Subscribe Us

लेबल

बुधवार, 18 नवंबर 2020

सगुण भक्ति और सगुण भक्त कवि

 सगुण भक्ति का अर्थ और महत्त्व

सगुण भक्ति का अर्थ है, "ईश्वर की उपासना उनके साकार रूप (गुणों के साथ) में करना," यानी ईश्वर के रूपों जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिव, विष्णु, आदि की पूजा करना। सगुण भक्ति में ईश्वर की न केवल असीम शक्ति, बल्कि उनके व्यक्तिगत गुण और रूपों का भी महत्व है। इसके अनुसार, भगवान के रूप और गुणों की उपासना करके भक्त उनसे अपने ह्रदय की दूरी मिटाने और उनके साथ एक गहरा संबंध स्थापित करने की कोशिश करते हैं।

सगुण भक्त कवियों का योगदान
सगुण भक्त कवि वैष्णव थे और इनकी भक्ति का मुख्य आधार अवतारवाद था, जिसमें भगवान के विभिन्न अवतारों की पूजा की जाती थी। विशेष रूप से राम और कृष्ण के अवतारों को पूजने का चलन था। इन भक्तों ने ब्रह्म की उपासना उनके साकार रूपों में की, अर्थात उन्होंने राम, कृष्ण, और अन्य देवताओं के रूपों में ईश्वर का दर्शन और उन्हें अपना इष्ट मानकर पूजा की।

सगुण भक्ति का मुख्य उद्देश्य था ईश्वर के साथ प्रिय, सखा और दासभाव के रूप में संबंध स्थापित करना। ये भक्त स्वयं को भगवान का प्रिय (प्रेमी), सखा (मित्र) या दास (सेवक) मानते थे। इस भक्ति में प्रेम को सबसे बड़ा मानवीय मूल्य माना गया और यह प्रेम सच्चे भाव से ईश्वर की भक्ति में निहित होता था। इन कवियों ने प्रेम को मानव जीवन का सबसे पवित्र और सर्वोत्तम मूल्य माना, जो व्यक्ति को दिव्य प्रेम की ओर ले जाता है।

सगुण भक्ति के कवियों का साहित्य विशेष रूप से ब्रज और अवधी बोलियों में रचा गया। इन कवियों ने अपनी रचनाओं में भगवान के जीवन, उनके चरित्र, और उनके गुप्त एवं स्पष्ट रूपों का वर्णन किया, ताकि आम जनमानस को उनका महत्व समझ में आ सके।

सगुण भक्ति के प्रमुख प्रकार
सगुण भक्ति के दो प्रमुख प्रकार माने जाते हैं:

  1. कृष्णभक्ति काव्य:
    कृष्ण भक्ति काव्य में मुख्य रूप से श्री कृष्ण के जीवन, उनके बाल्यकाल, उनके माखन चोरी, गोवर्धन धारण, रासलीला, और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर आधारित काव्य रचनाएँ होती हैं। कृष्ण भक्ति के कवि श्री कृष्ण को भगवान का परम रूप मानते थे और उन्हें सभी जीवों का उद्धारक मानते थे। इन कवियों में प्रमुख कवि सूरदास हैं, जिन्होंने श्री कृष्ण के बचपन की लीलाओं को अपनी रचनाओं में अत्यधिक सुंदरता से चित्रित किया।

  2. रामभक्ति काव्य:
    राम भक्ति काव्य में श्री राम के जीवन, उनके आदर्शों, उनके द्वारा किए गए कार्यों और उनके संघर्षों का वर्णन किया जाता है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम (संपूर्ण आदर्श पुरुष) माना जाता था और उनकी पूजा में मर्यादा, सत्य, और धर्म का पालन करने की प्रेरणा दी जाती थी। रामभक्ति के प्रमुख कवियों में तुलसीदास का नाम लिया जाता है, जिन्होंने अपनी काव्यरचना रामचरित मानस के माध्यम से राम के जीवन के आदर्शों को जीवित किया।

सगुण भक्ति के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

  1. सूरदास:
    सूरदास कृष्ण भक्ति के सबसे बड़े कवि थे। उनकी रचनाएँ विशेष रूप से श्री कृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं पर आधारित हैं। "सूरसागर" उनकी प्रमुख रचना है, जिसमें उन्होंने श्री कृष्ण के बाल्यकाल की माखन चोरी, गोवर्धन पूजा, और रासलीला का अत्यधिक सुंदर वर्णन किया।

  2. तुलसीदास:
    तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की, जिसमें उन्होंने श्रीराम के जीवन के आदर्शों को सजीव रूप में प्रस्तुत किया। यह काव्यरचना हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है और भारत में राम के भक्तों के लिए यह एक प्रमुख ग्रंथ है।

  3. कबीर:
    हालांकि कबीर को अधिकतर निर्गुण भक्ति का कवि माना जाता है, लेकिन उन्होंने राम और कृष्ण की उपासना भी की। कबीर का भक्ति मार्ग सत्य और प्रेम से जुड़ा था। उनकी कविताएँ जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।

  4. रामानंद:
    रामानंद ने राम के प्रति गहरी भक्ति और प्रेम व्यक्त किया। वे तुलसीदास के समय से पूर्व राम के प्रमुख भक्त थे और उनके प्रभाव में अनेक भक्ति कवि आए। रामानंद के भक्ति मार्ग ने समाज में भक्ति की चेतना को जागरूक किया।

निष्कर्ष
सगुण भक्ति कवियों का योगदान भारतीय भक्ति साहित्य में अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है। इन कवियों ने भगवान के विभिन्न रूपों की उपासना करके प्रेम और भक्ति के माध्यम से जीवन के उच्चतम आदर्शों को प्रस्तुत किया। उनके काव्य साहित्य में प्रेम, भक्ति, और सत्य का संदेश आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। सगुण भक्ति ने आम जन को ईश्वर से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम प्रदान किया, और उनके काव्य ने एक नई दिशा में धार्मिक और भक्ति साहित्य को आकार दिया।

बुधवार, 11 नवंबर 2020

कृष्ण भक्ति और सूरदास

  कृष्ण भक्ति का परिचय

कृष्ण भक्ति, सगुण भक्ति के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण धारा है, जो भगवान श्री कृष्ण की पूजा और भक्ति पर केंद्रित है। इस भक्ति के प्रवर्तक बल्लभाचार्य थे, जिन्होंने कृष्ण को परमात्मा मानकर उनकी पूजा को प्रेरित किया। बल्लभाचार्य के शिष्य और उनके पुत्र के शिष्यों ने कृष्ण भक्ति को फैलाया और इसके लिए उन्होंने अष्टछाप कवि की संज्ञा प्राप्त की। इन कवियों का मुख्य केंद्र मथुरा था, जहाँ उन्होंने कृष्ण की लीलाओं, उनके गुणों, और उनकी उपासना को प्रमुखता दी।

कृष्ण भक्ति काव्य में कृष्ण को भगवान का प्रियतम, सखा और प्रिय माना गया है। कवियों ने कृष्ण की बाल लीलाओं, रासलीलाओं और उनकी जीवन गाथाओं का बखूबी वर्णन किया। यह काव्य शैली ब्रजभाषा में लिखी गई, जो क्षेत्रीय साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण थी।

सूरदास और उनकी कृष्ण भक्ति
सूरदास कृष्ण भक्ति के सबसे प्रसिद्ध कवि थे और उन्हें कृष्ण की भक्ति का परम भक्त माना जाता है। सूरदास का जन्म लगभग 1478 ई. के आस-पास दिल्ली के पास स्थित सीही गाँव में हुआ था। वे जन्म से अंधे थे, लेकिन उनकी रचनाएँ और भक्ति की गहराई ने उन्हें भारतीय साहित्य के महान कवियों में स्थान दिलाया। सूरदास ने अपनी अधिकांश जीवन यात्रा वृंदावन में श्री नाथ मंदिर के पास बिताई। उनकी भक्ति का मार्ग श्री कृष्ण के प्रति सखा भाव था, अर्थात उन्होंने कृष्ण को अपना मित्र मानकर भक्ति की।

सूरदास के गुरु का नाम बल्लभाचार्य था, जिनसे उन्होंने कृष्ण भक्ति की शिक्षा ली। सूरदास की रचनाओं का संकलन मुख्य रूप से गेय मुक्तक काव्य में किया गया, जिनमें उन्होंने कृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं का वर्णन किया। सूरदास ने ब्रजभाषा में कविताएँ लिखीं, जिससे उनकी रचनाएँ जनता के बीच लोकप्रिय हो सकीं।

सूरदास की रचनाओं में कृष्ण की बाल लीलाओं का अद्भुत चित्रण किया गया। उन्होंने कृष्ण को सखा रूप में पूजा और उनकी क्रियाओं में अनंत प्रेम और भक्ति की भावना व्यक्त की। उनके काव्य में राधा और कृष्ण के प्रेम को भी अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, और इसे भारतीय भक्ति साहित्य में एक प्रमुख विषय माना गया।

सूरदास की प्रमुख रचनाएँ
सूरदास की सबसे प्रसिद्ध रचना ‘सूरसागर’ है। यह काव्य कृष्ण भक्ति का एक अद्वितीय ग्रंथ है, जिसमें सूरदास ने कृष्ण की बाल लीलाओं, माखन चोरी, गोवर्धन पूजा, रासलीला और कृष्ण के प्रेम में डूबे भक्तों के आस्थाएँ और भावनाएँ व्यक्त की हैं। इ में कृष्ण के प्रेम, सखा रूप, और राधा के साथ उनके अद्वितीय संबंधों का सजीव चित्रण किया गया है।

सूरदास की कविता की विशेषताएँ
सूरदास की कविता की कई विशेषताएँ हैं, जो उन्हें अन्य भक्ति कवियों से अलग करती हैं:

  1. सख्य-भाव की भक्ति:
    सूरदास की भक्ति का सबसे प्रमुख भाव था सख्य-भाव, जिसमें कृष्ण को भगवान से अधिक एक मित्र के रूप में पूजा गया। सूरदास ने कृष्ण से अपनी मित्रता के भाव में गहरी भक्ति व्यक्त की, जो उनके काव्य का केंद्रीय विषय बना।

  2. कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन:
    सूरदास ने विशेष रूप से कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया है, जैसे कि माखन चोरी, गोवर्धन पर्वत उठाना, और रासलीला। इन लीलाओं के माध्यम से सूरदास ने कृष्ण के दिव्य रूप और उनकी मनमोहक हरकतों का सुंदर चित्रण किया।

  3. राधा-कृष्ण का प्रेम:
    सूरदास ने राधा और कृष्ण के प्रेम को अत्यधिक महत्व दिया। उनका मानना था कि राधा और कृष्ण का प्रेम अविनाशी और परम प्रेम है, जो संसार के सभी प्रेमों से श्रेष्ठ है। उनके काव्य में राधा और कृष्ण के बीच के अद्वितीय और दिव्य प्रेम का सजीव वर्णन मिलता है।

निष्कर्ष
सूरदास और कृष्ण भक्ति काव्य ने भारतीय भक्ति साहित्य को एक नई दिशा दी। सूरदास ने कृष्ण को न केवल भगवान बल्कि अपने सखा के रूप में पूजा और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को काव्य के रूप में प्रस्तुत किया। सूरदास का काव्य न केवल कृष्ण भक्ति के अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है, बल्कि इसमें प्रेम, भक्ति और अद्वितीय रूप से मानव भावनाओं की गहराई का भी चित्रण मिलता है। उनके काव्य की लोकप्रियता आज भी बनी हुई है और वे भारतीय साहित्य के महान कवि के रूप में सम्मानित हैं।

Pinned Post

हस्तक्षेप

श्रीकांत वर्मा