सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

भक्ति

भक्ति  शब्द भज् धातु से उत्पन्न है।  जिससे भजन और भक्त शब्द बनते हैं । नारद भक्ति सूक्त में इसे 'सा परानुरक्तिरिश्वरे' परिभाषित किया गया है। अर्थात ऐसी अनुरक्ति या प्रेम जो परम सत्ता के प्रति हो अथवा प्रेम का परम स्वरूप हो। इसीलिए भक्तजन प्रेम को पांचवा पुरुषार्थ भी मानते हैं । अन्य चार पुरुषार्थ अर्थ धर्म काम और मोक्ष । भक्त जन ने मोक्ष की कल्पना आयुज्य मुक्ति और साधर्म्य मुक्ति के रूप में करते हैं । 

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बार-बार 'प्रेमा पुमर्थो' महान की चर्चा की है। भक्ति साहित्य के आलोचनात्मक विवेक का उनका आधार भी यही है, बल्कि साहित्य मात्रा के आलोचनात्मक विवेक का आधार भी आचार्य द्विवेदी के लिए यही सूत्र है। 

शास्त्रीय दृष्टि से भक्ति के नवधा और एकादशधा रूपों की चर्चा की जाती है, सामान्य समझ के लिए इसे दो रूपों में विभाजित किया गया है निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति फिर इन दोनों को भी दो-दो धाराओं में विभाजित किया गया निर्गुण भक्ति परंपरा को ज्ञानमार्गी और प्रेम मार्ग की दो धाराओं में और सगुण भक्ति को कृष्ण भक्ति और राम भक्त के दो शाखों में विभाजित किया गया   .

हिंदी साहित्य का भक्ति काल साहित्य में भक्ति के साहित्य सृजन का एक प्रतिदर्श है, जिसे हिंदी के साहित्य इतिहासकारों ने पूर्व मध्यकाल भी कहा है इसका समय संवत 1375 से लेकर संबंध 17 00 विक्रमी तक माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास नामक पुस्तक में इस काल का नामकरण भक्ति काल के रूप में किया है।

कबीर तुलसी दादू नानक जायसी सूरदास मीराबाई रविदास रज्जब जैसे भक्तों की एक विस्तृत परंपरा इस युग में हमें दिखाई देती है।
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भक्ति

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