प्रारंभिक जीवन और शिक्षा अज्ञेय का जन्म 1911 में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुआ था। उनके पिता हीरानंद शस्त्री एक प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे, जिन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति पर महत्वपूर्ण कार्य किए थे। इस कारण अज्ञेय का प्रारंभिक जीवन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश में बीता। अज्ञेय का वास्तविक नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन था, और वे भारतीय साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि, लेखक, और चिंतक माने जाते हैं। अज्ञेय ने 1929 में विज्ञान में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की थी, लेकिन बाद में उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उनकी शिक्षा का प्रारंभिक प्रभाव उनके विचारों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता का था, जो बाद में उनके साहित्यिक दृष्टिकोण में भी दिखाई देता है। क्रांतिकारी गतिविधियाँ और स्वतंत्रता संग्राम अज्ञेय का जीवन केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, वे एक संघर्षशील व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उनका झुकाव 1930 के दशक में हुआ, जब वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, अज्ञेय ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर पूर्वोत्तर भारत म...
बालम, आवो हमारे गेह रे। तुम बिन दुखिया देह रे। सब कोई कहे तुम्हारी नारी, मोकों लागत लाज रे। दिल से नहीं दिल लगाया, तब लग कैसा सनेह रे। अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे। कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे। है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिव सों कहै सुनाय रे। अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे॥
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा अज्ञेय का जन्म 1911 में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुआ था। उनके पिता हीरानंद शस्त्री एक प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे, जिन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति पर महत्वपूर्ण कार्य किए थे। इस कारण अज्ञेय का प्रारंभिक जीवन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश में बीता। अज्ञेय का वास्तविक नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन था, और वे भारतीय साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि, लेखक, और चिंतक माने जाते हैं। अज्ञेय ने 1929 में विज्ञान में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की थी, लेकिन बाद में उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उनकी शिक्षा का प्रारंभिक प्रभाव उनके विचारों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता का था, जो बाद में उनके साहित्यिक दृष्टिकोण में भी दिखाई देता है। क्रांतिकारी गतिविधियाँ और स्वतंत्रता संग्राम अज्ञेय का जीवन केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, वे एक संघर्षशील व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उनका झुकाव 1930 के दशक में हुआ, जब वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, अज्ञेय ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर पूर्वोत्तर भारत म...
बालम, आवो हमारे गेह रे। तुम बिन दुखिया देह रे। सब कोई कहे तुम्हारी नारी, मोकों लागत लाज रे। दिल से नहीं दिल लगाया, तब लग कैसा सनेह रे। अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे। कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे। है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिव सों कहै सुनाय रे। अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे॥
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा अज्ञेय का जन्म 1911 में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुआ था। उनके पिता हीरानंद शस्त्री एक प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे, जिन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति पर महत्वपूर्ण कार्य किए थे। इस कारण अज्ञेय का प्रारंभिक जीवन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश में बीता। अज्ञेय का वास्तविक नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन था, और वे भारतीय साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि, लेखक, और चिंतक माने जाते हैं। अज्ञेय ने 1929 में विज्ञान में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की थी, लेकिन बाद में उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उनकी शिक्षा का प्रारंभिक प्रभाव उनके विचारों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता का था, जो बाद में उनके साहित्यिक दृष्टिकोण में भी दिखाई देता है। क्रांतिकारी गतिविधियाँ और स्वतंत्रता संग्राम अज्ञेय का जीवन केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, वे एक संघर्षशील व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उनका झुकाव 1930 के दशक में हुआ, जब वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, अज्ञेय ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर पूर्वोत्तर भारत म...
बालम, आवो हमारे गेह रे। तुम बिन दुखिया देह रे। सब कोई कहे तुम्हारी नारी, मोकों लागत लाज रे। दिल से नहीं दिल लगाया, तब लग कैसा सनेह रे। अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे। कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे। है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिव सों कहै सुनाय रे। अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे॥
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा अज्ञेय का जन्म 1911 में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुआ था। उनके पिता हीरानंद शस्त्री एक प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे, जिन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति पर महत्वपूर्ण कार्य किए थे। इस कारण अज्ञेय का प्रारंभिक जीवन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश में बीता। अज्ञेय का वास्तविक नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन था, और वे भारतीय साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि, लेखक, और चिंतक माने जाते हैं। अज्ञेय ने 1929 में विज्ञान में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की थी, लेकिन बाद में उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उनकी शिक्षा का प्रारंभिक प्रभाव उनके विचारों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता का था, जो बाद में उनके साहित्यिक दृष्टिकोण में भी दिखाई देता है। क्रांतिकारी गतिविधियाँ और स्वतंत्रता संग्राम अज्ञेय का जीवन केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, वे एक संघर्षशील व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उनका झुकाव 1930 के दशक में हुआ, जब वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, अज्ञेय ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर पूर्वोत्तर भारत म...
बालम, आवो हमारे गेह रे। तुम बिन दुखिया देह रे। सब कोई कहे तुम्हारी नारी, मोकों लागत लाज रे। दिल से नहीं दिल लगाया, तब लग कैसा सनेह रे। अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे। कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे। है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिव सों कहै सुनाय रे। अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे॥
खेलन : खेलने में , को – कौन, काको – किसका, गोसइयाँ- स्वामी/मालिक, हरि- कृष्ण, बरबसहीं- व्यर्थ में ही, कत- क्यों, करत- करते हो, रिसैयां- क्रोध/गुस्सा, छैयाँ- छाया में, अति-अधिक, जनावत- दिखाते, यंते- इसलिए, जातें- क्योंकि, रुहठि : रूठना/बच्चों का क्रोध, तासौं- उसके साथ, ग्वैयां- खिलाड़ी, खेल्योइ- खेलना ही, चाहत-चाहते, दाऊँ-चाल, दुहैयाँ- सौगंध देना, नाम लेना।
संदर्भ :
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ पुस्तक अंतरा भाग एक के सूरदास नाम नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता भक्ति काल की सगुण शाखा के कृष्ण भक्त, कवि सूरदास हैं।
प्रसंग :
यह पद श्रीकृष्ण के मानवीय रूप, उनके बाल सुलभ स्वभाव, और सखा भाव की सुंदर झलक देता है।
व्याख्या :
इन पंक्तियों में प्रभु श्रीकृष्ण की बाल लीला का वर्णन है। एक बार श्री कृष्ण अपने दोस्तों के साथ यमुना के तट पर खेल रहे हैं । जब वे खेलते हुए सुदामा से हार जाते हैं, तब नाराज होकर एक तरफ बैठ जाते हैं। उनके बालसखा सुदामा जी उनसे कहते हैं कि हे कृष्ण! खेलने में कौन किसका? स्वामी है और कौन किसका मालिक। तुम मुझसे जाति-पाति में बड़े नहीं हो और न ही मैं तुम्हारी छत्रछाया में रहता हूँ, फिर तुम अनायास ही इतना क्रोध कर रहे हो। तुम सिर्फ इसलिए इतना अधिक अधिकार जाता रहे हो— तुम इसलिए इतना क्रोध कर रहे हो, क्योंकि तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास मुझसे कुछ गायें अधिक है और इसलिए तुम मुझसे बड़े हो। खेल में जो बात-बात में नाराज होता हो, ऐसे खिलाड़ी के साथ भला कौन खेलेगा? यह कहते हुए कृष्ण के सभी मित्र खेल से दूर होकर आस-पास बैठ गए। सूरदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण को खेलने की इच्छा थी। इसलिए जब सभी खिलाड़ियों ने खेल बंद कर दिया तो उन्होंने यह कहते हुए कि मैं नन्द बाबा का पुत्र हूँ। जिसतरह वह अपराधियों को क्षमा कर देते हैं और दया दिखाते हैं, उसी तरह मैं भी। तुम लोगों की बेईमानी को क्षमा कर बड़प्पन दिखाते हुए फिर से खेल शुरू कर रहा हूँ। इस तरह वह फिर से अपनी चाल चल देते हैं और खेल शुरू हो जाता है।
काव्य-सौंदर्य:
भाव सौंदर्य :
श्रीकृष्ण और श्रीदामा जैसे बाल मित्रों का झगड़ा और फिर रूठने-मनाने का प्रसंग बाल-लीला और बाल मनोविज्ञान का सुंदर उदाहरण है।
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