रभाव डाला । उनकी काव्य और कला संबंधी मान्यताएँ इसकी प्रमाण हैं । उन्होंने एक आदर्श राज्य की संकल्पना के संदर्भ में उनपर विचार किया है और इस क्रम में काव्य को अग्राह्य माना है । उनके अनुसार काव्य मनोवेगों का पोषण करता है और उन्हें सींचता है तथा दुःखांतक रोने धोने को बढ़ावा देकर समाज को कमजोर बनाता है ।   लेकिन, उन्होंने काव्य-मात्र का विरोध नहीं किया है । देवस्त्रोतों तथा महापुरुषों के आख्यानों का स्वागत ही किया है । वे काव्य की ग्राह्यता और अग्राह्यता की कसौटी उसकी उपयोगिता को मानते हैं, जो उपयोगी है वही शुभ और वही सुंदर है, इसलिए ग्राह्य भी है ।
            प्लेटो की साहित्य या कला संबंधी दृष्टि को समझने के लिए माइमेसिस सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा है । हिंदी में इसे ही अनुकरण कहते हैं । उन्होंने यह अवधारणा पूर्व-परंपरा से ग्रहण की और माना कि अन्य कलाओं की तरह ही काव्य भी एक अनुकृतिमूलक कला है और उन्होंने वह आधार-भूमि तैयार की, जिसपर पाश्चात्य साहित्य-चिंतन का अनुकरण सिद्धांत खड़ा है ।
            प्लेटो प्रत्ययवादी चिंतक थे । उनके अनुसार सत्य प्रत्यय-जगत में स्थित होता है और वस्तु-जगत उसकी अनुकृति है । साहित्यकार या कलाकार भौतिक वस्तुओं के आधार पर अपनी धारणा बनाता है और उसे साहित्य या अन्य कला-रूपों में व्यक्त करता है । इसलिए वस्तु-जगत तथा कला-जगत के बीच अनुकृतिमूलक संबंध होता है । वस्तु-जगत प्रत्यय-जगत की अनुकृति है और कला-जगत वस्तु-जगत की । इसलिए मूल सत्य जो प्रत्यय-जगत में स्थित है, की दूरी प्रत्यय-जगत से तिगुनी हो जाती है ।
            प्लेटो के अनुसार सत्य विचार-रूप, अमूर्त और सार्वभौम है । वस्तुजगत में उसका अनुकरण भौतिक वस्तु के रूप में आकार लेता है । इसलिए वह मूर्त और विशिष्ट हो जाता है, न कि अपने मूल रूप में अमूर्त और सार्वभौम बना रहता है । कलाकार जब वस्तु जगत का अनुकरण करता है, तो वह ऐसा इसी मूर्त और विशिष्ट रूप के आधार पर करता है । इसलिए उसे सत्य का तात्विक ज्ञान नहीं होता । वस्तु-जगत की भौतिक  वस्तुओं को बनाने वाला व्यक्ति उससे इसी अर्थ में भिन्न होता है कि उसे सत्य का तात्विक ज्ञान तो होता है, लेकिन वह उसका अनुकरण नहीं कर पाता है । अतः कलाकार को सत्य का तत्त्व-ज्ञान न होने के कारण प्लेटो साहित्य या कला को मिथ्या मानते हैं ।
            प्लेटो अपनी इस मान्यता को पुष्ट करने के लिए एक मेज का उदाहरण देते हैं । मेज सबसे पहले विचार-रूप में आती है, जो अमूर्त होती है । बढ़ई उसे एक वस्तु के रूप में मूर्त आकार देता है । कलाकार या साहित्यकार उसको देखकर धारणा बनाता है, जिसका अनुकरण वह अपनी कलाकृति या साहित्य में करता है । इसलिए साहित्य या कला में व्यक्त मेज का रूप विचार-रूप में आई मेज का आभास-भर रह जाता है । अतः यह सत्य न होकर मिथ्या है ।
            महान यूनानी कवि होमर के बारे में  प्लेटो ने लिखा है — “यद्यपि अपने यौवन के आरंभ से ही होमर के लिए मुझे संभ्रम तथा प्रेम रहा है, जिससे अब भी मेरे शब्द होठों पर लड़खड़ाने लगते हैं क्योंकि होमर मोहक दुःखांतकीय पूरे समुदाय के महान नेता और गुरु हैं, किन्तु सत्य की अपेक्षा व्यक्ति को अधिक महत्त्व नहीं दिया जा सकता ।” उनका यह कथन सत्य के प्रति उनकी निष्ठा के साथ-साथ  काव्य के लिए उनके मन में लगाव को भी दिखाता है । पहले इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि प्लेटो मनोविकारों को उत्तेजित करने वाले साहित्य का तो विरोध करते हैं । किन्तु, देवस्त्रोतों और महापुरुषों के आख्यानों का विरोध नहीं करते हैं, क्योंकि उनके लिए साहित्य की कसौटी समाज के लिए शुभता है और शुभता का अर्थ उपयोगिता है । इसीलिए उन्होंने यह भी लिखा है कि “यदि प्रिय लगने वाली मधुर कविता या अनुकरणात्मक कलाएँ किसी सुव्यवस्थित राज्य में बने रहने के लिए युक्ति प्रस्तुत कर सकें तो हम सहर्ष उन्हें नगर मैं प्रवेश करा लेंगे, क्योंकि हम स्वयं उनके आकर्षण के बारे में बखूबी सचेत हैं ।”
3.       अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत :
            अरस्तू का साहित्य-चिंतन प्लेटो के चिंतन का विकास, विस्तार या संशोधित रूप माना जा सकता है । अरस्तू की काव्य संबंधी तीन महात्यवपूर्ण मान्यताएँ अनुकरण ट्रेजडी और विरेचन प्लेटो की मान्यताओं पर ही आधारित है । अनुकरण-सिद्धांत में जहाँ उन्होंने स्पष्ट रूप से प्लेटो की मान्यताओं की सीमाएँ स्पष्ट कर उसे विस्तार देने की कोशिश की है, वहीं ट्रेजडी और वीरेचन में उन्होंने एक तरह से प्लेटो द्वारा ट्रेजडी पर लगाए गए समाज के लिए अग्राह्यता के आरोप का परिहार करने की कोशिश की है ।
            प्लेटो की तरह ही अरस्तू भी यह मानते हैं कि “चित्रकार या किसी अन्य कलाकार की तरह ही कवि भी अनुकर्ता है ।” काव्य के विभिन्न रूप— त्रासदी, महाकाव्य, कामादी आदि अनुकरण के ही प्रकार हैं । परंतु, अरस्तू ने अनुकरण शब्द और कवि को अनुकर्ता मानने की परंपरा का निर्वाह करते हुए भी इनकी व्याख्या अलग अर्थ में की है । उन्होंने प्लेटो के अनुकरण को तो ग्रहण किया, लेकिन उसे उसकी नकारात्मक छवि से मुक्त करके देखने की कोशिश की ।  उन्होंने काव्य को प्रकृति की अनुकृति कहा है । अनुकर्ता कवि जिस अनुकार्य का अनुकरण करता है उसकी प्रकृति की व्याख्या करते हुए कहा है कि वह तीन प्रकार की वस्तुओं में से कोई भी हो सकती है— 1. जैसी वे थीं या हैं, 2. जैसी वे कही या समझी जाती हैं या 3. जैसी वे होनी चाहिए ।
            उन्होंने कवि और इतिहासकार के बीच अंतर बताते हुए कहा है कि इतिहासकार उसका वर्णन करता है, जो हो चुका है और कवि उसका वर्णन करता है, जो हो सकता है । काव्य का लक्ष्य इतिहास से भव्यतर होता है, उसमें दार्शनिकता भी होती है । जैसी होनी चाहिए के वर्णन का अर्थ काव्य का प्लेटो के अर्थ में अनुकरण की सीमा से बाहर हो जाना है । यह एक आदर्श स्थिति है, जिसकी कल्पना के लिए कलाकार या कवि स्वतंत्र है । प्लेटो की तरह अरस्तू के लिए सत्य से दूर होने पर काव्य अग्राह्य नहीं हो जाता । अतः अरस्तु के लिए कला नकल न होकर पुनर्रचना या पुनर्सृजन है । इसकी पुष्टि त्रासदी के कथानक संदर्भ में उनकी मान्यता से भी होती है । उन्होंने कथानक के स्रोतों पर बात करते हुए उसके तीन स्रोत— 1. दंतकथाएँ  2. कल्पना और 3.इतिहास की चर्चा की है । वे दंतकथाओं को इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानते हैं कि उसमें सत्यांश के साथ-साथ कल्पना का समन्वय रहता है । स्पष्ट है कि उनके लिए सत्यांश की उपस्थिति और कल्पना का समावेश ही साहित्य का आदर्श है क्योंकि साहित्य का लक्ष्य नाम रूप से विशिष्ट व्यक्तियों के माध्यम से सार्वभौमिकता की सिद्धि होती है ।
4.       अरस्तू के अनुकरण की व्याख्याएँ :
            अरस्तू के लिए अनुकरण मूल की नकल न होकर मूल पर आधारित होते हुए भी उससे भिन्न हो जाना है । परवर्ती विद्वानों ने उनके अनुकरण मत की अलग-अलग तरह से व्याख्याएँ कीं जिन्हें तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है—
i.        नवक्लासिकी व्याख्या
ii.      स्वच्छंदतावादी व्याख्या
iii.    रूपवादी या संरचनावादी व्याख्या

i.        नवक्लासिकी व्याख्या : अरस्तू के अनुकरण की नवक्लासिकी व्याख्या करने वालों में सबसे महत्त्वपूर्ण नाम होरेस का है। उन्होंने इसका अर्थ प्राचीन काव्य सिद्धांतों के साथ प्राचीन श्रेष्ठ काव्यों का अनुसरण आवश्यक माना । मध्यकालीन व्याख्याकारों ने काव्य प्रकृति की अनुकृति है की व्याख्या करते हुए प्रकृति का अर्थ नियमों से बँधा हुआ और अनुकृति का अर्थ यंत्रवत् प्रत्यांकन किया । इन दोनों व्याख्याओं की सीमा यह है कि जैसा हो सकता है या जैसा होना चाहिए के लिए इसमें कहीं अवकाश नहीं है । फिर, त्रासदी में सटयांश और कल्पना की संभावना के लिए भी जगह नहीं बचाती । इसलिए अरस्तू का अनुकरण इन अर्थ-छवियों के साथ संगत नहीं बैठता है ।

ii.      स्वच्छंदतावादी व्याख्या : स्वच्छंदतावादी व्याख्याकारों ने साहित्य को अनुकरण या तथावत प्रत्यंकन तक सीमित करने पर सवाल उठाए है । बूचर ने कहा कि, “कौन कहता है कि कलाकार या कवि अनुकर्ता है, वह तो ईश्वर की तरह स्वयं कर्ता है, काव्य जगत का निर्माता है । बूचर के अनुसार अरस्तू का अनुकरण से आशय सादृश्य-विधान या मूल का पुनरुत्पादन है । गिल्बर्ट मरे के अनुसार यूनीनी भाषा में कवि के लिए पोएतेस का प्रयोग होता है और उसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ कर्ता या रचयिता है । इसलिए अनुकरण का अर्थ रचना या करण होना चाहिए । इसी तरह एटकिंस ने अनुकरण को सरजनात्मक दर्शन की क्रिया या फिर पुनःसृजन का दूसरा नाम माना है और स्कॉट जेम्स ने इसे जीवन का कल्पनात्मक पुनर्निर्माण कहा है ।

iii.    रूपवादी या संरचनावादी व्याख्या : बीसवीं सदी के मध्य नव-अरस्तूवादी आलोचकों को शिकागो स्कूल का आलोचक कहा गया है । उनकी मुख्य चिंता कालाकृति की स्वायत्तता की प्रतिष्ठा करना था । क्रेन के अनुसार कला में अनुकरण का अर्थ किसी प्राकृत रूप या प्रक्रिया का सादृश्य रचना है । हार्वे डी. गोल्डस्टीन ने प्रकृति के अनुकरण का आशय कला की रचना पद्धति और प्रक्रिया में प्रकृति की प्रक्रिया और पद्धति का अनुकरण है’, वस्तु का अनुकरण नहीं है ।

5.       प्लेटो और अरस्तू के साहित्य-चिंतन में अंतर :
प्लेटो और अरस्तू दोनों का संबंध यूनानी चिंतन-परंपरा से है और उनके बीच गुरु-शिष्य का संबंध है । अनुकरण सिद्धांत की मूल संकल्पना प्लेटो ने दी। अरस्तू ने उसमें संशोधन और विस्तार किया । लेकिन, इन दोनों की मान्यताओं में पर्याप्त अंतर है ।
इसे निम्नलिखित

https://www.sahityasawadi.com/2018/08/2.html